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दुर्गा सप्तशती · Uttama Charita · अध्याय 5 / 13

देव्या दूतसंवाद

Devyā Dūta Saṃvāda

देवी-दूत संवाद · 76 श्लोक

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अध्याय सारांश

उत्तम चरित्र का प्रथम अध्याय (अधिष्ठात्री देवी महासरस्वती)। शुम्भ-निशुम्भ द्वारा स्वर्ग से वंचित देवता हिमालय जाकर प्रसिद्ध 'या देवी सर्वभूतेषु' स्तुति से देवी की आराधना करते हैं, उन्हें उस एक शक्ति के रूप में पूजते हैं जो समस्त प्राणियों में चेतना, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, शक्ति, क्षान्ति, शान्ति, श्रद्धा, लक्ष्मी, दया, माता और जगत् में व्याप्त चिति के रूप में स्थित हैं। पार्वती के शरीर से अम्बिका (कौशिकी) प्रकट होती हैं और पार्वती कृष्णवर्णा कालिका हो जाती हैं। दैत्य-सेवक चण्ड और मुण्ड उनके अनुपम सौंदर्य को देखकर शुम्भ को बताते हैं, जो उन्हें पाने के लिए दूत सुग्रीव को भेजता है। देवी मुस्कुराकर अपनी प्रतिज्ञा कहती हैं: जो युद्ध में उन्हें जीत ले वही उनका पति होगा — अतः शुम्भ या निशुम्भ पहले आकर उन्हें जीतें।

ध्यान — आरम्भिक मंगलाचरण

घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम् गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा- पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्

oṃ ghaṇṭāśūlahalāni śaṅkhamusale cakraṃ dhanuḥ sāyakaṃ hastābjairdadhatīṃ ghanāntavilasacchītāṃśutulyaprabhām gaurīdehasamudbhavāṃ trijagatāmādhārabhūtāṃ mahā- pūrvāmatra sarasvatīmanubhaje śumbhādidaityārdinīm

मैं यहाँ उन महासरस्वती की उपासना करता हूँ, जो शुम्भ आदि दैत्यों का संहार करने वाली, गौरी के शरीर से उत्पन्न और तीनों लोकों की आधारभूता हैं, जो अपने कर-कमलों में घण्टा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण किए हुए हैं, तथा मेघों के बीच चमकते चन्द्रमा के समान कांति वाली हैं।

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5.1

क्लीं ऋषिरुवाच पुरा शुम्भनिशुम्भाभ्यामसुराभ्यां शचीपतेः त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्च हृता मदबलाश्रयात्

oṃ klīṃ ṛṣiruvāca purā śumbhaniśumbhābhyāmasurābhyāṃ śacīpateḥ trailokyaṃ yajñabhāgāśca hṛtā madabalāśrayāt

अर्थ(ॐ क्लीं। ऋषि बोले —) प्राचीन काल में शुम्भ और निशुम्भ नामक दो असुरों ने अपने मद और बल के आश्रय से तीनों लोक तथा इन्द्र (शचीपति) के यज्ञभाग छीन लिए।

5.2

तावेव सूर्यतां तद्वदधिकारं तथैन्दवम् कौबेरमथ याम्यं चक्राते वरुणस्य

tāveva sūryatāṃ tadvadadhikāraṃ tathaindavam kauberamatha yāmyaṃ ca cakrāte varuṇasya ca

अर्थउन दोनों ने ही सूर्य का पद, तथा चन्द्र, कुबेर, यम और वरुण के अधिकार भी अपने हाथ में ले लिए।

5.3

तावेव पवनर्द्धिं चक्रतुर्वह्निकर्म ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः

tāveva pavanarddhiṃ ca cakraturvahnikarma ca tato devā vinirdhūtā bhraṣṭarājyāḥ parājitāḥ

अर्थउन्होंने ही वायु की समृद्धि और अग्नि का कार्य भी हथिया लिया। तब देवता राज्य से भ्रष्ट, पराजित और बहिष्कृत हो गए।

