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सुंदरकांड (श्रीरामचरितमानस)

तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस का पाँचवाँ कांड — हनुमान जी का लंका-गमन, सीता-खोज और लंका दहन की कथा। साहस, सफलता और विघ्न-नाश के लिए सर्वाधिक प्रिय पाठ। नीचे सम्पूर्ण अवधी पाठ अर्थ सहित पढ़ें; किसी भी पंक्ति को सुनने के लिए टैप करें।

दोहा सूची

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सम्पूर्ण सुंदरकांड पाठ

दोहा 1
Chaupāī

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥ तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥ जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥ यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥ सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥ बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥ जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥ जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥ जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥

Dohā

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥1॥

अर्थजाम्बवान के सुहावने वचन सुनकर हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले — "भाइयो! जब तक मैं सीता जी को देखकर लौट न आऊँ, तब तक तुम कंद-मूल-फल खाकर दुख सहते हुए मेरी प्रतीक्षा करना; कार्य अवश्य सिद्ध होगा और मुझे विशेष हर्ष होगा।" सबको प्रणाम कर और श्रीरघुनाथ को हृदय में धारण कर वे हर्षित होकर चल पड़े। समुद्र-तट पर एक सुंदर पर्वत था; खेल ही खेल में कूदकर वे उस पर चढ़ गए, और बार-बार श्रीराम का स्मरण कर पवनपुत्र ने महान् बल से छलाँग लगाई। उन्होंने जिस पर्वत पर पैर रखा वह तुरंत पाताल में धँस गया — जैसे रघुपति का अमोघ बाण चलता है, वैसे ही हनुमान जी चले। समुद्र ने उन्हें रामदूत जानकर मैनाक से कहा कि वह उनकी थकान दूर करे; पर हनुमान जी ने उसे केवल हाथ से छूकर प्रणाम किया — "राम का कार्य किए बिना मुझे विश्राम कहाँ?"
दोहा 2
Chaupāī

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥ सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥ आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥ राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥ तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥ कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि मोहि कहेउ हनुमाना॥ जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥ सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥ जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥ सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥ बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥ मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा॥

Dohā

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान। आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥2॥

अर्थदेवताओं ने पवनपुत्र को जाते देखा और उनके विशेष बल-बुद्धि को परखने के लिए सर्पों की माता सुरसा को भेजा। उसने आकर कहा — "आज देवताओं ने मुझे आहार दिया है।" यह सुनकर पवनकुमार बोले — "मैं राम का कार्य करके और प्रभु को सीता जी का समाचार सुनाकर लौट आऊँ, तब तुम्हारे मुख में प्रवेश करूँगा; सत्य कहता हूँ, हे माता! मुझे जाने दे।" जब किसी उपाय से उसने जाने न दिया, तब वे बोले — "तो मुझे निगल ले।" उसने एक योजन मुख फैलाया; कपि ने शरीर दुगुना कर लिया। उसने सोलह योजन का किया; वे तुरंत बत्तीस योजन के हो गए। ज्यों-ज्यों सुरसा मुख बढ़ाती, त्यों-त्यों कपि दुगना रूप दिखाते; उसने सौ योजन मुख किया, तब उन्होंने अत्यंत छोटा रूप धरकर मुख में घुसकर फिर बाहर आ गए और सिर नवाकर विदा माँगी। (सुरसा बोली —) "जिसके लिए देवताओं ने मुझे भेजा था, तुम्हारी बुद्धि-बल का वह मर्म मैंने पा लिया। तुम राम का सब कार्य पूर्ण करोगे, क्योंकि तुम बल-बुद्धि के निधान हो।" यह आशीर्वाद देकर वह चली गई और हनुमान जी हर्षित होकर आगे बढ़े।
दोहा 3
Chaupāī

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥ जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥ गहइ छाहँ सक सो उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥ सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥ ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥ तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥ नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥ सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें॥ उमा कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥ गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥ अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा॥

Chhanda

कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना। चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥ गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै॥ बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥ बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं। नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥ कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं। नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥ करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥ एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥

Dohā

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार। अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥3॥

