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सुंदरकांड

दोहा 15 / 60

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Chaupāī

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥ नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥ कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥ जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥ कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान कोई॥ तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥ सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं॥ प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥ कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥ उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥

kaheu rāma biyoga tava sītā mo kahu~ sakala bhae biparītā nava taru kisalaya manahu~ kṛsānū kālanisā sama nisi sasi bhānū kubalaya bipina kuṃta bana sarisā bārida tapata tela janu barisā je hita rahe karata tei pīrā uraga svāsa sama tribidha samīrā kahehū teṃ kachu dukha ghaṭi hoī kāhi kahauṃ yaha jāna na koī tatva prema kara mama aru torā jānata priyā eku manu morā so manu sadā rahata tohi pāhīṃ jānu prīti rasu etenahi māhīṃ prabhu saṃdesu sunata baidehī magana prema tana sudhi nahiṃ tehī kaha kapi hṛdaya~ dhīra dharu mātā sumiru rāma sevaka sukhadātā ura ānahu raghupati prabhutāī suni mama bacana tajahu kadarāī

Dohā

निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु। जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥15॥

nisicara nikara pataṃga sama raghupati bāna kṛsānu jananī hṛdaya~ dhīra dharu jare nisācara jānu 15

अर्थ"राम ने कहा — 'हे सीता! तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सब कुछ विपरीत हो गया है — वृक्षों के नए कोंपल अग्नि-समान, चाँदनी रात प्रलय की रात-सी, चंद्रमा सूर्य-समान; नीलकमलों की सेज भालों के वन-सी, बादल मानो तपा हुआ तेल बरसाता; जो हितैषी थे वही पीड़ा देते हैं, कोमल त्रिविध वायु साँप की साँस-सी। कहने से भी कुछ दुख घट सकता है — पर किससे कहूँ? इसे कोई नहीं जानता। हे प्रिय! मेरे और तुम्हारे प्रेम का तत्त्व केवल मेरा मन जानता है, और वह मन सदा तुम्हारे पास रहता है; प्रेम का रस इतने में ही जान लो।'" प्रभु का संदेश सुनते ही वैदेही प्रेम में मग्न हो गईं, उन्हें शरीर की सुधि न रही। कपि बोले — "हे माता! हृदय में धीरज धरो; सेवकों को सुख देने वाले राम का स्मरण करो। रघुपति की प्रभुता हृदय में लाओ, और मेरे वचन सुनकर कायरता त्याग दो। निशाचरों के समूह पतंगे-समान हैं और रघुपति के बाण अग्नि; हे जननी! हृदय में धीरज धरो — निशाचरों को जला हुआ ही जानो।"
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 15 का अर्थ क्या है?
"राम ने कहा — 'हे सीता! तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सब कुछ विपरीत हो गया है — वृक्षों के नए कोंपल अग्नि-समान, चाँदनी रात प्रलय की रात-सी, चंद्रमा सूर्य-समान; नीलकमलों की सेज भालों के वन-सी, बादल मानो तपा हुआ तेल बरसाता; जो हितैषी थे वही पीड़ा देते हैं, कोमल त्रिविध वायु साँप की साँस-सी। कहने से भी कुछ दुख घट सकता है — पर किससे कहूँ? इसे कोई नहीं जानता। हे प्रिय! मेरे और तुम्हारे प्रेम का तत्त्व केवल मेरा मन जानता है, और वह मन सदा तुम्हारे पास रहता है; प्रेम का रस इतने में ही जान लो।'" प्रभु का संदेश सुनते ही वैदेही प्रेम में मग्न हो गईं, उन्हें शरीर की सुधि न रही। कपि बोले — "हे माता! हृदय में धीरज धरो; सेवकों को सुख देने वाले राम का स्मरण करो। रघुपति की प्रभुता हृदय में लाओ, और मेरे वचन सुनकर कायरता त्याग दो। निशाचरों के समूह पतंगे-समान हैं और रघुपति के बाण अग्नि; हे जननी! हृदय में धीरज धरो — निशाचरों को जला हुआ ही जानो।"