5.4

हृताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यां सर्वे निराकृताः महासुराभ्यां तां देवीं संस्मरन्त्यपराजिताम्

hṛtādhikārāstridaśāstābhyāṃ sarve nirākṛtāḥ mahāsurābhyāṃ tāṃ devīṃ saṃsmarantyaparājitām

अर्थउन दोनों महान् असुरों द्वारा अधिकार छीने जाकर बहिष्कृत समस्त देवता उस अपराजिता देवी का स्मरण करने लगे:

5.5

तयास्माकं वरो दत्तो यथापत्सु स्मृताखिलाः भवतां नाशयिष्यामि तत्क्षणात्परमापदः

tayāsmākaṃ varo datto yathāpatsu smṛtākhilāḥ bhavatāṃ nāśayiṣyāmi tatkṣaṇātparamāpadaḥ

अर्थ'उन्होंने हमें यह वर दिया था — "जब-जब विपत्ति में तुम सब मेरा स्मरण करोगे, उसी क्षण मैं तुम्हारी घोर विपत्तियों का नाश कर दूँगी।"'

5.6

इति कृत्वा मतिं देवा हिमवन्तं नगेश्वरम् जग्मुस्तत्र ततो देवीं विष्णुमायां प्रतुष्टुवुः

iti kṛtvā matiṃ devā himavantaṃ nageśvaram jagmustatra tato devīṃ viṣṇumāyāṃ pratuṣṭuvuḥ

अर्थऐसा निश्चय करके देवता पर्वतराज हिमवान् के पास गए, और वहाँ विष्णुमाया उस देवी की स्तुति करने लगे।

5.7

देवा ऊचुः नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्

devā ūcuḥ namo devyai mahādevyai śivāyai satataṃ namaḥ namaḥ prakṛtyai bhadrāyai niyatāḥ praṇatāḥ sma tām

अर्थ(देवता बोले —) देवी को, महादेवी को, शिवा को निरन्तर नमस्कार; प्रकृति को, भद्रा को नमस्कार — हम नियमपूर्वक उन्हें प्रणाम करते हैं।

5.8

रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः

raudrāyai namo nityāyai gauryai dhātryai namo namaḥ jyotsnāyai cendurūpiṇyai sukhāyai satataṃ namaḥ

अर्थरौद्री को, नित्या को, गौरी को, धात्री को नमस्कार-नमस्कार; ज्योत्स्ना (चाँदनी) को और चन्द्ररूपिणी को, सुख-स्वरूपा को निरन्तर नमस्कार।

5.9

कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः नैरृत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः

kalyāṇyai praṇatāṃ vṛddhyai siddhyai kurmo namo namaḥ nairṛtyai bhūbhṛtāṃ lakṣmyai śarvāṇyai te namo namaḥ

अर्थकल्याणी को, प्रणत जनों की वृद्धिरूपा को, सिद्धि को हम नमस्कार करते हैं; नैऋती को, राजाओं की लक्ष्मी को, शर्वाणी को आपको नमस्कार-नमस्कार।

5.10

दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः

durgāyai durgapārāyai sārāyai sarvakāriṇyai khyātyai tathaiva kṛṣṇāyai dhūmrāyai satataṃ namaḥ

अर्थदुर्गा को, दुर्गम (संसार) से पार उतारने वाली को, सार-स्वरूपा को, सब कुछ करने वाली को, ख्याति को, तथा कृष्णा और धूम्रा को निरन्तर नमस्कार।

5.11

अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः

atisaumyātiraudrāyai natāstasyai namo namaḥ namo jagatpratiṣṭhāyai devyai kṛtyai namo namaḥ

अर्थअत्यन्त सौम्य और अत्यन्त रौद्र रूप वाली को हम नमस्कार करते हैं, उन्हें नमस्कार-नमस्कार; जगत् की प्रतिष्ठा-स्वरूपा कृति-रूप देवी को नमस्कार-नमस्कार।

5.12

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu viṣṇumāyeti śabditā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में 'विष्णुमाया' नाम से कही जाती हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.13

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu cetanetyabhidhīyate namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में 'चेतना' कहलाती हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.14

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu buddhirūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में बुद्धि रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.15