अर्थसमुद्र में एक राक्षसी रहती थी जो माया से आकाश के पक्षियों को पकड़ लेती थी: जो जीव आकाश में उड़ते, उनकी परछाईं जल में देखकर वह छाया को पकड़ लेती, जिससे वे उड़ न पाते — इस प्रकार वह सदा आकाशचारियों को खा जाती थी। उसने वही छल हनुमान जी पर किया, पर कपि ने तुरंत उसका कपट पहचान लिया, उसे मारकर वे धीरबुद्धि समुद्र के पार चले गए। वहाँ उन्होंने वन की शोभा देखी — मधु के लोभ से गुंजार करते भौंरे, फल-फूल से सुहावने अनेक वृक्ष, मन को भाते पक्षी-मृगों के झुंड। आगे एक विशाल पर्वत देखकर वे भय त्यागकर दौड़कर उस पर चढ़ गए। (शिव कहते हैं — हे उमा! इसमें कपि की कोई बड़ाई नहीं, यह तो प्रभु का प्रताप है जो काल को भी खा जाता है।) पर्वत से उन्होंने लंका देखी — अत्यंत ऊँचा, वर्णन से परे दुर्ग, चारों ओर समुद्र, और परम प्रकाशमान सोने का परकोटा। वह स्वर्ण-परकोटा विचित्र मणियों से जड़ा और सुंदर भवनों से घना था; चौहट्टे, हाट, सुंदर बाज़ार और मनोहर गलियाँ नगर को अनेक प्रकार से सजा रही थीं। हाथी, घोड़े, खच्चर, पैदल और रथों के समूह अगणित थे; अनेक रूपों वाली अत्यंत बलवान् राक्षस-सेना का वर्णन नहीं बनता। वन, बाग, उपवन, वाटिकाएँ, सरोवर, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित थीं; मनुष्य, नाग, देव और गंधर्वों की कन्याएँ मुनियों के मन को भी मोह लेती थीं। कहीं पर्वत-समान विशाल देहवाले मल्ल गरजते और अनेक अखाड़ों में एक-दूसरे को ललकारते भिड़ते थे; करोड़ों विकट योद्धा नगर की चारों ओर रक्षा करते थे; और दुष्ट निशाचर भैंसे, मनुष्य, गाय, गधे और बकरे खा जाते थे। (तुलसीदास कहते हैं — इसी से इनकी थोड़ी-सी कथा कही है, क्योंकि ये रघुवीर के बाण रूपी तीर्थ में शरीर त्यागकर सद्गति पाएँगे।) नगर के बहुत-से रखवाले देखकर कपि ने विचार किया — "मैं अत्यंत छोटा रूप धरकर रात में नगर में प्रवेश करूँ।"
दोहा 4
Chaupāī

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥ नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥ जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥ मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥ पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका॥ जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥ बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥ तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥

Dohā

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥4॥

अर्थमच्छर के समान रूप धरकर और श्रीराम का स्मरण कर कपि लंका की ओर चले। लंकिनी नामक एक राक्षसी (बोली) — "मेरा निरादर कर यह कौन जा रहा है? रे मूढ़! तू मेरा मर्म नहीं जानता — जो (चोरी से जाता) है वह मेरा आहार है।" महाकपि ने उसे एक घूँसा मारा; वह रक्त वमन करती हुई धरती पर लोट गई। फिर सँभलकर उठी और हाथ जोड़कर डरते हुए विनय से बोली — "जब ब्रह्मा ने रावण को वर दिया था, तब चलते समय विधाता ने मुझे यह संकेत बताया था — 'जब तू कपि के मारे व्याकुल हो, तब निशाचरों का संहार जानना।' हे तात! मेरा बड़ा पुण्य है कि मैंने नेत्रों से राम के दूत के दर्शन किए। हे पुत्र! स्वर्ग और मोक्ष के समस्त सुख तराज़ू के एक पलड़े पर रख दें, तो भी वे सत्संग के एक क्षण के सुख की तुलना नहीं कर सकते।"
दोहा 5
Chaupāī

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा॥ गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥ गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥ अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥ मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥ गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥ सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ दीखि बैदेही॥ भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥

Dohā

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि जाइ। नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ॥5॥

