अध्याय 5, श्लोक 50
अध्याय 5: Devyā Dūta Saṃvāda — देव्या दूतसंवादछत्रं ते वारुणं गेहे काञ्चनस्रावि तिष्ठति । तथायं स्यन्दनवरो यः पुरासीत्प्रजापतेः ॥
🔊 किसी भी शब्द को सुनने के लिए टैप करें — या पूरा श्लोक सुनने के लिए ▶ दबाएँ
लिप्यंतरण
chatraṃ te vāruṇaṃ gehe kāñcanasrāvi tiṣṭhati tathāyaṃ syandanavaro yaḥ purāsītprajāpateḥ
अर्थ
स्वर्ण बरसाने वाला वरुण का छत्र आपके घर में है; और यह उत्तम रथ भी, जो पहले प्रजापति का था।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 5.50 का अर्थ क्या है?▼
स्वर्ण बरसाने वाला वरुण का छत्र आपके घर में है; और यह उत्तम रथ भी, जो पहले प्रजापति का था।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 5 (Devyā Dūta Saṃvāda — देवी-दूत संवाद) का 50वाँ श्लोक है।