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu nidrārūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में निद्रा रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.16

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu kṣudhārūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में क्षुधा रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.17

या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu chāyārūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में छाया रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.18

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu śaktirūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.19

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu tṛṣṇārūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में तृष्णा रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.20

या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu kṣāntirūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में क्षान्ति (क्षमा) रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.21

या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu jātirūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में जाति रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.22

या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu lajjārūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में लज्जा रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.23

या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu śāntirūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में शान्ति रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.24

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu śraddhārūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में श्रद्धा रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.25

या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu kāntirūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में कान्ति रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.26

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu lakṣmīrūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में लक्ष्मी रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.27

या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu vṛttirūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में वृत्ति रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.28

या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu smṛtirūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में स्मृति रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.29

या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu dayārūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में दया रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.30

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu tuṣṭirūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में तुष्टि रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.31

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu mātṛrūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में मातृ (माता) रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.32

या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

yā devī sarvabhūteṣu bhrāntirūpeṇa saṃsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों में भ्रान्ति रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.33

इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या भूतेषु सततं तस्यै व्याप्त्यै देव्यै नमो नमः

indriyāṇāmadhiṣṭhātrī bhūtānāṃ cākhileṣu yā bhūteṣu satataṃ tasyai vyāptyai devyai namo namaḥ

अर्थजो देवी समस्त प्राणियों की इन्द्रियों की अधिष्ठात्री हैं और सम्पूर्ण भूतों में निरन्तर व्याप्त रहने वाली हैं, उस व्याप्ति-रूपा देवी को नमस्कार-नमस्कार।

5.34

चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत् नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

citirūpeṇa yā kṛtsnametad vyāpya sthitā jagat namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

अर्थजो देवी चिति (चैतन्य) रूप से इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

5.35

स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रया- त्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः

stutā suraiḥ pūrvamabhīṣṭasaṃśrayā- ttathā surendreṇa dineṣu sevitā karotu sā naḥ śubhaheturīśvarī śubhāni bhadrāṇyabhihantu cāpadaḥ

अर्थजो पूर्वकाल में अभीष्ट की प्राप्ति के लिए देवताओं द्वारा स्तुति की गईं और इन्द्र द्वारा प्रतिदिन सेवित रहीं — वे कल्याण की हेतु ईश्वरी हमारा शुभ व मंगल करें और विपत्तियों का नाश करें।

5.36

या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितै- रस्माभिरीशा सुरैर्नमस्यते या स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः

yā sāmprataṃ coddhatadaityatāpitai- rasmābhirīśā ca surairnamasyate yā ca smṛtā tatkṣaṇameva hanti naḥ sarvāpado bhaktivinamramūrtibhiḥ

अर्थऔर जो ईश्वरी इस समय उद्धत दैत्यों से पीड़ित हम तथा भक्ति से विनम्र देवताओं द्वारा वन्दित हैं — जो स्मरण किए जाने पर उसी क्षण हमारी समस्त विपत्तियों का नाश कर देती हैं।

5.37

ऋषिरुवाच एवं स्तवाभियुक्तानां देवानां तत्र पार्वती स्नातुमभ्याययौ तोये जाह्नव्या नृपनन्दन

ṛṣiruvāca evaṃ stavābhiyuktānāṃ devānāṃ tatra pārvatī snātumabhyāyayau toye jāhnavyā nṛpanandana

अर्थ(ऋषि बोले —) हे राजकुमार! जब देवता इस प्रकार स्तुति में लगे थे, तभी पार्वती वहाँ गंगा (जाह्नवी) के जल में स्नान करने आईं।

5.38

साब्रवीत्तान् सुरान् सुभ्रूर्भवद्भिः स्तूयतेऽत्र का शरीरकोशतश्चास्याः समुद्भूताब्रवीच्छिवा

sābravīttān surān subhrūrbhavadbhiḥ stūyate'tra kā śarīrakośataścāsyāḥ samudbhūtābravīcchivā

अर्थउन सुन्दर भौंहों वाली ने उन देवताओं से पूछा: 'यहाँ आप किसकी स्तुति कर रहे हैं?' तभी उन्हीं (पार्वती) के शरीर-कोश से प्रकट होकर शिवा (अम्बिका) बोलीं:

5.39

स्तोत्रं ममैतत्क्रियते शुम्भदैत्यनिराकृतैः देवैः समेतैः समरे निशुम्भेन पराजितैः

stotraṃ mamaitatkriyate śumbhadaityanirākṛtaiḥ devaiḥ sametaiḥ samare niśumbhena parājitaiḥ

अर्थ'शुम्भ दैत्य द्वारा तिरस्कृत और निशुम्भ द्वारा युद्ध में पराजित एकत्रित देवताओं द्वारा यह स्तोत्र मेरे लिए किया जा रहा है।'

5.40

शरीरकोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निःसृताम्बिका कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते

śarīrakośādyattasyāḥ pārvatyā niḥsṛtāmbikā kauśikīti samasteṣu tato lokeṣu gīyate

अर्थचूँकि अम्बिका पार्वती के शरीर-कोश से निकलीं, इसीलिए समस्त लोकों में वे 'कौशिकी' नाम से गाई जाती हैं।

5.41

तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाभूत्सापि पार्वती कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया

tasyāṃ vinirgatāyāṃ tu kṛṣṇābhūtsāpi pārvatī kāliketi samākhyātā himācalakṛtāśrayā

अर्थउनके निकल जाने पर पार्वती भी कृष्णवर्णा हो गईं और 'कालिका' नाम से विख्यात होकर हिमालय पर निवास करने लगीं।

5.42

ततोऽम्बिकां परं रूपं बिभ्राणां सुमनोहरम् ददर्श चण्डो मुण्डश्च भृत्यौ शुम्भनिशुम्भयोः

tato'mbikāṃ paraṃ rūpaṃ bibhrāṇāṃ sumanoharam dadarśa caṇḍo muṇḍaśca bhṛtyau śumbhaniśumbhayoḥ

अर्थतब शुम्भ-निशुम्भ के दो सेवक चण्ड और मुण्ड ने उस परम मनोहर रूप को धारण किए हुए अम्बिका को देखा।

5.43

ताभ्यां शुम्भाय चाख्याता सातीव सुमनोहरा काप्यास्ते स्त्री महाराज भासयन्ती हिमाचलम्

tābhyāṃ śumbhāya cākhyātā sātīva sumanoharā kāpyāste strī mahārāja bhāsayantī himācalam

अर्थउन दोनों ने शुम्भ से कहा: 'हे महाराज! कोई अत्यन्त मनोहर स्त्री वहाँ रह रही है, जो हिमालय को प्रकाशित कर रही है।

5.44

नैव तादृक् क्वचिद्रूपं दृष्टं केनचिदुत्तमम् ज्ञायतां काप्यसौ देवी गृह्यतां चासुरेश्वर

naiva tādṛk kvacidrūpaṃ dṛṣṭaṃ kenaciduttamam jñāyatāṃ kāpyasau devī gṛhyatāṃ cāsureśvara

अर्थवैसा उत्तम रूप कभी किसी ने कहीं नहीं देखा। हे असुरेश्वर! पता लगाइए कि वह देवी कौन है, और उसे ग्रहण कर लीजिए।

5.45

स्त्रीरत्नमतिचार्वङ्गी द्योतयन्ती दिशस्त्विषा सा तु तिष्ठति दैत्येन्द्र तां भवान् द्रष्टुमर्हति

strīratnamaticārvaṅgī dyotayantī diśastviṣā sā tu tiṣṭhati daityendra tāṃ bhavān draṣṭumarhati

अर्थअत्यन्त सुन्दर अंगों वाली, अपनी कांति से दिशाओं को प्रकाशित करती वह स्त्री-रत्न वहाँ विराजमान है, हे दैत्येन्द्र! आप उसे देखने योग्य हैं।

5.46

यानि रत्नानि मणयो गजाश्वादीनि वै प्रभो त्रैलोक्ये तु समस्तानि साम्प्रतं भान्ति ते गृहे

yāni ratnāni maṇayo gajāśvādīni vai prabho trailokye tu samastāni sāmprataṃ bhānti te gṛhe