अर्थ(लंकिनी ने कहा —) "कौसलपुर के राजा (श्रीराम) को हृदय में रखकर नगर में प्रवेश कर सब कार्य कर लो। जिस पर श्रीराम कृपा-दृष्टि से देख लें, उसके लिए विष अमृत, शत्रु मित्र, समुद्र गाय के खुर-जैसा और अग्नि शीतल हो जाती है; गरुड़ सुमेरु-समान और सुमेरु रज-कण समान हो जाता है।" हनुमान जी ने अत्यंत छोटा रूप धरा और भगवान् का स्मरण कर नगर में प्रवेश किया। उन्होंने एक-एक महल खोज डाला, जहाँ-तहाँ अगणित योद्धा देखे। वे रावण के महल में गए — अत्यंत विचित्र, जो कहा नहीं जाता — और उसे सोते देखा; पर महल में वैदेही (सीता) न दिखीं। फिर एक सुहावना भवन दिखा, जहाँ अलग से हरि का मंदिर बना था — वह घर राम के आयुधों (चिह्नों) से अंकित था, जिसकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती। वहाँ नई तुलसी के पौधे देखकर कपिराज हर्षित हुए।
दोहा 6
Chaupāī

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥ मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥ राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥ एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ कारज हानी॥ बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए॥ करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥ की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥ की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥

Dohā

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम। सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥6॥

अर्थ"लंका तो निशाचरों के समूह का निवास है — यहाँ किसी सज्जन का वास कैसे?" कपि मन में यही तर्क कर रहे थे, उसी समय विभीषण जाग उठे और "राम-राम" का स्मरण किया। कपि हृदय में हर्षित हुए, सज्जन को पहचानकर — "मैं इनसे परिचय करूँगा, क्योंकि साधु से कार्य की हानि नहीं होती।" ब्राह्मण का रूप धरकर उन्होंने (राम-नाम के) वचन सुनाए; सुनते ही विभीषण उठकर वहाँ आए और प्रणाम कर कुशल पूछी — "हे ब्राह्मण! अपनी कथा समझाकर कहिए। क्या आप हरि के दासों में से कोई हैं? — मेरे हृदय में बड़ी प्रीति हो रही है। अथवा क्या आप दीनों के अनुरागी स्वयं राम हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने आए हैं?" तब हनुमान जी ने राम की सारी कथा और अपना नाम कहा; सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो गए और गुण-समूह का स्मरण कर मन मग्न हो गया।
दोहा 7
Chaupāī

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥ तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥ तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति पद सरोज मन माहीं॥ अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥ जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥ सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥ कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥ प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि मिलै अहारा॥

Dohā

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर। कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥7॥

अर्थ(विभीषण बोले —) "हे पवनपुत्र! मेरी रहनी सुनिए — जैसे दाँतों के बीच बेचारी जीभ। हे तात! कभी मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुल के नाथ कृपा करेंगे। यह तामसी शरीर है, कोई साधन नहीं; मन में उनके चरण-कमलों की प्रीति भी नहीं। पर हे हनुमान! अब मुझे भरोसा हुआ — हरि की कृपा बिना संत नहीं मिलते। यदि रघुवीर ने अनुग्रह किया है, तभी आपने मुझे हठ करके दर्शन दिए।" "हे विभीषण! प्रभु की रीति सुनिए: वे सेवक पर सदा प्रीति करते हैं। कहिए, मैं कौन-सा कुलीन हूँ? — चंचल वानर, सब प्रकार से हीन; प्रातः जो हमारा नाम ले ले उसे उस दिन भोजन नहीं मिलता। हे सखा! मैं ऐसा अधम हूँ, फिर भी मुझ पर भी रघुवीर ने कृपा की है।" गुणों का स्मरण कर उनके नेत्र जल से भर आए।
दोहा 8
Chaupāī

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे होहिं दुखारी॥ एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥ पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥ तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥ जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥ करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥ देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥ कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥

Dohā

निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन। परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥8॥

अर्थ(विभीषण —) "ऐसा जानते हुए भी जो ऐसे स्वामी को भुलाकर भटकते हैं, वे दुखी क्यों न हों?" इस प्रकार राम के गुण कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय शांति पाई। फिर विभीषण ने सारी कथा कही — जानकी जी वहाँ किस प्रकार रहती हैं। तब हनुमान जी बोले — "हे भ्राता! सुनिए, मैं माता जानकी को देखना चाहता हूँ।" विभीषण ने सब युक्ति समझा दी; विदा लेकर पवनपुत्र चल पड़े। वही रूप धरकर वे वहाँ गए जहाँ अशोक वन में सीता जी रहती थीं, और उन्हें देखकर मन ही मन प्रणाम किया। बैठे-बैठे ही रात के पहर बीत रहे थे — कृश शरीर, सिर पर एक जटा की वेणी, हृदय में रघुपति के गुण-समूह का जप करती हुईं, नेत्र अपने चरणों पर लगाए और मन राम के चरण-कमलों में लीन। जानकी जी को इतना दीन देखकर पवनपुत्र अत्यंत दुखी हुए।
दोहा 9
Chaupāī

