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दुर्गा सप्तशती · Madhyama Charita · अध्याय 2 / 13

महिषासुरसैन्यवध

Mahiṣāsura-Sainya Vadha

महिषासुर की सेना का वध · 68 श्लोक

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अध्याय सारांश

द्वितीय अध्याय मध्यम चरित्र (अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी) का आरम्भ करता है। सौ वर्ष के युद्ध के पश्चात् महिषासुर इन्द्र व देवताओं को जीतकर स्वर्ग पर अधिकार कर लेता है। पृथ्वी पर गिराए गए देवता ब्रह्मा, विष्णु और शिव के पास जाते हैं; उनके क्रोध से समस्त देवताओं के शरीर से तेज प्रकट होकर एक हो जाता है और देवी का रूप धारण कर तीनों लोकों में व्याप्त हो जाता है। प्रत्येक देवता उन्हें अपना आयुध और आभूषण देते हैं — शिव का त्रिशूल, विष्णु का चक्र, इन्द्र का वज्र आदि — और हिमवान् सिंह वाहन देते हैं। लोकों को कँपा देने वाले अट्टहास से गरजती हुई देवी महिषासुर की विशाल सेनाओं का सामना करती हैं और अपने गणों तथा सिंह सहित असुर सेनापतियों व उनकी सेना का संहार करती हैं, जबकि देवता पुष्पवृष्टि करते हैं।

ध्यान — आरम्भिक मंगलाचरण

अक्षस्रक्परशू गदेषुकुलिशं पद्मं धनुः कुण्डिकां दण्डं शक्तिमसिं चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम् शूलं पाशसुदर्शने दधतीं हस्तैः प्रवालप्रभां सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्

oṃ akṣasrakparaśū gadeṣukuliśaṃ padmaṃ dhanuḥ kuṇḍikāṃ daṇḍaṃ śaktimasiṃ ca carma jalajaṃ ghaṇṭāṃ surābhājanam śūlaṃ pāśasudarśane ca dadhatīṃ hastaiḥ pravālaprabhāṃ seve sairibhamardinīmiha mahālakṣmīṃ sarojasthitām

मैं उन महालक्ष्मी की उपासना करता हूँ, जो महिषासुर का मर्दन करने वाली, कमल पर विराजमान और मूँगे के समान कांति वाली हैं, तथा जो अपने हाथों में अक्षमाला, परशु, गदा, बाण, वज्र, पद्म, धनुष, कमण्डलु, दण्ड, शक्ति, खड्ग, ढाल, शंख, घण्टा, मदिरापात्र, शूल, पाश और सुदर्शन चक्र धारण किए हुए हैं।

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2.1

ह्रीं ऋषिरुवाच देवासुरमभूद्युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा महिषेऽसुराणामधिपे देवानां पुरन्दरे

oṃ hrīṃ ṛṣiruvāca devāsuramabhūdyuddhaṃ pūrṇamabdaśataṃ purā mahiṣe'surāṇāmadhipe devānāṃ ca purandare

अर्थ(ॐ ह्रीं। ऋषि बोले —) प्राचीन काल में जब महिषासुर असुरों का स्वामी और इन्द्र देवताओं का अधिपति था, तब देवताओं और असुरों में पूरे सौ वर्षों तक युद्ध हुआ।

2.2

तत्रासुरैर्महावीर्यैर्देवसैन्यं पराजितम् जित्वा सकलान् देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः

tatrāsurairmahāvīryairdevasainyaṃ parājitam jitvā ca sakalān devānindro'bhūnmahiṣāsuraḥ

अर्थउसमें महावीर्यवान् असुरों ने देवसेना को परास्त कर दिया; और समस्त देवताओं को जीतकर महिषासुर स्वयं इन्द्र (स्वर्ग का स्वामी) बन बैठा।

2.3

ततः पराजिता देवाः पद्मयोनिं प्रजापतिम् पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरुडध्वजौ

tataḥ parājitā devāḥ padmayoniṃ prajāpatim puraskṛtya gatāstatra yatreśagaruḍadhvajau

अर्थतब पराजित देवता कमल से उत्पन्न प्रजापति ब्रह्मा को आगे करके वहाँ गए जहाँ शिव (ईश) और गरुड़ध्वज विष्णु विराजमान थे।

