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दुर्गा सप्तशती · Madhyama Charita · अध्याय 3 / 13

महिषासुरवध

Mahiṣāsura Vadha

महिषासुर वध · 41 श्लोक

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अध्याय सारांश

मध्यम चरित्र की पराकाष्ठा में देवी स्वयं महिषासुर का वध करती हैं। चिक्षुर, चामर, उदग्र, कराल, उद्धत, बाष्कल, ताम्र, अंधक आदि उसके सेनापतियों को मारने के पश्चात् देवी महिषासुर का सामना करती हैं, जो भैंसे के रूप में उनके गणों को त्रस्त करता है। वह भैंसे से सिंह, सिंह से मनुष्य, फिर हाथी और पुनः भैंसे का रूप धारण करता है; दिव्य मधु पीती और लाल नेत्रों से हँसती हुई देवी उसे ललकारती हैं — 'अरे मूढ़! जब तक मैं यह मधु पी रही हूँ तब तक गरज ले; तुझे मारने पर देवता गरजेंगे।' उस पर कूदकर देवी अपने चरण से उसका कण्ठ दबाती हैं, त्रिशूल से बेधती हैं और महाखड्ग से उसका सिर काट देती हैं। असुर-सेना नष्ट हो जाती है और देवता हर्षित होते हैं, ऋषि-गंधर्व गाते और अप्सराएँ नृत्य करती हैं।

ध्यान — आरम्भिक मंगलाचरण

उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम् हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं देवीं बद्धहिमांशुरत्नमुकुटां वन्देऽरविन्दस्थिताम्

oṃ udyadbhānusahasrakāntimaruṇakṣaumāṃ śiromālikāṃ raktāliptapayodharāṃ japavaṭīṃ vidyāmabhītiṃ varam hastābjairdadhatīṃ trinetravilasadvaktrāravindaśriyaṃ devīṃ baddhahimāṃśuratnamukuṭāṃ vande'ravindasthitām

मैं कमल पर विराजमान उन देवी को प्रणाम करता हूँ, जो सहस्र उदीयमान सूर्यों के समान कांतिमयी, अरुण रेशमी वस्त्र धारण किए, मुण्डमाला पहने और जिनका वक्षःस्थल रक्त से लिप्त है; जो अपने कर-कमलों में जपमाला, विद्या (पुस्तक), अभय और वर मुद्रा धारण किए हुए हैं; जिनका त्रिनेत्रयुक्त मुख-कमल शोभायमान है और जो चन्द्ररत्न-जड़ित मुकुट धारण किए हुए हैं।

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3.1

ऋषिरुवाच निहन्यमानं तत्सैन्यमवलोक्य महासुरः सेनानीश्चिक्षुरः कोपाद्ययौ योद्धुमथाम्बिकाम्

oṃ ṛṣiruvāca nihanyamānaṃ tatsainyamavalokya mahāsuraḥ senānīścikṣuraḥ kopādyayau yoddhumathāmbikām

अर्थ(ॐ। ऋषि बोले —) अपनी सेना का संहार होते देख सेनापति चिक्षुर नामक महान् असुर क्रोध से अम्बिका से युद्ध करने के लिए आगे बढ़ा।

3.2

देवीं शरवर्षेण ववर्ष समरेऽसुरः यथा मेरुगिरेः श‍ृङ्गं तोयवर्षेण तोयदः

sa devīṃ śaravarṣeṇa vavarṣa samare'suraḥ yathā merugireḥ śa‍ṛṅgaṃ toyavarṣeṇa toyadaḥ

अर्थउस असुर ने युद्ध में देवी पर बाणों की वर्षा की, जैसे मेघ मेरु पर्वत के शिखर पर जलवृष्टि करता है।

3.3

तस्य छित्वा ततो देवी लीलयैव शरोत्करान् जघान तुरगान्बाणैर्यन्तारं चैव वाजिनाम्

tasya chitvā tato devī līlayaiva śarotkarān jaghāna turagānbāṇairyantāraṃ caiva vājinām

अर्थतब देवी ने उसके बाण-समूहों को मानो खेल-खेल में ही काटकर, अपने बाणों से उसके घोड़ों और सारथि को भी मार डाला।

3.4

चिच्छेद धनुः सद्यो ध्वजं चातिसमुच्छृतम् विव्याध चैव गात्रेषु छिन्नधन्वानमाशुगैः

ciccheda ca dhanuḥ sadyo dhvajaṃ cātisamucchṛtam vivyādha caiva gātreṣu chinnadhanvānamāśugaiḥ