अर्थहे प्रभो! तीनों लोकों में जो भी रत्न, मणियाँ, हाथी-घोड़े आदि हैं, वे सब इस समय आपके घर में सुशोभित हैं।

5.47

ऐरावतः समानीतो गजरत्नं पुरन्दरात् पारिजाततरुश्चायं तथैवोच्चैःश्रवा हयः

airāvataḥ samānīto gajaratnaṃ purandarāt pārijātataruścāyaṃ tathaivoccaiḥśravā hayaḥ

अर्थहाथियों में रत्न ऐरावत इन्द्र से लाया गया, यह पारिजात वृक्ष भी, और वैसे ही उच्चैःश्रवा घोड़ा।

5.48

विमानं हंससंयुक्तमेतत्तिष्ठति तेऽङ्गणे रत्नभूतमिहानीतं यदासीद्वेधसोऽद्भुतम्

vimānaṃ haṃsasaṃyuktametattiṣṭhati te'ṅgaṇe ratnabhūtamihānītaṃ yadāsīdvedhaso'dbhutam

अर्थयह हंसों से जुता हुआ अद्भुत विमान, जो ब्रह्मा का रत्न था, यहाँ लाया जाकर आपके आँगन में खड़ा है।

5.49

निधिरेष महापद्मः समानीतो धनेश्वरात् किञ्जल्किनीं ददौ चाब्धिर्मालामम्लानपङ्कजाम्

nidhireṣa mahāpadmaḥ samānīto dhaneśvarāt kiñjalkinīṃ dadau cābdhirmālāmamlānapaṅkajām

अर्थयह महापद्म नामक निधि धनपति कुबेर से लाई गई; और समुद्र ने कभी न मुरझाने वाले कमलों की किंजल्किनी माला दी।

5.50

छत्रं ते वारुणं गेहे काञ्चनस्रावि तिष्ठति तथायं स्यन्दनवरो यः पुरासीत्प्रजापतेः

chatraṃ te vāruṇaṃ gehe kāñcanasrāvi tiṣṭhati tathāyaṃ syandanavaro yaḥ purāsītprajāpateḥ

अर्थस्वर्ण बरसाने वाला वरुण का छत्र आपके घर में है; और यह उत्तम रथ भी, जो पहले प्रजापति का था।

5.51

मृत्योरुत्क्रान्तिदा नाम शक्तिरीश त्वया हृता पाशः सलिलराजस्य भ्रातुस्तव परिग्रहे

mṛtyorutkrāntidā nāma śaktirīśa tvayā hṛtā pāśaḥ salilarājasya bhrātustava parigrahe

अर्थहे ईश! मृत्यु की 'उत्क्रान्तिदा' नामक शक्ति आपने हर ली; और जलराज वरुण का पाश आपके भाई के अधिकार में है।

5.52

निशुम्भस्याब्धिजाताश्च समस्ता रत्नजातयः वह्निरपि ददौ तुभ्यमग्निशौचे वाससी

niśumbhasyābdhijātāśca samastā ratnajātayaḥ vahnirapi dadau tubhyamagniśauce ca vāsasī

अर्थऔर समुद्र से उत्पन्न समस्त रत्न-समूह निशुम्भ के पास हैं; अग्नि ने भी आपको अग्नि से शुद्ध (न जलने वाले) दो वस्त्र दिए।

5.53

एवं दैत्येन्द्र रत्नानि समस्तान्याहृतानि ते स्त्रीरत्नमेषा कल्याणी त्वया कस्मान्न गृह्यते

evaṃ daityendra ratnāni samastānyāhṛtāni te strīratnameṣā kalyāṇī tvayā kasmānna gṛhyate

अर्थइस प्रकार हे दैत्येन्द्र! समस्त रत्न आपके पास लाए जा चुके हैं। फिर यह कल्याणमयी स्त्री-रत्न आप क्यों नहीं ग्रहण करते?'