2.4

यथावृत्तं तयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम् त्रिदशाः कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम्

yathāvṛttaṃ tayostadvanmahiṣāsuraceṣṭitam tridaśāḥ kathayāmāsurdevābhibhavavistaram

अर्थदेवताओं ने उन दोनों से, जैसा हुआ था ठीक वैसा ही, महिषासुर के कृत्यों और देवताओं की पराजय का सारा विस्तार कह सुनाया —

2.5

सूर्येन्द्राग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य अन्येषां चाधिकारान्स स्वयमेवाधितिष्ठति

sūryendrāgnyanilendūnāṃ yamasya varuṇasya ca anyeṣāṃ cādhikārānsa svayamevādhitiṣṭhati

अर्थ'वह स्वयं ही सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण तथा अन्य देवताओं के अधिकारों को धारण कर रहा है।

2.6

स्वर्गान्निराकृताः सर्वे तेन देवगणा भुवि विचरन्ति यथा मर्त्या महिषेण दुरात्मना

svargānnirākṛtāḥ sarve tena devagaṇā bhuvi vicaranti yathā martyā mahiṣeṇa durātmanā

अर्थउस दुरात्मा महिष द्वारा स्वर्ग से निकाले गए समस्त देवगण मर्त्यों के समान पृथ्वी पर भटक रहे हैं।

2.7

एतद्वः कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम् शरणं वः प्रपन्नाः स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम्

etadvaḥ kathitaṃ sarvamamarāriviceṣṭitam śaraṇaṃ vaḥ prapannāḥ smo vadhastasya vicintyatām

अर्थदेवताओं के इस शत्रु का सारा कृत्य आपको कह सुनाया; हम आपकी शरण में आए हैं — उसके वध का उपाय सोचा जाए।'

2.8

इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः चकार कोपं शम्भुश्च भ्रुकुटीकुटिलाननौ

itthaṃ niśamya devānāṃ vacāṃsi madhusūdanaḥ cakāra kopaṃ śambhuśca bhrukuṭīkuṭilānanau

अर्थदेवताओं के ये वचन सुनकर मधुसूदन (विष्णु) क्रोधित हुए, और शम्भु (शिव) भी — दोनों के मुख भौंहों की कुटिलता से तन गए।

2.9

ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शङ्करस्य

tato'tikopapūrṇasya cakriṇo vadanāttataḥ niścakrāma mahattejo brahmaṇaḥ śaṅkarasya ca

अर्थतब अत्यंत क्रोध से भरे चक्रधारी विष्णु के मुख से एक महान् तेज निकला, और वैसे ही ब्रह्मा तथा शंकर के मुख से भी।

2.10

अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत

anyeṣāṃ caiva devānāṃ śakrādīnāṃ śarīrataḥ nirgataṃ sumahattejastaccaikyaṃ samagacchata

अर्थइन्द्र (शक्र) आदि अन्य देवताओं के शरीर से भी अत्यंत महान् तेज निकला; और वह सब एक हो गया।

2.11

अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम् ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम्

atīva tejasaḥ kūṭaṃ jvalantamiva parvatam dadṛśuste surāstatra jvālāvyāptadigantaram

अर्थदेवताओं ने वहाँ अत्यंत तेज की एक राशि देखी, जो जलते हुए पर्वत के समान थी और जिसकी ज्वालाओं से दिशाएँ व्याप्त थीं।

2.12

अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम् एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा

atulaṃ tatra tattejaḥ sarvadevaśarīrajam ekasthaṃ tadabhūnnārī vyāptalokatrayaṃ tviṣā

अर्थदेवताओं के शरीरों से उत्पन्न वह अतुलनीय तेज एक स्थान पर एकत्र होकर एक नारी (देवी) बन गया, जो अपनी कांति से तीनों लोकों में व्याप्त था।

2.13

यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम् याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा

yadabhūcchāmbhavaṃ tejastenājāyata tanmukham yāmyena cābhavan keśā bāhavo viṣṇutejasā

अर्थजो शिव (शाम्भव) का तेज था, उससे उनका मुख बना; यम के तेज से केश, और विष्णु के तेज से भुजाएँ बनीं;

2.14

सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत् वारुणेन जङ्घोरू नितम्बस्तेजसा भुवः

saumyena stanayoryugmaṃ madhyaṃ caindreṇa cābhavat vāruṇena ca jaṅghorū nitambastejasā bhuvaḥ