अर्थउन्होंने तुरंत उसका धनुष और अत्यंत ऊँची ध्वजा काट डाली, और धनुष कट जाने पर उसके अंगों को अपने तीव्र बाणों से बेध दिया।

3.5

सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः अभ्यधावत तां देवीं खड्गचर्मधरोऽसुरः

sacchinnadhanvā viratho hatāśvo hatasārathiḥ abhyadhāvata tāṃ devīṃ khaḍgacarmadharo'suraḥ

अर्थधनुष टूट जाने, रथ नष्ट हो जाने, घोड़े और सारथि मारे जाने पर वह असुर खड्ग और ढाल लेकर देवी पर झपटा।

3.6

सिंहमाहत्य खड्गेन तीक्ष्णधारेण मूर्धनि आजघान भुजे सव्ये देवीमप्यतिवेगवान्

siṃhamāhatya khaḍgena tīkṣṇadhāreṇa mūrdhani ājaghāna bhuje savye devīmapyativegavān

अर्थअत्यंत वेगवान् उस असुर ने तीखी धार वाले खड्ग से सिंह के मस्तक पर प्रहार किया और देवी की बाईं भुजा पर भी वार किया।

3.7

तस्याः खड्गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन ततो जग्राह शूलं कोपादरुणलोचनः

tasyāḥ khaḍgo bhujaṃ prāpya paphāla nṛpanandana tato jagrāha śūlaṃ sa kopādaruṇalocanaḥ

अर्थहे राजकुमार! उसका खड्ग देवी की भुजा से टकराकर टूट गया। तब क्रोध से लाल नेत्र किए उसने शूल उठा लिया।

3.8

चिक्षेप ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः जाज्वल्यमानं तेजोभी रविबिम्बमिवाम्बरात्

cikṣepa ca tatastattu bhadrakālyāṃ mahāsuraḥ jājvalyamānaṃ tejobhī ravibimbamivāmbarāt

अर्थतब उस महान् असुर ने भद्रकाली पर वह शूल फेंका, जो तेज से जाज्वल्यमान था, मानो आकाश से गिरता सूर्यबिम्ब हो।

3.9

दृष्ट्वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुञ्चत तेन तच्छतधा नीतं शूलं महासुरः

dṛṣṭvā tadāpatacchūlaṃ devī śūlamamuñcata tena tacchatadhā nītaṃ śūlaṃ sa ca mahāsuraḥ

अर्थउस आते हुए शूल को देखकर देवी ने अपना शूल छोड़ा; उससे वह शूल सौ टुकड़ों में बँट गया, और वह महान् असुर भी।

3.10

हते तस्मिन्महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ आजगाम गजारूढश्चामरस्त्रिदशार्दनः

hate tasminmahāvīrye mahiṣasya camūpatau ājagāma gajārūḍhaścāmarastridaśārdanaḥ

अर्थमहिष का वह महापराक्रमी सेनापति मारा जाने पर देवद्रोही चामर हाथी पर सवार होकर आया।

3.11

सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्यास्तामम्बिका द्रुतम् हुङ्काराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम्

so'pi śaktiṃ mumocātha devyāstāmambikā drutam huṅkārābhihatāṃ bhūmau pātayāmāsa niṣprabhām

अर्थउसने भी देवी पर शक्ति चलाई; पर अम्बिका ने तुरंत हुँकार मात्र से उसे आहत कर निस्तेज करके भूमि पर गिरा दिया।

3.12

भग्नां शक्तिं निपतितां दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः चिक्षेप चामरः शूलं बाणैस्तदपि साच्छिनत्

bhagnāṃ śaktiṃ nipatitāṃ dṛṣṭvā krodhasamanvitaḥ cikṣepa cāmaraḥ śūlaṃ bāṇaistadapi sācchinat

अर्थअपनी शक्ति को टूटी और गिरी देखकर क्रोध से भरे चामर ने शूल फेंका; पर देवी ने उसे भी अपने बाणों से काट डाला।

3.13

ततः सिंहः समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा

tataḥ siṃhaḥ samutpatya gajakumbhāntare sthitaḥ bāhuyuddhena yuyudhe tenoccaistridaśāriṇā

अर्थतब सिंह ने उछलकर हाथी के कुम्भस्थल (गण्डस्थल) पर स्थित होकर उस देवद्रोही के साथ ऊपर ही बाहुयुद्ध किया।

