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दुर्गा सप्तशती 5.61

अध्याय 5, श्लोक 61

अध्याय 5: Devyā Dūta Saṃvādaदेव्या दूतसंवाद

क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नं ममामरैः उच्चैःश्रवससंज्ञं तत्प्रणिपत्य समर्पितम्

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लिप्यंतरण

kṣīrodamathanodbhūtamaśvaratnaṃ mamāmaraiḥ uccaiḥśravasasaṃjñaṃ tatpraṇipatya samarpitam

अर्थ

क्षीरसागर के मंथन से उत्पन्न उच्चैःश्रवा नामक अश्व-रत्न देवताओं ने मुझे प्रणामपूर्वक अर्पित किया।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 5.61 का अर्थ क्या है?
क्षीरसागर के मंथन से उत्पन्न उच्चैःश्रवा नामक अश्व-रत्न देवताओं ने मुझे प्रणामपूर्वक अर्पित किया।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 5 (Devyā Dūta Saṃvāda — देवी-दूत संवाद) का 61वाँ श्लोक है।