अर्थचन्द्रमा (सौम्य) के तेज से दोनों स्तन; इन्द्र (ऐन्द्र) के तेज से कटि; वरुण के तेज से जंघा व ऊरु; और पृथ्वी के तेज से नितम्ब बने;

2.15

ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्गुल्योऽर्कतेजसा वसूनां कराङ्गुल्यः कौबेरेण नासिका

brahmaṇastejasā pādau tadaṅgulyo'rkatejasā vasūnāṃ ca karāṅgulyaḥ kaubereṇa ca nāsikā

अर्थब्रह्मा के तेज से चरण; सूर्य (अर्क) के तेज से पैरों की अँगुलियाँ; वसुओं के तेज से हाथों की अँगुलियाँ; और कुबेर के तेज से नासिका बनी;

2.16

तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा

tasyāstu dantāḥ sambhūtāḥ prājāpatyena tejasā nayanatritayaṃ jajñe tathā pāvakatejasā

अर्थउनके दाँत प्रजापति के तेज से बने; और उनके तीन नेत्र अग्नि (पावक) के तेज से उत्पन्न हुए;

2.17

भ्रुवौ सन्ध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा

bhruvau ca sandhyayostejaḥ śravaṇāvanilasya ca anyeṣāṃ caiva devānāṃ sambhavastejasāṃ śivā

अर्थउनकी दोनों भौंहें दोनों संध्याओं के तेज से, और कान वायु (अनिल) के तेज से बने; अन्य देवताओं के तेज का प्रकट होना भी कल्याणकारी हुआ।

2.18

ततः समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम् तां विलोक्य मुदं प्रापुरमरा महिषार्दिताः ततो देवा ददुस्तस्यै स्वानि स्वान्यायुधानि

tataḥ samastadevānāṃ tejorāśisamudbhavām tāṃ vilokya mudaṃ prāpuramarā mahiṣārditāḥ tato devā dadustasyai svāni svānyāyudhāni ca

अर्थतब समस्त देवताओं के तेज-पुंज से उत्पन्न उन देवी को देखकर महिष से पीड़ित अमर हर्षित हुए। तब देवताओं ने उन्हें अपने-अपने आयुध दिए।

2.19

शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक् चक्रं दत्तवान् कृष्णः समुत्पाट्य स्वचक्रतः

śūlaṃ śūlādviniṣkṛṣya dadau tasyai pinākadhṛk cakraṃ ca dattavān kṛṣṇaḥ samutpāṭya svacakrataḥ

अर्थपिनाकधारी शिव ने अपने त्रिशूल से एक त्रिशूल निकालकर उन्हें दिया; और कृष्ण (विष्णु) ने अपने चक्र से चक्र निकालकर दिया।

2.20

शङ्खं वरुणः शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः मारुतो दत्तवांश्चापं बाणपूर्णे तथेषुधी

śaṅkhaṃ ca varuṇaḥ śaktiṃ dadau tasyai hutāśanaḥ māruto dattavāṃścāpaṃ bāṇapūrṇe tatheṣudhī

अर्थवरुण ने शंख, अग्नि (हुताशन) ने शक्ति, और वायु (मरुत्) ने धनुष तथा बाणों से भरे दो तरकश दिए।

2.21

वज्रमिन्द्रः समुत्पाट्य कुलिशादमराधिपः ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद्गजात्

vajramindraḥ samutpāṭya kuliśādamarādhipaḥ dadau tasyai sahasrākṣo ghaṇṭāmairāvatādgajāt

अर्थसहस्राक्ष इन्द्र, देवराज, ने अपने वज्र (कुलिश) से वज्र निकालकर उन्हें दिया, और ऐरावत हाथी से एक घण्टा दिया।

2.22

कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ प्रजापतिश्चाक्षमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम्

kāladaṇḍādyamo daṇḍaṃ pāśaṃ cāmbupatirdadau prajāpatiścākṣamālāṃ dadau brahmā kamaṇḍalum

अर्थयम ने अपने कालदण्ड से दण्ड, जलपति वरुण ने पाश, प्रजापति ने अक्षमाला और ब्रह्मा ने कमण्डलु दिया।