3.14

युध्यमानौ ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ युयुधातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः

yudhyamānau tatastau tu tasmānnāgānmahīṃ gatau yuyudhāte'tisaṃrabdhau prahārairatidāruṇaiḥ

अर्थयुद्ध करते हुए वे दोनों उस हाथी से उतरकर भूमि पर आ गए, और अत्यंत क्रुद्ध होकर भयंकर प्रहारों से लड़े।

3.15

ततो वेगात् खमुत्पत्य निपत्य मृगारिणा करप्रहारेण शिरश्चामरस्य पृथक् कृतम्

tato vegāt khamutpatya nipatya ca mṛgāriṇā karaprahāreṇa śiraścāmarasya pṛthak kṛtam

अर्थतब सिंह ने वेग से आकाश में उछलकर और नीचे गिरकर पंजे के प्रहार से चामर का सिर धड़ से अलग कर दिया।

3.16

उदग्रश्च रणे देव्या शिलावृक्षादिभिर्हतः दन्तमुष्टितलैश्चैव करालश्च निपातितः

udagraśca raṇe devyā śilāvṛkṣādibhirhataḥ dantamuṣṭitalaiścaiva karālaśca nipātitaḥ

अर्थऔर उदग्र देवी द्वारा रणभूमि में शिला, वृक्ष आदि से मारा गया; तथा कराल भी दाँतों, मुक्कों और हथेलियों से धराशायी कर दिया गया।

3.17

देवी क्रुद्धा गदापातैश्चूर्णयामास चोद्धतम् बाष्कलं भिन्दिपालेन बाणैस्ताम्रं तथान्धकम्

devī kruddhā gadāpātaiścūrṇayāmāsa coddhatam bāṣkalaṃ bhindipālena bāṇaistāmraṃ tathāndhakam

अर्थक्रुद्ध देवी ने उद्धत नामक असुर को गदा के प्रहारों से चूर्ण कर दिया, बाष्कल को भिन्दिपाल से, तथा ताम्र और अंधक को बाणों से (मार डाला)।

3.18

उग्रास्यमुग्रवीर्यं तथैव महाहनुम् त्रिनेत्रा त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी

ugrāsyamugravīryaṃ ca tathaiva ca mahāhanum trinetrā ca triśūlena jaghāna parameśvarī

अर्थत्रिनेत्रा परमेश्वरी ने त्रिशूल से उग्रास्य, उग्रवीर्य और इसी प्रकार महाहनु का वध किया।

3.19

बिडालस्यासिना कायात् पातयामास वै शिरः दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम्

biḍālasyāsinā kāyāt pātayāmāsa vai śiraḥ durdharaṃ durmukhaṃ cobhau śarairninye yamakṣayam

अर्थबिडाल का सिर उन्होंने खड्ग से उसके शरीर से काट गिराया; और दुर्धर तथा दुर्मुख — दोनों को बाणों से यमलोक पहुँचा दिया।

3.20

एवं सङ्क्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान्

evaṃ saṅkṣīyamāṇe tu svasainye mahiṣāsuraḥ māhiṣeṇa svarūpeṇa trāsayāmāsa tān gaṇān

अर्थइस प्रकार अपनी सेना का संहार होते देख महिषासुर ने भैंसे के अपने रूप से देवी के गणों को भयभीत कर दिया —

3.21

कांश्चित्तुण्डप्रहारेण खुरक्षेपैस्तथापरान् लाङ्गूलताडितांश्चान्यान् श‍ृङ्गाभ्यां विदारितान्

kāṃścittuṇḍaprahāreṇa khurakṣepaistathāparān lāṅgūlatāḍitāṃścānyān śa‍ṛṅgābhyāṃ ca vidāritān

अर्थकिसी को थूथन के प्रहार से, किसी को खुरों की मार से, किसी को पूँछ से पीटकर, और किसी को दोनों सींगों से चीरकर;

3.22

वेगेन कांश्चिदपरान्नादेन भ्रमणेन निःश्वासपवनेनान्यान्पातयामास भूतले

vegena kāṃścidaparānnādena bhramaṇena ca niḥśvāsapavanenānyānpātayāmāsa bhūtale

अर्थऔर कुछ अन्य को वेग से, गर्जना से व चक्कर काटने से, तथा कुछ को निःश्वास की वायु से उसने धरती पर गिरा दिया।

