Mantra.Tips
सुंदरकांड

दोहा 1 / 60

पाठ सुनें

🔊 किसी भी पंक्ति को सुनने के लिए टैप करें — या पूरी चौपाई सुनने के लिए ▶ दबाएँ

Chaupāī

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥ तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥ जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥ यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥ सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥ बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥ जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥ जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥ जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥

jāmavaṃta ke bacana suhāe suni hanumaṃta hṛdaya ati bhāe taba lagi mohi parikhehu tumha bhāī sahi dukha kaṃda mūla phala khāī jaba lagi āvauṃ sītahi dekhī hoihi kāju mohi haraṣa biseṣī yaha kahi nāi sabanhi kahu~ māthā caleu haraṣi hiya~ dhari raghunāthā siṃdhu tīra eka bhūdhara suṃdara kautuka kūdi caḍheu tā ūpara bāra bāra raghubīra sa~bhārī tarakeu pavanatanaya bala bhārī jehiṃ giri carana dei hanumaṃtā caleu so gā pātāla turaṃtā jimi amogha raghupati kara bānā ehī bhā~ti caleu hanumānā jalanidhi raghupati dūta bicārī taiṃ maināka hohi śramahārī

Dohā

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥1॥

hanūmāna tehi parasā kara puni kīnha pranāma rāma kāju kīnheṃ binu mohi kahā~ biśrāma 1

अर्थजाम्बवान के सुहावने वचन सुनकर हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले — "भाइयो! जब तक मैं सीता जी को देखकर लौट न आऊँ, तब तक तुम कंद-मूल-फल खाकर दुख सहते हुए मेरी प्रतीक्षा करना; कार्य अवश्य सिद्ध होगा और मुझे विशेष हर्ष होगा।" सबको प्रणाम कर और श्रीरघुनाथ को हृदय में धारण कर वे हर्षित होकर चल पड़े। समुद्र-तट पर एक सुंदर पर्वत था; खेल ही खेल में कूदकर वे उस पर चढ़ गए, और बार-बार श्रीराम का स्मरण कर पवनपुत्र ने महान् बल से छलाँग लगाई। उन्होंने जिस पर्वत पर पैर रखा वह तुरंत पाताल में धँस गया — जैसे रघुपति का अमोघ बाण चलता है, वैसे ही हनुमान जी चले। समुद्र ने उन्हें रामदूत जानकर मैनाक से कहा कि वह उनकी थकान दूर करे; पर हनुमान जी ने उसे केवल हाथ से छूकर प्रणाम किया — "राम का कार्य किए बिना मुझे विश्राम कहाँ?"
साझा करें
Share:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 1 का अर्थ क्या है?
जाम्बवान के सुहावने वचन सुनकर हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले — "भाइयो! जब तक मैं सीता जी को देखकर लौट न आऊँ, तब तक तुम कंद-मूल-फल खाकर दुख सहते हुए मेरी प्रतीक्षा करना; कार्य अवश्य सिद्ध होगा और मुझे विशेष हर्ष होगा।" सबको प्रणाम कर और श्रीरघुनाथ को हृदय में धारण कर वे हर्षित होकर चल पड़े। समुद्र-तट पर एक सुंदर पर्वत था; खेल ही खेल में कूदकर वे उस पर चढ़ गए, और बार-बार श्रीराम का स्मरण कर पवनपुत्र ने महान् बल से छलाँग लगाई। उन्होंने जिस पर्वत पर पैर रखा वह तुरंत पाताल में धँस गया — जैसे रघुपति का अमोघ बाण चलता है, वैसे ही हनुमान जी चले। समुद्र ने उन्हें रामदूत जानकर मैनाक से कहा कि वह उनकी थकान दूर करे; पर हनुमान जी ने उसे केवल हाथ से छूकर प्रणाम किया — "राम का कार्य किए बिना मुझे विश्राम कहाँ?"