2.23

समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकरः कालश्च दत्तवान् खड्गं तस्यै चर्म निर्मलम्

samastaromakūpeṣu nijaraśmīn divākaraḥ kālaśca dattavān khaḍgaṃ tasyai carma ca nirmalam

अर्थसूर्य (दिवाकर) ने उनके समस्त रोमकूपों में अपनी किरणें प्रदान कीं; और काल ने खड्ग तथा निर्मल चर्म (ढाल) दिया।

2.24

क्षीरोदश्चामलं हारमजरे तथाम्बरे चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि

kṣīrodaścāmalaṃ hāramajare ca tathāmbare cūḍāmaṇiṃ tathā divyaṃ kuṇḍale kaṭakāni ca

अर्थक्षीरसागर ने निर्मल हार, कभी पुराने न होने वाले दो वस्त्र, दिव्य चूड़ामणि, कुण्डल और कंगन दिए;

2.25

अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम्

ardhacandraṃ tathā śubhraṃ keyūrān sarvabāhuṣu nūpurau vimalau tadvad graiveyakamanuttamam

अर्थएक उज्ज्वल अर्धचन्द्र, सब बाँहों के लिए केयूर, दो निर्मल नूपुर और एक अनुपम ग्रैवेयक (कण्ठहार) दिया;

2.26

अङ्गुलीयकरत्नानि समस्तास्वङ्गुलीषु विश्वकर्मा ददौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम्

aṅgulīyakaratnāni samastāsvaṅgulīṣu ca viśvakarmā dadau tasyai paraśuṃ cātinirmalam

अर्थऔर सब अँगुलियों के लिए रत्नजड़ित अँगूठियाँ दीं। विश्वकर्मा ने उन्हें एक अत्यंत निर्मल परशु,

2.27

अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं दंशनम् अम्लानपङ्कजां मालां शिरस्युरसि चापराम्

astrāṇyanekarūpāṇi tathābhedyaṃ ca daṃśanam amlānapaṅkajāṃ mālāṃ śirasyurasi cāparām

अर्थअनेक प्रकार के अस्त्र और अभेद्य कवच दिया। समुद्र (जलधि) ने सिर और वक्षःस्थल के लिए कभी न मुरझाने वाले कमलों की दो मालाएँ,

2.28

अददज्जलधिस्तस्यै पङ्कजं चातिशोभनम् हिमवान् वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि

adadajjaladhistasyai paṅkajaṃ cātiśobhanam himavān vāhanaṃ siṃhaṃ ratnāni vividhāni ca

अर्थऔर हाथ के लिए एक अत्यंत शोभायमान कमल दिया। हिमवान् (हिमालय) ने वाहन के रूप में सिंह तथा अनेक प्रकार के रत्न दिए;

2.29

ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिपः शेषश्च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम्

dadāvaśūnyaṃ surayā pānapātraṃ dhanādhipaḥ śeṣaśca sarvanāgeśo mahāmaṇivibhūṣitam

अर्थधनपति (कुबेर) ने मदिरा से सदा भरा रहने वाला पानपात्र दिया; और इस पृथ्वी को धारण करने वाले समस्त नागों के स्वामी शेष ने उन्हें,

2.30

नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम् अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा

nāgahāraṃ dadau tasyai dhatte yaḥ pṛthivīmimām anyairapi surairdevī bhūṣaṇairāyudhaistathā

अर्थमहामणियों से विभूषित एक नागहार दिया। इस प्रकार इन तथा अन्य देवताओं द्वारा भी आभूषणों और आयुधों से सम्मानित होकर देवी,

2.31

सम्मानिता ननादोच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः

sammānitā nanādoccaiḥ sāṭṭahāsaṃ muhurmuhuḥ tasyā nādena ghoreṇa kṛtsnamāpūritaṃ nabhaḥ

अर्थबारंबार अट्टहास करती हुई ऊँचे स्वर में गरजीं। उनके भयंकर नाद से सम्पूर्ण आकाश भर गया,

2.32

अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत् चुक्षुभुः सकला लोकाः समुद्राश्च चकम्पिरे

amāyatātimahatā pratiśabdo mahānabhūt cukṣubhuḥ sakalā lokāḥ samudrāśca cakampire

अर्थऔर एक अत्यंत विशाल प्रतिध्वनि उठी। समस्त लोक क्षुब्ध हो उठे और समुद्र काँप उठे;