3.23

निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः सिंहं हन्तुं महादेव्याः कोपं चक्रे ततोऽम्बिका

nipātya pramathānīkamabhyadhāvata so'suraḥ siṃhaṃ hantuṃ mahādevyāḥ kopaṃ cakre tato'mbikā

अर्थदेवी के गण-समूह (प्रमथों) को गिराकर वह असुर महादेवी के सिंह को मारने दौड़ा; तब अम्बिका क्रोधित हो उठीं।

3.24

सोऽपि कोपान्महावीर्यः खुरक्षुण्णमहीतलः श‍ृङ्गाभ्यां पर्वतानुच्चांश्चिक्षेप ननाद

so'pi kopānmahāvīryaḥ khurakṣuṇṇamahītalaḥ śa‍ṛṅgābhyāṃ parvatānuccāṃścikṣepa ca nanāda ca

अर्थवह महापराक्रमी भी क्रोध से खुरों से धरती को रौंदता हुआ, अपने सींगों से ऊँचे पर्वतों को फेंकने और गरजने लगा।

3.25

वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत लाङ्गूलेनाहतश्चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः

vegabhramaṇavikṣuṇṇā mahī tasya vyaśīryata lāṅgūlenāhataścābdhiḥ plāvayāmāsa sarvataḥ

अर्थउसके वेगपूर्वक चक्कर काटने से कुचली हुई पृथ्वी फटने लगी; और पूँछ से आहत समुद्र चारों ओर उमड़ पड़ा।

3.26

धुतश‍ृङ्गविभिन्नाश्च खण्डं खण्डं ययुर्घनाः श्वासानिलास्ताः शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः

dhutaśa‍ṛṅgavibhinnāśca khaṇḍaṃ khaṇḍaṃ yayurghanāḥ śvāsānilāstāḥ śataśo nipeturnabhaso'calāḥ

अर्थउसके हिलते सींगों से विदीर्ण मेघ टुकड़े-टुकड़े हो गए; और उसके श्वास की वायु से सैकड़ों पर्वत आकाश से गिरने लगे।

3.27

इति क्रोधसमाध्मातमापतन्तं महासुरम् दृष्ट्वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाकरोत्

iti krodhasamādhmātamāpatantaṃ mahāsuram dṛṣṭvā sā caṇḍikā kopaṃ tadvadhāya tadākarot

अर्थइस प्रकार क्रोध से उन्मत्त होकर आते हुए उस महान् असुर को देखकर चण्डिका ने उसके वध के लिए क्रोध किया।

3.28

सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम् तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृधे

sā kṣiptvā tasya vai pāśaṃ taṃ babandha mahāsuram tatyāja māhiṣaṃ rūpaṃ so'pi baddho mahāmṛdhe

अर्थउन्होंने उस पर पाश फेंककर उस महान् असुर को बाँध लिया; महासंग्राम में बँध जाने पर उसने भैंसे का रूप त्याग दिया।

3.29

ततः सिंहोऽभवत्सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः छिनत्ति तावत् पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत

tataḥ siṃho'bhavatsadyo yāvattasyāmbikā śiraḥ chinatti tāvat puruṣaḥ khaḍgapāṇiradṛśyata

अर्थतब वह तत्काल सिंह बन गया; और ज्यों ही अम्बिका उसका सिर काटने को हुईं, त्यों ही वह हाथ में खड्ग लिए पुरुष के रूप में दिखाई दिया।

3.30

तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः तं खड्गचर्मणा सार्धं ततः सोऽभून्महागजः

tata evāśu puruṣaṃ devī ciccheda sāyakaiḥ taṃ khaḍgacarmaṇā sārdhaṃ tataḥ so'bhūnmahāgajaḥ

अर्थदेवी ने तुरंत उस पुरुष को ढाल-तलवार सहित अपने बाणों से बेध डाला; तब वह एक विशाल हाथी बन गया।

3.31

करेण महासिंहं तं चकर्ष जगर्ज कर्षतस्तु करं देवी खड्गेन निरकृन्तत

kareṇa ca mahāsiṃhaṃ taṃ cakarṣa jagarja ca karṣatastu karaṃ devī khaḍgena nirakṛntata

अर्थउसने सूँड़ से देवी के महासिंह को खींचा और गरजा; पर खींचते समय देवी ने खड्ग से उसकी सूँड़ काट डाली।

3.32

ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम्

tato mahāsuro bhūyo māhiṣaṃ vapurāsthitaḥ tathaiva kṣobhayāmāsa trailokyaṃ sacarācaram

