अध्याय 2, श्लोक 12
अध्याय 2: Mahiṣāsura-Sainya Vadha — महिषासुरसैन्यवधअतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम् । एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥
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लिप्यंतरण
atulaṃ tatra tattejaḥ sarvadevaśarīrajam ekasthaṃ tadabhūnnārī vyāptalokatrayaṃ tviṣā
अर्थ
देवताओं के शरीरों से उत्पन्न वह अतुलनीय तेज एक स्थान पर एकत्र होकर एक नारी (देवी) बन गया, जो अपनी कांति से तीनों लोकों में व्याप्त था।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 2.12 का अर्थ क्या है?▼
देवताओं के शरीरों से उत्पन्न वह अतुलनीय तेज एक स्थान पर एकत्र होकर एक नारी (देवी) बन गया, जो अपनी कांति से तीनों लोकों में व्याप्त था।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 2 (Mahiṣāsura-Sainya Vadha — महिषासुर की सेना का वध) का 12वाँ श्लोक है।