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सुंदरकांड

दोहा 4 / 60

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Chaupāī

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥ नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥ जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥ मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥ पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका॥ जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥ बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥ तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥

masaka samāna rūpa kapi dharī laṃkahi caleu sumiri naraharī nāma laṃkinī eka nisicarī so kaha calesi mohi niṃdarī jānehi nahīṃ maramu saṭha morā mora ahāra jahā~ lagi corā muṭhikā eka mahā kapi hanī rudhira bamata dharanīṃ ḍhanamanī puni saṃbhāri uṭhi so laṃkā jori pāni kara binaya saṃsakā jaba rāvanahi brahma bara dīnhā calata biraṃci kahā mohi cīnhā bikala hosi taiṃ kapi keṃ māre taba jānesu nisicara saṃghāre tāta mora ati punya bahūtā dekheu~ nayana rāma kara dūtā

Dohā

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥4॥

tāta svarga apabarga sukha dharia tulā eka aṃga tūla na tāhi sakala mili jo sukha lava satasaṃga 4

अर्थमच्छर के समान रूप धरकर और श्रीराम का स्मरण कर कपि लंका की ओर चले। लंकिनी नामक एक राक्षसी (बोली) — "मेरा निरादर कर यह कौन जा रहा है? रे मूढ़! तू मेरा मर्म नहीं जानता — जो (चोरी से जाता) है वह मेरा आहार है।" महाकपि ने उसे एक घूँसा मारा; वह रक्त वमन करती हुई धरती पर लोट गई। फिर सँभलकर उठी और हाथ जोड़कर डरते हुए विनय से बोली — "जब ब्रह्मा ने रावण को वर दिया था, तब चलते समय विधाता ने मुझे यह संकेत बताया था — 'जब तू कपि के मारे व्याकुल हो, तब निशाचरों का संहार जानना।' हे तात! मेरा बड़ा पुण्य है कि मैंने नेत्रों से राम के दूत के दर्शन किए। हे पुत्र! स्वर्ग और मोक्ष के समस्त सुख तराज़ू के एक पलड़े पर रख दें, तो भी वे सत्संग के एक क्षण के सुख की तुलना नहीं कर सकते।"
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 4 का अर्थ क्या है?
मच्छर के समान रूप धरकर और श्रीराम का स्मरण कर कपि लंका की ओर चले। लंकिनी नामक एक राक्षसी (बोली) — "मेरा निरादर कर यह कौन जा रहा है? रे मूढ़! तू मेरा मर्म नहीं जानता — जो (चोरी से जाता) है वह मेरा आहार है।" महाकपि ने उसे एक घूँसा मारा; वह रक्त वमन करती हुई धरती पर लोट गई। फिर सँभलकर उठी और हाथ जोड़कर डरते हुए विनय से बोली — "जब ब्रह्मा ने रावण को वर दिया था, तब चलते समय विधाता ने मुझे यह संकेत बताया था — 'जब तू कपि के मारे व्याकुल हो, तब निशाचरों का संहार जानना।' हे तात! मेरा बड़ा पुण्य है कि मैंने नेत्रों से राम के दूत के दर्शन किए। हे पुत्र! स्वर्ग और मोक्ष के समस्त सुख तराज़ू के एक पलड़े पर रख दें, तो भी वे सत्संग के एक क्षण के सुख की तुलना नहीं कर सकते।"