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥ तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥ बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥ कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥ तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥ तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥ सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥ अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥ सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥

Dohā

आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान। परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥9॥

अर्थवे वृक्ष के पत्तों में छिपे रहे, विचार करते हुए — "हे भाई! क्या करूँ?" उसी समय रावण वहाँ बहुत-सी स्त्रियों के साथ बड़ी सज-धज से आया और सीता जी को साम, दान, भय और भेद दिखाकर अनेक प्रकार से समझाने लगा। रावण बोला — "हे सुमुखी सयानी! सुनो; मैं मंदोदरी आदि सब रानियों को तुम्हारी दासी बना दूँगा — यह मेरा प्रण है; एक बार मेरी ओर देख लो।" तिनके की ओट लेकर वैदेही ने परम स्नेही अवधपति का स्मरण कर कहा — "हे दशमुख! सुन — जुगनू के प्रकाश से क्या कभी कमलिनी खिलती है? मन में ऐसा समझ," जानकी जी कहती हैं। "रे दुष्ट! तुझे रघुवीर के बाण की सुधि नहीं। रे मूढ़! तू मुझे सूने में चुराकर ले आया है; अधम, निर्लज्ज! तुझे लाज नहीं आती?" अपने को जुगनू और राम को सूर्य-समान सुनकर तथा ये कठोर वचन सुनकर उसने अत्यंत खिसियाकर तलवार खींच ली और बोला।
दोहा 10
Chaupāī

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥ नाहिं सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति जीवन हानी॥ स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥ सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥ चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥ सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥ सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥ कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥ मास दिवस महुँ कहा माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥

Dohā

भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद। सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद॥10॥

अर्थ"सीता! तूने मेरा अपमान किया है; मैं इस कठोर तलवार से तेरा सिर काट लूँगा। नहीं तो शीघ्र मेरी बात मान ले, हे सुमुखी — नहीं तो जीवन की हानि है।" (सीता बोलीं —) "प्रभु की भुजा — नीले कमलों की माला-सी सुंदर, हाथी की सूँड़-समान — (ही मेरे कंठ के योग्य है); क्या तेरी घोर तलवार (उसकी तुलना)? रे मूढ़! सुन, यही मेरा दृढ़ प्रण है।" (तलवार से कहा —) "हे चंद्रहास! रघुपति के विरह की अग्नि से उत्पन्न मेरा संताप दूर कर; तू शीतल, तीक्ष्ण, श्रेष्ठ धारा बहाता है — मेरा भारी दुख हर ले।" यह सुनकर वह फिर मारने दौड़ा; मय की पुत्री (मंदोदरी) ने नीति कहकर समझाया। उसने सब राक्षसियों को बुलाकर कहा — "जाकर सीता को अनेक प्रकार से डराओ; यदि एक मास में मेरी बात न माने, तो मैं तलवार निकालकर मार डालूँगा।" दशमुख महल को गया; यहाँ अनेक नीच रूप धरकर पिशाचिनियों के झुंड सीता को त्रास दिखाने लगे।
दोहा 11
Chaupāī

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥ सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥ सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥ खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥ एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥ नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥ यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥ तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥

Dohā

जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच। मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥11॥

अर्थत्रिजटा नाम की एक राक्षसी थी, जो विवेक में निपुण और राम के चरणों में अनुरक्त थी। उसने सबको बुलाकर एक स्वप्न सुनाया — "सीता की सेवा करो और अपना हित करो। मेरे स्वप्न में एक वानर ने लंका जला दी और सारी राक्षस-सेना मार डाली; दशमुख गधे पर सवार, नंगा, सिर मुँडा हुआ, बीसों भुजाएँ कटी हुई; इस प्रकार वह दक्षिण दिशा को गया, मानो लंका विभीषण को मिल गई हो। नगर में (विभीषण ने) रघुवीर की दुहाई फिराई; तब प्रभु ने सीता को बुला भेजा। यह स्वप्न मैं पुकारकर कहती हूँ — चार दिन बीतने पर सत्य होगा।" उसके वचन सुनकर वे सब डर गईं और जानकी जी के चरणों में गिर पड़ीं। जब सब जहाँ-तहाँ चली गईं, तब सीता जी का मन सोचने लगा — "एक मास बीतने पर नीच निशाचर मुझे मार डालेगा।"
दोहा 12
Chaupāī

