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दुर्गा सप्तशती 2.67

अध्याय 2, श्लोक 67

अध्याय 2: Mahiṣāsura-Sainya Vadhaमहिषासुरसैन्यवध

सिंहो महानादमुत्सृजन् धुतकेसरः शरीरेभ्योऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति

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लिप्यंतरण

sa ca siṃho mahānādamutsṛjan dhutakesaraḥ śarīrebhyo'marārīṇāmasūniva vicinvati

अर्थ

और वह सिंह अयाल झटकता तथा महानाद करता हुआ ऐसे विचरने लगा मानो देवद्रोहियों के शरीरों से प्राणों को ढूँढ़-ढूँढ़कर निकाल रहा हो।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 2.67 का अर्थ क्या है?
और वह सिंह अयाल झटकता तथा महानाद करता हुआ ऐसे विचरने लगा मानो देवद्रोहियों के शरीरों से प्राणों को ढूँढ़-ढूँढ़कर निकाल रहा हो।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 2 (Mahiṣāsura-Sainya Vadha — महिषासुर की सेना का वध) का 67वाँ श्लोक है।