2.33

चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीधराः जयेति देवाश्च मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम्

cacāla vasudhā celuḥ sakalāśca mahīdharāḥ jayeti devāśca mudā tāmūcuḥ siṃhavāhinīm

अर्थपृथ्वी डोल उठी और सब पर्वत हिल उठे। देवताओं ने हर्ष से सिंहवाहिनी देवी से 'जय हो' कहा।

2.34

तुष्टुवुर्मुनयश्चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तयः दृष्ट्वा समस्तं सङ्क्षुब्धं त्रैलोक्यममरारयः

tuṣṭuvurmunayaścaināṃ bhaktinamrātmamūrtayaḥ dṛṣṭvā samastaṃ saṅkṣubdhaṃ trailokyamamarārayaḥ

अर्थभक्ति से नम्र शरीर वाले मुनियों ने उनकी स्तुति की। समस्त त्रैलोक्य को क्षुब्ध देखकर देवद्रोही असुरों ने,

2.35

सन्नद्धाखिलसैन्यास्ते समुत्तस्थुरुदायुधाः आः किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुरः

sannaddhākhilasainyāste samuttasthurudāyudhāḥ āḥ kimetaditi krodhādābhāṣya mahiṣāsuraḥ

अर्थअपनी समस्त सेनाओं को सुसज्जित कर, शस्त्र उठाए हुए एक साथ उठ खड़े हुए। 'अरे! यह क्या है?' — ऐसा क्रोध से कहकर महिषासुर,

2.36

अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृतः ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा

abhyadhāvata taṃ śabdamaśeṣairasurairvṛtaḥ sa dadarśa tato devīṃ vyāptalokatrayāṃ tviṣā

अर्थसमस्त असुरों से घिरा हुआ उस शब्द की ओर दौड़ा। तब उसने उन देवी को देखा, जो अपनी कांति से तीनों लोकों में व्याप्त थीं,

2.37

पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम् क्षोभिताशेषपातालां धनुर्ज्यानिःस्वनेन ताम्

pādākrāntyā natabhuvaṃ kirīṭollikhitāmbarām kṣobhitāśeṣapātālāṃ dhanurjyāniḥsvanena tām

अर्थजो अपने चरण के दबाव से भूमि को झुकाए हुए, मुकुट से आकाश को छूती हुई, धनुष की प्रत्यंचा के नाद से समस्त पाताल को क्षुब्ध करती हुई,

2.38

दिशो भुजसहस्रेण समन्ताद्व्याप्य संस्थिताम् ततः प्रववृते युद्धं तया देव्या सुरद्विषाम्

diśo bhujasahasreṇa samantādvyāpya saṃsthitām tataḥ pravavṛte yuddhaṃ tayā devyā suradviṣām

अर्थऔर अपनी सहस्र भुजाओं से चारों ओर समस्त दिशाओं को व्याप्त कर खड़ी थीं। तब उस देवी और देवद्रोहियों में युद्ध आरम्भ हुआ,

2.39

शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्यो महासुरः

śastrāstrairbahudhā muktairādīpitadigantaram mahiṣāsurasenānīścikṣurākhyo mahāsuraḥ

अर्थजिसमें बहुत प्रकार से छोड़े गए शस्त्रों-अस्त्रों से दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं। महिषासुर की सेना का सेनापति चिक्षुर नामक महान् असुर,

2.40

युयुधे चामरश्चान्यैश्चतुरङ्गबलान्वितः रथानामयुतैः षड्भिरुदग्राख्यो महासुरः

yuyudhe cāmaraścānyaiścaturaṅgabalānvitaḥ rathānāmayutaiḥ ṣaḍbhirudagrākhyo mahāsuraḥ

अर्थतथा चामर, चतुरंगिणी सेना से युक्त होकर, और अन्य असुर लड़ने लगे; साठ हज़ार रथों वाला उदग्र नामक महान् असुर,

2.41

अयुध्यतायुतानां सहस्रेण महाहनुः पञ्चाशद्भिश्च नियुतैरसिलोमा महासुरः

ayudhyatāyutānāṃ ca sahasreṇa mahāhanuḥ pañcāśadbhiśca niyutairasilomā mahāsuraḥ

अर्थऔर एक करोड़ (रथों) वाला महाहनु लड़े; पचास करोड़ (रथों) वाला असिलोमा नामक महान् असुर,