त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥ तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई॥ आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥ सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥ सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥ निसि अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥ कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि पावक मिटिहि सूला॥ देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि आवत एकउ तारा॥ पावकमय ससि स्त्रवत आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥ सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥ नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥ देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥

Dohā

कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब। जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ॥12॥

अर्थउसने त्रिजटा से हाथ जोड़कर कहा — "हे माता! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है। शीघ्र कोई उपाय कर कि मैं यह देह त्याग दूँ; यह दुःसह विरह अब नहीं सहा जाता। काठ लाकर चिता बना, और हे माता! फिर अग्नि लगा दे; हे सयानी! मेरी प्रीति सत्य कर — कान में शूल-समान ये वचन कौन सुने?" यह सुनकर (त्रिजटा ने) उनके चरण पकड़कर समझाया, प्रभु का प्रताप-बल और सुयश सुनाया — "रात में अग्नि नहीं मिलती, सुन हे सुकुमारी," यह कहकर वह अपने घर चली गई। सीता बोलीं — "विधि मेरे प्रतिकूल हो गया — न अग्नि मिलेगी, न शूल मिटेगा। आकाश में अंगारे प्रकट दिखते हैं, पर एक भी तारा धरती पर नहीं आता; चंद्रमा अग्निमय है पर आग नहीं बरसाता, मानो मुझे अभागी जानकर। हे अशोक वृक्ष! मेरी विनती सुन — अपना नाम सत्य कर और मेरा शोक हर ले; तेरे नए कोंपल अग्नि-समान हैं — मुझे अग्नि दे, और मेरी पीड़ा का अंत मत बना।" सीता को विरह से अत्यंत व्याकुल देख कपि को वह क्षण कल्प-समान बीता। हृदय में विचार कर कपि ने तब अँगूठी नीचे डाल दी; मानो अशोक ने अंगार दिया हो — वे हर्षित होकर उठीं और उसे हाथ में ले लिया।
दोहा 13
Chaupāī

तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥ चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥ जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥ सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥ रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥ लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥ श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई॥ तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ॥ राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥ यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥ नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें॥

Dohā

कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास॥ जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥13॥

अर्थतब उन्होंने वह मनोहर अँगूठी देखी, जो राम-नाम से अंकित और अत्यंत सुंदर थी। चकित होकर देखती हुईं, मुद्रिका पहचानकर उनके हृदय में हर्ष-विषाद उमड़ पड़े — "अजेय रघुराज को कौन जीत सकता है? ऐसी (मुद्रिका) माया से नहीं रची जा सकती।" सीता जी मन में नाना विचार कर ही रही थीं कि हनुमान जी ने मधुर वचन कहे और रामचंद्र जी के गुण वर्णन करने लगे; सुनते ही सीता जी का दुख भाग गया। वे मन लगाकर कान से सुनने लगीं, और उन्होंने आदि से सारी कथा सुनाई। "जिनकी सुहावनी कथा कानों को अमृत-सी है — हे भाई! वे प्रकट क्यों नहीं होते?" तब हनुमान जी निकट चले गए; वे मुड़कर बैठ गईं, मन में विस्मय हुआ। "हे माता जानकी! मैं राम का दूत हूँ — करुणानिधान की सच्ची शपथ। यह मुद्रिका मैं लाया हूँ, माता; राम ने आपको पहचान-चिह्न रूप में दी। मनुष्य और वानर का संग कैसे हुआ — कहता हूँ।" उन्होंने जैसी संगति हुई वह कथा कही। कपि के प्रेमपूर्ण वचन सुनकर उनके मन में विश्वास उत्पन्न हुआ; उन्होंने मन-वचन-कर्म से जान लिया कि यह कृपासिंधु का दास है।
दोहा 14
Chaupāī

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥ बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना॥ अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥ कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥ सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥ कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता॥ बचनु आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥ देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥ मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥ जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥

Dohā

रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर। अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर॥14॥