5.54

ऋषिरुवाच निशम्येति वचः शुम्भः तदा चण्डमुण्डयोः प्रेषयामास सुग्रीवं दूतं देव्या महासुरम्

ṛṣiruvāca niśamyeti vacaḥ śumbhaḥ sa tadā caṇḍamuṇḍayoḥ preṣayāmāsa sugrīvaṃ dūtaṃ devyā mahāsuram

अर्थ(ऋषि बोले —) चण्ड और मुण्ड के ये वचन सुनकर शुम्भ ने तब महान् असुर सुग्रीव को देवी के पास दूत बनाकर भेजा:

5.55

इति चेति वक्तव्या सा गत्वा वचनान्मम यथा चाभ्येति सम्प्रीत्या तथा कार्यं त्वया लघु

iti ceti ca vaktavyā sā gatvā vacanānmama yathā cābhyeti samprītyā tathā kāryaṃ tvayā laghu

अर्थ'मेरे कहने से जाकर उससे इस प्रकार और इस प्रकार कहना, जिससे वह प्रसन्नतापूर्वक चली आए — और तुम यह कार्य शीघ्र करना।'

5.56

तत्र गत्वा यत्रास्ते शैलोद्देशेऽतिशोभने तां देवीं ततः प्राह श्लक्ष्णं मधुरया गिरा

sa tatra gatvā yatrāste śailoddeśe'tiśobhane tāṃ ca devīṃ tataḥ prāha ślakṣṇaṃ madhurayā girā

अर्थवह वहाँ गया जहाँ देवी उस अत्यन्त शोभायमान पर्वत-प्रदेश पर विराजमान थीं, और फिर मधुर वाणी में कोमलता से देवी से बोला:

5.57

दूत उवाच देवि दैत्येश्वरः शुम्भस्त्रैलोक्ये परमेश्वरः दूतोऽहं प्रेषितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः

dūta uvāca devi daityeśvaraḥ śumbhastrailokye parameśvaraḥ dūto'haṃ preṣitastena tvatsakāśamihāgataḥ

अर्थ(दूत बोला —) 'हे देवी! दैत्येश्वर शुम्भ तीनों लोकों के परमेश्वर हैं; मैं उनका दूत हूँ, उनके भेजने पर यहाँ आपके पास आया हूँ।

5.58

अव्याहताज्ञः सर्वासु यः सदा देवयोनिषु निर्जिताखिलदैत्यारिः यदाह श‍ृणुष्व तत्

avyāhatājñaḥ sarvāsu yaḥ sadā devayoniṣu nirjitākhiladaityāriḥ sa yadāha śa‍ṛṇuṣva tat

अर्थजिनकी आज्ञा समस्त देवयोनियों में अबाधित रहती है, जिन्होंने दैत्यों के समस्त शत्रुओं को जीत लिया — वे जो कहते हैं, उसे सुनिए:

5.59

मम त्रैलोक्यमखिलं मम देवा वशानुगाः यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्नामि पृथक् पृथक्

mama trailokyamakhilaṃ mama devā vaśānugāḥ yajñabhāgānahaṃ sarvānupāśnāmi pṛthak pṛthak

अर्थ"समस्त त्रैलोक्य मेरा है, देवता मेरे वश में हैं; मैं समस्त यज्ञभागों को अलग-अलग भोगता हूँ।

5.60

त्रैलोक्ये वररत्नानि मम वश्यान्यशेषतः तथैव गजरत्नं हृतं देवेन्द्रवाहनम्

trailokye vararatnāni mama vaśyānyaśeṣataḥ tathaiva gajaratnaṃ ca hṛtaṃ devendravāhanam

अर्थतीनों लोकों के समस्त उत्तम रत्न पूर्णतः मेरे वश में हैं; और वैसे ही देवराज का वाहन हाथी-रत्न भी छीन लिया गया है।

5.61

क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नं ममामरैः उच्चैःश्रवससंज्ञं तत्प्रणिपत्य समर्पितम्

kṣīrodamathanodbhūtamaśvaratnaṃ mamāmaraiḥ uccaiḥśravasasaṃjñaṃ tatpraṇipatya samarpitam