2.42

अयुतानां शतैः षड्भिर्बाष्कलो युयुधे रणे गजवाजिसहस्रौघैरनेकैः परिवारितः

ayutānāṃ śataiḥ ṣaḍbhirbāṣkalo yuyudhe raṇe gajavājisahasraughairanekaiḥ parivāritaḥ

अर्थऔर साठ लाख (रथों) वाला बाष्कल युद्ध में लड़े, जो अनेक सहस्र हाथियों व घोड़ों से घिरे हुए थे;

2.43

वृतो रथानां कोट्या युद्धे तस्मिन्नयुध्यत बिडालाख्योऽयुतानां पञ्चाशद्भिरथायुतैः

vṛto rathānāṃ koṭyā ca yuddhe tasminnayudhyata biḍālākhyo'yutānāṃ ca pañcāśadbhirathāyutaiḥ

अर्थऔर एक करोड़ रथों से घिरे हुए वे उस युद्ध में लड़े। बिडाल नामक असुर पाँच सौ करोड़ रथों से घिरा हुआ वहाँ युद्ध में लड़ा;

2.44

युयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारितः अन्ये तत्रायुतशो रथनागहयैर्वृताः

yuyudhe saṃyuge tatra rathānāṃ parivāritaḥ anye ca tatrāyutaśo rathanāgahayairvṛtāḥ

अर्थऔर वहाँ अन्य असुर भी अयुतों (असंख्य) की संख्या में, रथों, हाथियों व घोड़ों से घिरे हुए,

2.45

युयुधुः संयुगे देव्या सह तत्र महासुराः कोटिकोटिसहस्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा

yuyudhuḥ saṃyuge devyā saha tatra mahāsurāḥ koṭikoṭisahasraistu rathānāṃ dantināṃ tathā

अर्थउन महान् असुरों ने वहाँ युद्ध में देवी के साथ युद्ध किया। और कोटि-कोटि सहस्र रथों, हाथियों

2.46

हयानां वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुरः तोमरैर्भिन्दिपालैश्च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा

hayānāṃ ca vṛto yuddhe tatrābhūnmahiṣāsuraḥ tomarairbhindipālaiśca śaktibhirmusalaistathā

अर्थतथा घोड़ों से घिरा हुआ महिषासुर वहाँ युद्ध में था। तोमरों, भिन्दिपालों, शक्तियों और मूसलों से,

2.47

युयुधुः संयुगे देव्या खड्गैः परशुपट्टिशैः केचिच्च चिक्षिपुः शक्तीः केचित् पाशांस्तथापरे

yuyudhuḥ saṃyuge devyā khaḍgaiḥ paraśupaṭṭiśaiḥ kecicca cikṣipuḥ śaktīḥ kecit pāśāṃstathāpare

अर्थउन्होंने देवी के साथ संग्राम में युद्ध किया, और खड्गों तथा परशु-पट्टिशों से भी। कुछ ने शक्तियाँ फेंकीं, और कुछ अन्य ने पाश,

2.48

देवीं खड्गप्रहारैस्तु ते तां हन्तुं प्रचक्रमुः सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका

devīṃ khaḍgaprahāraistu te tāṃ hantuṃ pracakramuḥ sāpi devī tatastāni śastrāṇyastrāṇi caṇḍikā

अर्थऔर वे देवी पर खड्ग-प्रहार करके उन्हें मारने में प्रवृत्त हुए। तब वह देवी चण्डिका अपने शस्त्रों-अस्त्रों की वर्षा करती हुई,

2.49

लीलयैव प्रचिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरर्षिभिः

līlayaiva praciccheda nijaśastrāstravarṣiṇī anāyastānanā devī stūyamānā surarṣibhiḥ

अर्थउनके शस्त्रों-अस्त्रों को मानो खेल-खेल में ही काट डालती रहीं। देवों और ऋषियों द्वारा स्तुति की जाती हुई, अनायास प्रसन्न मुख वाली देवी,

2.50

मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणि चेश्वरी सोऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेसरी

mumocāsuradeheṣu śastrāṇyastrāṇi ceśvarī so'pi kruddho dhutasaṭo devyā vāhanakesarī