अर्थतब उस महान् असुर ने पुनः भैंसे का शरीर धारण कर लिया और पहले की भाँति समस्त चराचर त्रैलोक्य को क्षुब्ध कर दिया।

3.33

ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम् पपौ पुनः पुनश्चैव जहासारुणलोचना

tataḥ kruddhā jaganmātā caṇḍikā pānamuttamam papau punaḥ punaścaiva jahāsāruṇalocanā

अर्थइस पर जगन्माता चण्डिका ने क्रुद्ध होकर बार-बार उत्तम मधु (पेय) पिया और लाल नेत्र किए हँसने लगीं।

3.34

ननर्द चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्धतः विषाणाभ्यां चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान्

nanarda cāsuraḥ so'pi balavīryamadoddhataḥ viṣāṇābhyāṃ ca cikṣepa caṇḍikāṃ prati bhūdharān

अर्थऔर वह असुर भी बल-वीर्य के मद से उन्मत्त होकर गरजा, और अपने सींगों से चण्डिका पर पर्वत फेंकने लगा।

3.35

सा तान्प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः उवाच तं मदोद्धूतमुखरागाकुलाक्षरम्

sā ca tānprahitāṃstena cūrṇayantī śarotkaraiḥ uvāca taṃ madoddhūtamukharāgākulākṣaram

अर्थऔर उसके फेंके हुए उन पर्वतों को बाण-समूहों से चूर्ण करती हुई देवी ने, मद से तमतमाए मुख और लड़खड़ाते स्वर में, उससे कहा —

3.36

देव्युवाच गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम् मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः

devyuvāca garja garja kṣaṇaṃ mūḍha madhu yāvatpibāmyaham mayā tvayi hate'traiva garjiṣyantyāśu devatāḥ

अर्थ(देवी बोलीं —) 'अरे मूढ़! क्षण भर गरज ले, गरज ले, जब तक मैं यह मधु पी रही हूँ। जब मैं तुझे यहीं मार डालूँगी, तब शीघ्र ही देवता गरजेंगे।'

3.37

ऋषिरुवाच एवमुक्त्वा समुत्पत्य सारूढा तं महासुरम् पादेनाक्रम्य कण्ठे शूलेनैनमताडयत्

ṛṣiruvāca evamuktvā samutpatya sārūḍhā taṃ mahāsuram pādenākramya kaṇṭhe ca śūlenainamatāḍayat

अर्थ(ऋषि बोले —) ऐसा कहकर देवी ने उछलकर उस महान् असुर पर चढ़कर, अपने चरण से उसका कण्ठ दबाकर उसे त्रिशूल से मारा।

3.38

ततः सोऽपि पदाक्रान्तस्तया निजमुखात्तदा अर्धनिष्क्रान्त एवासीद्देव्या वीर्येण संवृतः

tataḥ so'pi padākrāntastayā nijamukhāttadā ardhaniṣkrānta evāsīddevyā vīryeṇa saṃvṛtaḥ

अर्थतब देवी के चरण से दबा हुआ वह अपने (भैंसे के) मुख से आधा ही बाहर निकल पाया था कि देवी के पराक्रम से पूरी तरह घिर गया।

3.39

अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः

ardhaniṣkrānta evāsau yudhyamāno mahāsuraḥ tayā mahāsinā devyā śiraśchittvā nipātitaḥ

अर्थइस प्रकार आधा ही निकला हुआ युद्ध करता वह महान् असुर देवी द्वारा महाखड्ग से सिर काटकर गिरा दिया गया।

3.40

ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत् प्रहर्षं परं जग्मुः सकला देवतागणाः

tato hāhākṛtaṃ sarvaṃ daityasainyaṃ nanāśa tat praharṣaṃ ca paraṃ jagmuḥ sakalā devatāgaṇāḥ

अर्थतब 'हाहाकार' करता हुआ वह सम्पूर्ण दैत्य-सैन्य नष्ट हो गया; और समस्त देवगण परम हर्ष को प्राप्त हुए।

3.41

तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं सहदिव्यैर्महर्षिभिः जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः

tuṣṭuvustāṃ surā devīṃ sahadivyairmaharṣibhiḥ jagurgandharvapatayo nanṛtuścāpsarogaṇāḥ

अर्थदेवताओं ने दिव्य महर्षियों सहित देवी की स्तुति की; गंधर्वराज गाने लगे और अप्सराओं के समूह नृत्य करने लगे।