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सुंदरकांड

दोहा 9 / 60

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Chaupāī

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥ तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥ बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥ कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥ तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥ तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥ सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥ अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥ सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥

taru pallava mahu~ rahā lukāī karai bicāra karauṃ kā bhāī tehi avasara rāvanu taha~ āvā saṃga nāri bahu kie~ banāvā bahu bidhi khala sītahi samujhāvā sāma dāna bhaya bheda dekhāvā kaha rāvanu sunu sumukhi sayānī maṃdodarī ādi saba rānī tava anucarīṃ karau~ pana morā eka bāra biloku mama orā tṛna dhari oṭa kahati baidehī sumiri avadhapati parama sanehī sunu dasamukha khadyota prakāsā kabahu~ ki nalinī karai bikāsā asa mana samujhu kahati jānakī khala sudhi nahiṃ raghubīra bāna kī saṭha sūne hari ānehi mohi adhama nilajja lāja nahiṃ tohī

Dohā

आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान। परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥9॥

āpuhi suni khadyota sama rāmahi bhānu samāna paruṣa bacana suni kāḍhi asi bolā ati khisiāna 9

अर्थवे वृक्ष के पत्तों में छिपे रहे, विचार करते हुए — "हे भाई! क्या करूँ?" उसी समय रावण वहाँ बहुत-सी स्त्रियों के साथ बड़ी सज-धज से आया और सीता जी को साम, दान, भय और भेद दिखाकर अनेक प्रकार से समझाने लगा। रावण बोला — "हे सुमुखी सयानी! सुनो; मैं मंदोदरी आदि सब रानियों को तुम्हारी दासी बना दूँगा — यह मेरा प्रण है; एक बार मेरी ओर देख लो।" तिनके की ओट लेकर वैदेही ने परम स्नेही अवधपति का स्मरण कर कहा — "हे दशमुख! सुन — जुगनू के प्रकाश से क्या कभी कमलिनी खिलती है? मन में ऐसा समझ," जानकी जी कहती हैं। "रे दुष्ट! तुझे रघुवीर के बाण की सुधि नहीं। रे मूढ़! तू मुझे सूने में चुराकर ले आया है; अधम, निर्लज्ज! तुझे लाज नहीं आती?" अपने को जुगनू और राम को सूर्य-समान सुनकर तथा ये कठोर वचन सुनकर उसने अत्यंत खिसियाकर तलवार खींच ली और बोला।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 9 का अर्थ क्या है?
वे वृक्ष के पत्तों में छिपे रहे, विचार करते हुए — "हे भाई! क्या करूँ?" उसी समय रावण वहाँ बहुत-सी स्त्रियों के साथ बड़ी सज-धज से आया और सीता जी को साम, दान, भय और भेद दिखाकर अनेक प्रकार से समझाने लगा। रावण बोला — "हे सुमुखी सयानी! सुनो; मैं मंदोदरी आदि सब रानियों को तुम्हारी दासी बना दूँगा — यह मेरा प्रण है; एक बार मेरी ओर देख लो।" तिनके की ओट लेकर वैदेही ने परम स्नेही अवधपति का स्मरण कर कहा — "हे दशमुख! सुन — जुगनू के प्रकाश से क्या कभी कमलिनी खिलती है? मन में ऐसा समझ," जानकी जी कहती हैं। "रे दुष्ट! तुझे रघुवीर के बाण की सुधि नहीं। रे मूढ़! तू मुझे सूने में चुराकर ले आया है; अधम, निर्लज्ज! तुझे लाज नहीं आती?" अपने को जुगनू और राम को सूर्य-समान सुनकर तथा ये कठोर वचन सुनकर उसने अत्यंत खिसियाकर तलवार खींच ली और बोला।