अर्थईश्वरी ने असुरों के शरीरों पर शस्त्र-अस्त्र चलाए। और देवी का वाहन वह सिंह भी क्रोध से अयाल झटकता हुआ,

2.51

चचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशनः निःश्वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका

cacārāsurasainyeṣu vaneṣviva hutāśanaḥ niḥśvāsān mumuce yāṃśca yudhyamānā raṇe'mbikā

अर्थअसुर-सेनाओं में वन में अग्नि के समान विचरने लगा। और युद्ध करती हुई अम्बिका ने जो निःश्वास छोड़े,

2.52

एव सद्यः सम्भूता गणाः शतसहस्रशः युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः

ta eva sadyaḥ sambhūtā gaṇāḥ śatasahasraśaḥ yuyudhuste paraśubhirbhindipālāsipaṭṭiśaiḥ

अर्थवे ही निःश्वास तत्काल सैकड़ों-हज़ारों गणों में परिणत हो गए। उन्होंने परशुओं, भिन्दिपालों, खड्गों और पट्टिशों से युद्ध किया,

2.53

नाशयन्तोऽसुरगणान् देवीशक्त्युपबृंहिताः अवादयन्त पटहान् गणाः शङ्खांस्तथापरे

nāśayanto'suragaṇān devīśaktyupabṛṃhitāḥ avādayanta paṭahān gaṇāḥ śaṅkhāṃstathāpare

अर्थदेवी की शक्ति से पुष्ट होकर वे असुर-गणों का नाश करने लगे। उन गणों में कुछ ने नगाड़े बजाए, कुछ ने शंख,

2.54

मृदङ्गांश्च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्तिवृष्टिभिः

mṛdaṅgāṃśca tathaivānye tasmin yuddhamahotsave tato devī triśūlena gadayā śaktivṛṣṭibhiḥ

अर्थऔर कुछ अन्य ने उस युद्ध-महोत्सव में मृदंग बजाए। तब देवी ने त्रिशूल, गदा और शक्तियों की वर्षा से,

2.55

खड्गादिभिश्च शतशो निजघान महासुरान् पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान्

khaḍgādibhiśca śataśo nijaghāna mahāsurān pātayāmāsa caivānyān ghaṇṭāsvanavimohitān

अर्थतथा खड्ग आदि से सैकड़ों महान् असुरों को मार डाला, और घण्टे के नाद से मोहित अन्य असुरों को धराशायी कर दिया;

2.56

असुरान् भुवि पाशेन बद्ध्वा चान्यानकर्षयत् केचिद् द्विधाकृतास्तीक्ष्णैः खड्गपातैस्तथापरे

asurān bhuvi pāśena baddhvā cānyānakarṣayat kecid dvidhākṛtāstīkṣṇaiḥ khaḍgapātaistathāpare

अर्थऔर कुछ अन्य असुरों को पाश से बाँधकर भूमि पर घसीट लिया। कुछ तीखे खड्ग-प्रहारों से दो टुकड़े कर दिए गए, और कुछ अन्य,

2.57

विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते वेमुश्च केचिद्रुधिरं मुसलेन भृशं हताः

vipothitā nipātena gadayā bhuvi śerate vemuśca kecidrudhiraṃ musalena bhṛśaṃ hatāḥ

अर्थगदा के प्रहार से कुचलकर भूमि पर पड़ गए; और कुछ मूसल से अत्यंत आहत होकर रक्त वमन करने लगे।

2.58

केचिन्निपतिता भूमौ भिन्नाः शूलेन वक्षसि निरन्तराः शरौघेण कृताः केचिद्रणाजिरे

kecinnipatitā bhūmau bhinnāḥ śūlena vakṣasi nirantarāḥ śaraugheṇa kṛtāḥ kecidraṇājire

अर्थकुछ अन्य शूल से वक्षःस्थल में बिंधकर भूमि पर गिर पड़े; और कुछ रणभूमि में बाणों की झड़ी से छलनी कर दिए गए।

2.59

श्येनानुकारिणः प्राणान् मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः केषाञ्चिद् बाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे

śyenānukāriṇaḥ prāṇān mumucustridaśārdanāḥ keṣāñcid bāhavaśchinnāśchinnagrīvāstathāpare

अर्थवे देवद्रोही श्येन (बाज) के समान प्राण त्यागने लगे। किन्हीं की भुजाएँ कट गईं, किन्हीं की गर्दनें,