अर्थक्षीरसागर के मंथन से उत्पन्न उच्चैःश्रवा नामक अश्व-रत्न देवताओं ने मुझे प्रणामपूर्वक अर्पित किया।

5.62

यानि चान्यानि देवेषु गन्धर्वेषूरगेषु रत्नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने

yāni cānyāni deveṣu gandharveṣūrageṣu ca ratnabhūtāni bhūtāni tāni mayyeva śobhane

अर्थऔर देवताओं, गन्धर्वों तथा नागों में जो अन्य रत्न-स्वरूप वस्तुएँ थीं, हे शोभने! वे भी मुझ में ही हैं।

5.63

स्त्रीरत्नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम् सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्नभुजो वयम्

strīratnabhūtāṃ tvāṃ devi loke manyāmahe vayam sā tvamasmānupāgaccha yato ratnabhujo vayam

अर्थहे देवी! हम आपको संसार में स्त्री-रत्न मानते हैं; अतः आप हमारे पास आ जाइए, क्योंकि हम रत्नों के भोक्ता हैं।

5.64

मां वा ममानुजं वापि निशुम्भमुरुविक्रमम् भज त्वं चञ्चलापाङ्गि रत्नभूतासि वै यतः

māṃ vā mamānujaṃ vāpi niśumbhamuruvikramam bhaja tvaṃ cañcalāpāṅgi ratnabhūtāsi vai yataḥ

अर्थहे चंचल कटाक्ष वाली! आप मुझे अथवा मेरे महापराक्रमी छोटे भाई निशुम्भ को भजिए, क्योंकि आप निश्चय ही रत्न-स्वरूपा हैं।

5.65

परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यसे मत्परिग्रहात् एतद्बुद्ध्या समालोच्य मत्परिग्रहतां व्रज

paramaiśvaryamatulaṃ prāpsyase matparigrahāt etadbuddhyā samālocya matparigrahatāṃ vraja

अर्थमेरे ग्रहण करने से आप अतुलनीय परम ऐश्वर्य पाएँगी। इसे बुद्धि से विचारकर मेरी स्वीकृति में आइए।"'

5.66

ऋषिरुवाच इत्युक्ता सा तदा देवी गम्भीरान्तःस्मिता जगौ दुर्गा भगवती भद्रा ययेदं धार्यते जगत्

ṛṣiruvāca ityuktā sā tadā devī gambhīrāntaḥsmitā jagau durgā bhagavatī bhadrā yayedaṃ dhāryate jagat

अर्थ(ऋषि बोले —) इस प्रकार कहे जाने पर तब वे देवी — दुर्गा, भगवती, भद्रा, जिनसे यह जगत् धारण किया जाता है — गम्भीर अन्तर्हास के साथ बोलीं:

5.67

देव्युवाच सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चित्त्वयोदितम् त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भो निशुम्भश्चापि तादृशः

devyuvāca satyamuktaṃ tvayā nātra mithyā kiñcittvayoditam trailokyādhipatiḥ śumbho niśumbhaścāpi tādṛśaḥ

अर्थ(देवी बोलीं —) 'तुमने सत्य कहा, इसमें तुमने कुछ भी असत्य नहीं कहा। शुम्भ सचमुच त्रैलोक्य का अधिपति है, और वैसा ही निशुम्भ भी।

5.68

किं त्वत्र यत्प्रतिज्ञातं मिथ्या तत्क्रियते कथम् श्रूयतामल्पबुद्धित्वात्प्रतिज्ञा या कृता पुरा

kiṃ tvatra yatpratijñātaṃ mithyā tatkriyate katham śrūyatāmalpabuddhitvātpratijñā yā kṛtā purā

अर्थकिन्तु इस विषय में जो प्रतिज्ञा की गई है, वह मिथ्या कैसे की जाए? अल्पबुद्धिवश पहले मैंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे सुनो:

5.69

यो मां जयति सङ्ग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति यो मे प्रतिबलो लोके मे भर्ता भविष्यति

yo māṃ jayati saṅgrāme yo me darpaṃ vyapohati yo me pratibalo loke sa me bhartā bhaviṣyati

