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दुर्गा सप्तशती 2.37

अध्याय 2, श्लोक 37

अध्याय 2: Mahiṣāsura-Sainya Vadhaमहिषासुरसैन्यवध

पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम् क्षोभिताशेषपातालां धनुर्ज्यानिःस्वनेन ताम्

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लिप्यंतरण

pādākrāntyā natabhuvaṃ kirīṭollikhitāmbarām kṣobhitāśeṣapātālāṃ dhanurjyāniḥsvanena tām

अर्थ

जो अपने चरण के दबाव से भूमि को झुकाए हुए, मुकुट से आकाश को छूती हुई, धनुष की प्रत्यंचा के नाद से समस्त पाताल को क्षुब्ध करती हुई,

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 2.37 का अर्थ क्या है?
जो अपने चरण के दबाव से भूमि को झुकाए हुए, मुकुट से आकाश को छूती हुई, धनुष की प्रत्यंचा के नाद से समस्त पाताल को क्षुब्ध करती हुई,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 2 (Mahiṣāsura-Sainya Vadha — महिषासुर की सेना का वध) का 37वाँ श्लोक है।