2.60

शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिताः विच्छिन्नजङ्घास्त्वपरे पेतुरुर्व्यां महासुराः

śirāṃsi peturanyeṣāmanye madhye vidāritāḥ vicchinnajaṅghāstvapare petururvyāṃ mahāsurāḥ

अर्थकिन्हीं अन्य के सिर गिर पड़े, कुछ बीच से चीर दिए गए; और कुछ अन्य महान् असुर जंघाएँ कटकर पृथ्वी पर गिर पड़े।

2.61

एकबाह्वक्षिचरणाः केचिद्देव्या द्विधाकृताः छिन्नेऽपि चान्ये शिरसि पतिताः पुनरुत्थिताः

ekabāhvakṣicaraṇāḥ keciddevyā dvidhākṛtāḥ chinne'pi cānye śirasi patitāḥ punarutthitāḥ

अर्थकुछ को देवी ने एक भुजा, एक नेत्र और एक चरण वाला रहने पर भी दो टुकड़े कर दिया; और कुछ अन्य सिर कटने पर भी गिरकर पुनः उठ खड़े हुए।

2.62

कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः ननृतुश्चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः

kabandhā yuyudhurdevyā gṛhītaparamāyudhāḥ nanṛtuścāpare tatra yuddhe tūryalayāśritāḥ

अर्थश्रेष्ठ आयुध थामे कबन्ध (धड़) देवी से युद्ध करने लगे; और कुछ अन्य उस युद्ध में बाजों की लय के साथ नाचने लगे।

2.63

कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपाणयः तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुराः

kabandhāśchinnaśirasaḥ khaḍgaśaktyṛṣṭipāṇayaḥ tiṣṭha tiṣṭheti bhāṣanto devīmanye mahāsurāḥ

अर्थकटे सिर वाले कबन्ध, हाथों में खड्ग, शक्ति व ऋष्टि लिए, तथा अन्य महान् असुर देवी से 'ठहर, ठहर' कहते रहे।

2.64

पातितै रथनागाश्वैरसुरैश्च वसुन्धरा अगम्या साभवत्तत्र यत्राभूत् महारणः

pātitai rathanāgāśvairasuraiśca vasundharā agamyā sābhavattatra yatrābhūt sa mahāraṇaḥ

अर्थगिरे हुए रथों, हाथियों, घोड़ों और असुरों से वह भूमि, जहाँ वह महायुद्ध हुआ, अगम्य हो गई।

2.65

शोणितौघा महानद्यः सद्यस्तत्र प्रसुस्रुवुः मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम्

śoṇitaughā mahānadyaḥ sadyastatra prasusruvuḥ madhye cāsurasainyasya vāraṇāsuravājinām

अर्थवहाँ तत्काल रक्त की धाराओं की महानदियाँ बह निकलीं, असुर-सेना तथा हाथियों, असुरों व घोड़ों के बीच।

2.66

क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम्

kṣaṇena tanmahāsainyamasurāṇāṃ tathāmbikā ninye kṣayaṃ yathā vahnistṛṇadārumahācayam

अर्थक्षण भर में अम्बिका ने असुरों की उस महासेना को वैसे ही नष्ट कर दिया जैसे अग्नि तृण और काठ के विशाल ढेर को।

2.67

सिंहो महानादमुत्सृजन् धुतकेसरः शरीरेभ्योऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति

sa ca siṃho mahānādamutsṛjan dhutakesaraḥ śarīrebhyo'marārīṇāmasūniva vicinvati

अर्थऔर वह सिंह अयाल झटकता तथा महानाद करता हुआ ऐसे विचरने लगा मानो देवद्रोहियों के शरीरों से प्राणों को ढूँढ़-ढूँढ़कर निकाल रहा हो।

2.68

देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं तथासुरैः यथैषां तुतुषुर्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि

devyā gaṇaiśca taistatra kṛtaṃ yuddhaṃ tathāsuraiḥ yathaiṣāṃ tutuṣurdevāḥ puṣpavṛṣṭimuco divi

अर्थदेवी के गणों और असुरों द्वारा वहाँ ऐसा युद्ध किया गया कि आकाश से पुष्पवृष्टि करते हुए देवता उन पर अत्यंत प्रसन्न हुए।