अर्थ'जो मुझे युद्ध में जीत ले, जो मेरे दर्प को दूर कर दे, जो संसार में मेरे बराबर बल वाला हो — वही मेरा पति होगा।'

5.70

तदागच्छतु शुम्भोऽत्र निशुम्भो वा महाबलः मां जित्वा किं चिरेणात्र पाणिं गृह्णातु मे लघु

tadāgacchatu śumbho'tra niśumbho vā mahābalaḥ māṃ jitvā kiṃ cireṇātra pāṇiṃ gṛhṇātu me laghu

अर्थअतः शुम्भ यहाँ आ जाए, अथवा महाबली निशुम्भ; मुझे जीतकर वह शीघ्र मेरा पाणिग्रहण कर ले — विलम्ब से क्या?'

5.71

दूत उवाच अवलिप्तासि मैवं त्वं देवि ब्रूहि ममाग्रतः त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेदग्रे शुम्भनिशुम्भयोः

dūta uvāca avaliptāsi maivaṃ tvaṃ devi brūhi mamāgrataḥ trailokye kaḥ pumāṃstiṣṭhedagre śumbhaniśumbhayoḥ

अर्थ(दूत बोला —) 'तुम घमण्ड में हो। हे देवी! मेरे सामने ऐसा मत कहो! तीनों लोकों में कौन पुरुष शुम्भ-निशुम्भ के सामने टिक सकता है?

5.72

अन्येषामपि दैत्यानां सर्वे देवा वै युधि तिष्ठन्ति सम्मुखे देवि किं पुनः स्त्री त्वमेकिका

anyeṣāmapi daityānāṃ sarve devā na vai yudhi tiṣṭhanti sammukhe devi kiṃ punaḥ strī tvamekikā

अर्थहे देवी! अन्य दैत्यों के सामने भी समस्त देवता युद्ध में नहीं ठहर पाते; फिर तुम अकेली स्त्री तो कैसे ठहरोगी?

5.73

इन्द्राद्याः सकला देवास्तस्थुर्येषां संयुगे शुम्भादीनां कथं तेषां स्त्री प्रयास्यसि सम्मुखम्

indrādyāḥ sakalā devāstasthuryeṣāṃ na saṃyuge śumbhādīnāṃ kathaṃ teṣāṃ strī prayāsyasi sammukham

अर्थजिनके सामने इन्द्र आदि समस्त देवता युद्ध में नहीं टिक सके, उन शुम्भ आदि के सामने तुम स्त्री होकर कैसे जाओगी?

5.74

सा त्वं गच्छ मयैवोक्ता पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः केशाकर्षणनिर्धूतगौरवा मा गमिष्यसि

sā tvaṃ gaccha mayaivoktā pārśvaṃ śumbhaniśumbhayoḥ keśākarṣaṇanirdhūtagauravā mā gamiṣyasi

अर्थअतः मेरे कहने से तुम शुम्भ-निशुम्भ के पास चली जाओ; ऐसा न हो कि केश पकड़कर खींचे जाने से तुम्हारा गौरव नष्ट हो जाए।'

5.75

देव्युवाच एवमेतद् बली शुम्भो निशुम्भश्चापितादृशः किं करोमि प्रतिज्ञा मे यदनालोचिता पुरा

devyuvāca evametad balī śumbho niśumbhaścāpitādṛśaḥ kiṃ karomi pratijñā me yadanālocitā purā

अर्थ(देवी बोलीं —) 'ऐसा ही है — शुम्भ बलवान् है, और निशुम्भ भी वैसा ही। मैं क्या करूँ? मेरी प्रतिज्ञा पहले बिना विचारे ही की गई थी।

5.76

त्वं गच्छ मयोक्तं ते यदेतत्सर्वमादृतः तदाचक्ष्वासुरेन्द्राय युक्तं करोतु यत्

sa tvaṃ gaccha mayoktaṃ te yadetatsarvamādṛtaḥ tadācakṣvāsurendrāya sa ca yuktaṃ karotu yat

अर्थअतः तुम जाओ, और जो कुछ मैंने कहा है वह सब आदरपूर्वक असुरराज से कह दो; और वह जो उचित हो वही करे।'