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सुंदरकांड

दोहा 13 / 60

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Chaupāī

तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥ चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥ जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥ सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥ रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥ लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥ श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई॥ तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ॥ राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥ यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥ नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें॥

taba dekhī mudrikā manohara rāma nāma aṃkita ati suṃdara cakita citava mudarī pahicānī haraṣa biṣāda hṛdaya~ akulānī jīti ko sakai ajaya raghurāī māyā teṃ asi raci nahiṃ jāī sītā mana bicāra kara nānā madhura bacana boleu hanumānā rāmacaṃdra guna baranaiṃ lāgā sunatahiṃ sītā kara dukha bhāgā lāgīṃ sunaiṃ śravana mana lāī ādihu teṃ saba kathā sunāī śravanāmṛta jehiṃ kathā suhāī kahi so pragaṭa hoti kina bhāī taba hanumaṃta nikaṭa cali gayaū phiri baiṃṭhīṃ mana bisamaya bhayaū rāma dūta maiṃ mātu jānakī satya sapatha karunānidhāna kī yaha mudrikā mātu maiṃ ānī dīnhi rāma tumha kaha~ sahidānī nara bānarahi saṃga kahu kaiseṃ kahi kathā bhai saṃgati jaiseṃ

Dohā

कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास॥ जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥13॥

kapi ke bacana saprema suni upajā mana bisvāsa jānā mana krama bacana yaha kṛpāsiṃdhu kara dāsa 13

अर्थतब उन्होंने वह मनोहर अँगूठी देखी, जो राम-नाम से अंकित और अत्यंत सुंदर थी। चकित होकर देखती हुईं, मुद्रिका पहचानकर उनके हृदय में हर्ष-विषाद उमड़ पड़े — "अजेय रघुराज को कौन जीत सकता है? ऐसी (मुद्रिका) माया से नहीं रची जा सकती।" सीता जी मन में नाना विचार कर ही रही थीं कि हनुमान जी ने मधुर वचन कहे और रामचंद्र जी के गुण वर्णन करने लगे; सुनते ही सीता जी का दुख भाग गया। वे मन लगाकर कान से सुनने लगीं, और उन्होंने आदि से सारी कथा सुनाई। "जिनकी सुहावनी कथा कानों को अमृत-सी है — हे भाई! वे प्रकट क्यों नहीं होते?" तब हनुमान जी निकट चले गए; वे मुड़कर बैठ गईं, मन में विस्मय हुआ। "हे माता जानकी! मैं राम का दूत हूँ — करुणानिधान की सच्ची शपथ। यह मुद्रिका मैं लाया हूँ, माता; राम ने आपको पहचान-चिह्न रूप में दी। मनुष्य और वानर का संग कैसे हुआ — कहता हूँ।" उन्होंने जैसी संगति हुई वह कथा कही। कपि के प्रेमपूर्ण वचन सुनकर उनके मन में विश्वास उत्पन्न हुआ; उन्होंने मन-वचन-कर्म से जान लिया कि यह कृपासिंधु का दास है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 13 का अर्थ क्या है?
तब उन्होंने वह मनोहर अँगूठी देखी, जो राम-नाम से अंकित और अत्यंत सुंदर थी। चकित होकर देखती हुईं, मुद्रिका पहचानकर उनके हृदय में हर्ष-विषाद उमड़ पड़े — "अजेय रघुराज को कौन जीत सकता है? ऐसी (मुद्रिका) माया से नहीं रची जा सकती।" सीता जी मन में नाना विचार कर ही रही थीं कि हनुमान जी ने मधुर वचन कहे और रामचंद्र जी के गुण वर्णन करने लगे; सुनते ही सीता जी का दुख भाग गया। वे मन लगाकर कान से सुनने लगीं, और उन्होंने आदि से सारी कथा सुनाई। "जिनकी सुहावनी कथा कानों को अमृत-सी है — हे भाई! वे प्रकट क्यों नहीं होते?" तब हनुमान जी निकट चले गए; वे मुड़कर बैठ गईं, मन में विस्मय हुआ। "हे माता जानकी! मैं राम का दूत हूँ — करुणानिधान की सच्ची शपथ। यह मुद्रिका मैं लाया हूँ, माता; राम ने आपको पहचान-चिह्न रूप में दी। मनुष्य और वानर का संग कैसे हुआ — कहता हूँ।" उन्होंने जैसी संगति हुई वह कथा कही। कपि के प्रेमपूर्ण वचन सुनकर उनके मन में विश्वास उत्पन्न हुआ; उन्होंने मन-वचन-कर्म से जान लिया कि यह कृपासिंधु का दास है।