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सुंदरकांड

दोहा 6 / 60

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Chaupāī

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥ मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥ राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥ एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ कारज हानी॥ बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए॥ करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥ की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥ की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥

laṃkā nisicara nikara nivāsā ihā~ kahā~ sajjana kara bāsā mana mahu~ taraka karai kapi lāgā tehīṃ samaya bibhīṣanu jāgā rāma rāma tehiṃ sumirana kīnhā hṛdaya~ haraṣa kapi sajjana cīnhā ehi sana haṭhi karihau~ pahicānī sādhu te hoi na kāraja hānī bipra rupa dhari bacana sunāe sunata bibhīṣaṇa uṭhi taha~ āe kari pranāma pū~chī kusalāī bipra kahahu nija kathā bujhāī kī tumha hari dāsanha maha~ koī moreṃ hṛdaya prīti ati hoī kī tumha rāmu dīna anurāgī āyahu mohi karana baḍabhāgī

Dohā

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम। सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥6॥

taba hanumaṃta kahī saba rāma kathā nija nāma sunata jugala tana pulaka mana magana sumiri guna grāma 6

अर्थ"लंका तो निशाचरों के समूह का निवास है — यहाँ किसी सज्जन का वास कैसे?" कपि मन में यही तर्क कर रहे थे, उसी समय विभीषण जाग उठे और "राम-राम" का स्मरण किया। कपि हृदय में हर्षित हुए, सज्जन को पहचानकर — "मैं इनसे परिचय करूँगा, क्योंकि साधु से कार्य की हानि नहीं होती।" ब्राह्मण का रूप धरकर उन्होंने (राम-नाम के) वचन सुनाए; सुनते ही विभीषण उठकर वहाँ आए और प्रणाम कर कुशल पूछी — "हे ब्राह्मण! अपनी कथा समझाकर कहिए। क्या आप हरि के दासों में से कोई हैं? — मेरे हृदय में बड़ी प्रीति हो रही है। अथवा क्या आप दीनों के अनुरागी स्वयं राम हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने आए हैं?" तब हनुमान जी ने राम की सारी कथा और अपना नाम कहा; सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो गए और गुण-समूह का स्मरण कर मन मग्न हो गया।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 6 का अर्थ क्या है?
"लंका तो निशाचरों के समूह का निवास है — यहाँ किसी सज्जन का वास कैसे?" कपि मन में यही तर्क कर रहे थे, उसी समय विभीषण जाग उठे और "राम-राम" का स्मरण किया। कपि हृदय में हर्षित हुए, सज्जन को पहचानकर — "मैं इनसे परिचय करूँगा, क्योंकि साधु से कार्य की हानि नहीं होती।" ब्राह्मण का रूप धरकर उन्होंने (राम-नाम के) वचन सुनाए; सुनते ही विभीषण उठकर वहाँ आए और प्रणाम कर कुशल पूछी — "हे ब्राह्मण! अपनी कथा समझाकर कहिए। क्या आप हरि के दासों में से कोई हैं? — मेरे हृदय में बड़ी प्रीति हो रही है। अथवा क्या आप दीनों के अनुरागी स्वयं राम हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने आए हैं?" तब हनुमान जी ने राम की सारी कथा और अपना नाम कहा; सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो गए और गुण-समूह का स्मरण कर मन मग्न हो गया।