अर्थउन्हें हरि का सेवक जानकर उनकी प्रीति अत्यंत गाढ़ी हो गई; नेत्र सजल हो गए और रोमांच की लहर बढ़ गई। "हे हनुमान! विरह के समुद्र में डूबती मुझ को तुम जहाज़ हो गए। अब कुशल कहो — मैं बलिहारी जाती हूँ — क्या खर के शत्रु (राम) अनुज सहित सकुशल हैं, वे सुख के धाम? कोमल चित्त, कृपालु रघुराज ने हे कपि! किस कारण निष्ठुरता धारण कर ली? स्वभाव से सेवकों को सुख देने वाले रघुनायक क्या कभी (मेरी) सुधि करते हैं? हे तात! क्या कभी मेरे नेत्र उनके श्याम, कोमल अंगों को देखकर शीतल होंगे?" वचन न आया, नेत्र जल से भर गए — "हाय नाथ! आपने मुझे बिलकुल भुला दिया।" सीता को अत्यंत व्याकुल देख कपि ने कोमल, विनीत वचन कहे — "हे माता! प्रभु अनुज सहित कुशल हैं — आपके दुख से दुखी, सुकृपा के धाम। हे जननी! जी में कमी मत मानिए; राम का प्रेम आपसे दुगना है। अब हे माता! धीरज धरकर रघुपति का संदेश सुनिए।" यह कहकर कपि गद्गद हो गए, नेत्र जल से भर आए।
दोहा 15
Chaupāī

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥ नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥ कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥ जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥ कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान कोई॥ तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥ सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं॥ प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥ कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥ उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥

Dohā

निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु। जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥15॥

अर्थ"राम ने कहा — 'हे सीता! तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सब कुछ विपरीत हो गया है — वृक्षों के नए कोंपल अग्नि-समान, चाँदनी रात प्रलय की रात-सी, चंद्रमा सूर्य-समान; नीलकमलों की सेज भालों के वन-सी, बादल मानो तपा हुआ तेल बरसाता; जो हितैषी थे वही पीड़ा देते हैं, कोमल त्रिविध वायु साँप की साँस-सी। कहने से भी कुछ दुख घट सकता है — पर किससे कहूँ? इसे कोई नहीं जानता। हे प्रिय! मेरे और तुम्हारे प्रेम का तत्त्व केवल मेरा मन जानता है, और वह मन सदा तुम्हारे पास रहता है; प्रेम का रस इतने में ही जान लो।'" प्रभु का संदेश सुनते ही वैदेही प्रेम में मग्न हो गईं, उन्हें शरीर की सुधि न रही। कपि बोले — "हे माता! हृदय में धीरज धरो; सेवकों को सुख देने वाले राम का स्मरण करो। रघुपति की प्रभुता हृदय में लाओ, और मेरे वचन सुनकर कायरता त्याग दो। निशाचरों के समूह पतंगे-समान हैं और रघुपति के बाण अग्नि; हे जननी! हृदय में धीरज धरो — निशाचरों को जला हुआ ही जानो।"

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड क्या है?
सुंदरकांड गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस का पाँचवाँ कांड है, जो अवधी में रचित है। इसमें हनुमान जी का समुद्र लाँघकर लंका जाना, अशोक वाटिका में सीता जी को खोजना, लंका दहन और समाचार लेकर लौटना वर्णित है — यही एकमात्र कांड है जिसमें नायक भक्त हनुमान हैं। यह रामचरितमानस का सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला भाग है, जिसका पारायण साहस, सफलता और विघ्न-नाश के लिए किया जाता है।
सुंदरकांड का पाठ सफलता और विघ्नों के लिए क्यों किया जाता है?
क्योंकि यह सिद्धि का कांड है: भक्ति और बल के मूर्तरूप हनुमान असंभव-से कार्य को पूर्ण करते हैं — समुद्र लाँघना, सीता जी को खोजना और सकुशल लौटना। भक्त इसका पाठ (विशेषकर मंगल व शनिवार को तथा हनुमान उपासना में) उसी साहस व सफलता को पाने और अपने जीवन की कठिनाइयों को दूर करने के लिए करते हैं।
सुंदरकांड का पाठ कैसे करें?
पारंपरिक पारायण तीन संस्कृत मंगलाचरण श्लोकों (“शान्तं शाश्वतम्…”) से आरंभ होता है, फिर क्रमशः चौपाइयों व दोहों का पाठ होता है, और अंत में श्रीराम अथवा हनुमान जी की आरती से समापन होता है। अनेक भक्त सम्पूर्ण सुंदरकांड एक ही बैठक में पूर्ण करते हैं; अर्थ सहित पढ़ने से भाव और गहरा होता है।