अध्याय 5, श्लोक 71
अध्याय 5: Devyā Dūta Saṃvāda — देव्या दूतसंवाददूत उवाच अवलिप्तासि मैवं त्वं देवि ब्रूहि ममाग्रतः । त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेदग्रे शुम्भनिशुम्भयोः ॥
🔊 किसी भी शब्द को सुनने के लिए टैप करें — या पूरा श्लोक सुनने के लिए ▶ दबाएँ
लिप्यंतरण
dūta uvāca avaliptāsi maivaṃ tvaṃ devi brūhi mamāgrataḥ trailokye kaḥ pumāṃstiṣṭhedagre śumbhaniśumbhayoḥ
अर्थ
(दूत बोला —) 'तुम घमण्ड में हो। हे देवी! मेरे सामने ऐसा मत कहो! तीनों लोकों में कौन पुरुष शुम्भ-निशुम्भ के सामने टिक सकता है?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 5.71 का अर्थ क्या है?▼
(दूत बोला —) 'तुम घमण्ड में हो। हे देवी! मेरे सामने ऐसा मत कहो! तीनों लोकों में कौन पुरुष शुम्भ-निशुम्भ के सामने टिक सकता है?
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 5 (Devyā Dūta Saṃvāda — देवी-दूत संवाद) का 71वाँ श्लोक है।