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सुंदरकांड

दोहा 12 / 60

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Chaupāī

त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥ तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई॥ आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥ सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥ सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥ निसि अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥ कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि पावक मिटिहि सूला॥ देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि आवत एकउ तारा॥ पावकमय ससि स्त्रवत आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥ सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥ नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥ देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥

trijaṭā sana bolī kara jorī mātu bipati saṃgini taiṃ morī tajauṃ deha karu begi upāī dusahu birahu aba nahiṃ sahi jāī āni kāṭha racu citā banāī mātu anala puni dehi lagāī satya karahi mama prīti sayānī sunai ko śravana sūla sama bānī sunata bacana pada gahi samujhāesi prabhu pratāpa bala sujasu sunāesi nisi na anala mila sunu sukumārī asa kahi so nija bhavana sidhārī kaha sītā bidhi bhā pratikūlā milahi na pāvaka miṭihi na sūlā dekhiata pragaṭa gagana aṃgārā avani na āvata ekau tārā pāvakamaya sasi stravata na āgī mānahu~ mohi jāni hatabhāgī sunahi binaya mama biṭapa asokā satya nāma karu haru mama sokā nūtana kisalaya anala samānā dehi agini jani karahi nidānā dekhi parama birahākula sītā so chana kapihi kalapa sama bītā

Dohā

कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब। जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ॥12॥

kapi kari hṛdaya~ bicāra dīnhi mudrikā ḍārī taba janu asoka aṃgāra dīnhi haraṣi uṭhi kara gaheu 12

अर्थउसने त्रिजटा से हाथ जोड़कर कहा — "हे माता! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है। शीघ्र कोई उपाय कर कि मैं यह देह त्याग दूँ; यह दुःसह विरह अब नहीं सहा जाता। काठ लाकर चिता बना, और हे माता! फिर अग्नि लगा दे; हे सयानी! मेरी प्रीति सत्य कर — कान में शूल-समान ये वचन कौन सुने?" यह सुनकर (त्रिजटा ने) उनके चरण पकड़कर समझाया, प्रभु का प्रताप-बल और सुयश सुनाया — "रात में अग्नि नहीं मिलती, सुन हे सुकुमारी," यह कहकर वह अपने घर चली गई। सीता बोलीं — "विधि मेरे प्रतिकूल हो गया — न अग्नि मिलेगी, न शूल मिटेगा। आकाश में अंगारे प्रकट दिखते हैं, पर एक भी तारा धरती पर नहीं आता; चंद्रमा अग्निमय है पर आग नहीं बरसाता, मानो मुझे अभागी जानकर। हे अशोक वृक्ष! मेरी विनती सुन — अपना नाम सत्य कर और मेरा शोक हर ले; तेरे नए कोंपल अग्नि-समान हैं — मुझे अग्नि दे, और मेरी पीड़ा का अंत मत बना।" सीता को विरह से अत्यंत व्याकुल देख कपि को वह क्षण कल्प-समान बीता। हृदय में विचार कर कपि ने तब अँगूठी नीचे डाल दी; मानो अशोक ने अंगार दिया हो — वे हर्षित होकर उठीं और उसे हाथ में ले लिया।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 12 का अर्थ क्या है?
उसने त्रिजटा से हाथ जोड़कर कहा — "हे माता! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है। शीघ्र कोई उपाय कर कि मैं यह देह त्याग दूँ; यह दुःसह विरह अब नहीं सहा जाता। काठ लाकर चिता बना, और हे माता! फिर अग्नि लगा दे; हे सयानी! मेरी प्रीति सत्य कर — कान में शूल-समान ये वचन कौन सुने?" यह सुनकर (त्रिजटा ने) उनके चरण पकड़कर समझाया, प्रभु का प्रताप-बल और सुयश सुनाया — "रात में अग्नि नहीं मिलती, सुन हे सुकुमारी," यह कहकर वह अपने घर चली गई। सीता बोलीं — "विधि मेरे प्रतिकूल हो गया — न अग्नि मिलेगी, न शूल मिटेगा। आकाश में अंगारे प्रकट दिखते हैं, पर एक भी तारा धरती पर नहीं आता; चंद्रमा अग्निमय है पर आग नहीं बरसाता, मानो मुझे अभागी जानकर। हे अशोक वृक्ष! मेरी विनती सुन — अपना नाम सत्य कर और मेरा शोक हर ले; तेरे नए कोंपल अग्नि-समान हैं — मुझे अग्नि दे, और मेरी पीड़ा का अंत मत बना।" सीता को विरह से अत्यंत व्याकुल देख कपि को वह क्षण कल्प-समान बीता। हृदय में विचार कर कपि ने तब अँगूठी नीचे डाल दी; मानो अशोक ने अंगार दिया हो — वे हर्षित होकर उठीं और उसे हाथ में ले लिया।