धूम्रलोचनवध
Dhūmralocana Vadha
धूम्रलोचन वध · 20 श्लोक
▶ पाठ सुनेंअध्याय सारांश
देवी के उत्तर से क्षुब्ध होकर शुम्भ सेनापति धूम्रलोचन को साठ हज़ार असुरों के साथ देवी को बलपूर्वक पकड़ लाने भेजता है। जब वह उन्हें केश पकड़कर घसीटने की धमकी देता है, तब देवी एक 'हुँकार' मात्र से उसे भस्म कर देती हैं। फिर उनका सिंह उसकी विशाल सेना पर टूट पड़ता है और क्षण भर में उसे नष्ट कर देता है, असुरों को पंजों व दाँतों से चीर डालता है। धूम्रलोचन के वध और सेना के संहार का समाचार सुनकर क्रुद्ध शुम्भ महान् असुर चण्ड और मुण्ड को देवी को बाँध लाने अथवा मार डालने का आदेश देता है।
✦ ध्यान — आरम्भिक मंगलाचरण
ॐ नागाधीश्वरविष्टरां फणिफणोत्तंसोरु रत्नावली- भास्वद्देहलतां दिवाकरनिभां नेत्रत्रयोद्भासिताम् । मालाकुम्भकपालनीरजकरां चन्द्रार्धचूडां परां सर्वज्ञेश्वरभैरवाङ्गनिलयां पद्मावतीं चिन्तये ॥
oṃ nāgādhīśvaraviṣṭarāṃ phaṇiphaṇottaṃsoru ratnāvalī- bhāsvaddehalatāṃ divākaranibhāṃ netratrayodbhāsitām mālākumbhakapālanīrajakarāṃ candrārdhacūḍāṃ parāṃ sarvajñeśvarabhairavāṅganilayāṃ padmāvatīṃ cintaye
मैं उन परम देवी पद्मावती का ध्यान करता हूँ, जो नागराज के आसन पर विराजमान हैं, जिनकी लता-समान देह सर्प-फणों पर सजी रत्नावली से देदीप्यमान है, जो सूर्य के समान कांतिमयी और तीन नेत्रों से प्रकाशित हैं; जो हाथों में माला, कुम्भ, कपाल और कमल धारण किए, मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण किए हैं, और सर्वज्ञेश्वर भैरव के अंग में निवास करती हैं।
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ॐ ऋषिरुवाच इत्याकर्ण्य वचो देव्याः स दूतोऽमर्षपूरितः । समाचष्ट समागम्य दैत्यराजाय विस्तरात् ॥
oṃ ṛṣiruvāca ityākarṇya vaco devyāḥ sa dūto'marṣapūritaḥ samācaṣṭa samāgamya daityarājāya vistarāt
अर्थ(ॐ। ऋषि बोले —) देवी के ये वचन सुनकर वह दूत क्रोध से भरकर लौटा और दैत्यराज के पास आकर विस्तार से सब कह सुनाया।
तस्य दूतस्य तद्वाक्यमाकर्ण्यासुरराट् ततः । सक्रोधः प्राह दैत्यानामधिपं धूम्रलोचनम् ॥
tasya dūtasya tadvākyamākarṇyāsurarāṭ tataḥ sakrodhaḥ prāha daityānāmadhipaṃ dhūmralocanam
अर्थअपने दूत के वे वचन सुनकर असुरराज ने तब क्रोधपूर्वक दैत्यों के अधिपति धूम्रलोचन से कहा:
हे धूम्रलोचनाशु त्वं स्वसैन्यपरिवारितः । तामानय बलाद्दुष्टां केशाकर्षणविह्वलाम् ॥
he dhūmralocanāśu tvaṃ svasainyaparivāritaḥ tāmānaya balādduṣṭāṃ keśākarṣaṇavihvalām
अर्थ'हे धूम्रलोचन! तुम शीघ्र अपनी सेना से घिरे हुए जाओ और उस दुष्टा को केश पकड़कर घसीटते हुए बलपूर्वक यहाँ ले आओ।
तत्परित्राणदः कश्चिद्यदि वोत्तिष्ठतेऽपरः । स हन्तव्योऽमरो वापि यक्षो गन्धर्व एव वा ॥
tatparitrāṇadaḥ kaścidyadi vottiṣṭhate'paraḥ sa hantavyo'maro vāpi yakṣo gandharva eva vā
अर्थऔर यदि कोई अन्य उसकी रक्षा के लिए उठे, तो वह मार डाला जाए — चाहे वह देवता हो, यक्ष हो अथवा गन्धर्व ही क्यों न हो।'
ऋषिरुवाच तेनाज्ञप्तस्ततः शीघ्रं स दैत्यो धूम्रलोचनः । वृतः षष्ट्या सहस्राणामसुराणां द्रुतं ययौ ॥
ṛṣiruvāca tenājñaptastataḥ śīghraṃ sa daityo dhūmralocanaḥ vṛtaḥ ṣaṣṭyā sahasrāṇāmasurāṇāṃ drutaṃ yayau
अर्थ(ऋषि बोले —) इस प्रकार आज्ञा पाकर दैत्य धूम्रलोचन साठ हज़ार असुरों से घिरा हुआ शीघ्र ही चल पड़ा।
स दृष्ट्वा तां ततो देवीं तुहिनाचलसंस्थिताम् । जगादोच्चैः प्रयाहीति मूलं शुम्भनिशुम्भयोः ॥
sa dṛṣṭvā tāṃ tato devīṃ tuhinācalasaṃsthitām jagādoccaiḥ prayāhīti mūlaṃ śumbhaniśumbhayoḥ
अर्थतब हिमालय पर विराजमान देवी को देखकर उसने ऊँचे स्वर में कहा: 'शुम्भ-निशुम्भ के पास चलो!
न चेत्प्रीत्याद्य भवती मद्भर्तारमुपैष्यति । ततो बलान्नयाम्येष केशाकर्षणविह्वलाम् ॥
na cetprītyādya bhavatī madbhartāramupaiṣyati tato balānnayāmyeṣa keśākarṣaṇavihvalām
अर्थयदि तुम आज प्रेमपूर्वक मेरे स्वामी के पास नहीं चलोगी, तो मैं तुम्हें केश पकड़कर घसीटते हुए बलपूर्वक ले चलूँगा।'
देव्युवाच दैत्येश्वरेण प्रहितो बलवान्बलसंवृतः । बलान्नयसि मामेवं ततः किं ते करोम्यहम् ॥
devyuvāca daityeśvareṇa prahito balavānbalasaṃvṛtaḥ balānnayasi māmevaṃ tataḥ kiṃ te karomyaham
अर्थ(देवी बोलीं —) 'तुम दैत्येश्वर द्वारा भेजे गए हो, बलवान् हो और सेना से घिरे हो; यदि तुम इस प्रकार मुझे बलपूर्वक ले जाओगे — तो मैं तुम्हारा क्या कर सकती हूँ (अर्थात् जो होगा उसमें मेरा क्या दोष)?'
ऋषिरुवाच इत्युक्तः सोऽभ्यधावत्तामसुरो धूम्रलोचनः । हुङ्कारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका तदा ॥
ṛṣiruvāca ityuktaḥ so'bhyadhāvattāmasuro dhūmralocanaḥ huṅkāreṇaiva taṃ bhasma sā cakārāmbikā tadā
अर्थ(ऋषि बोले —) इस प्रकार कहे जाने पर असुर धूम्रलोचन उन पर झपटा; और तब अम्बिका ने हुँकार मात्र से उसे भस्म कर दिया।
अथ क्रुद्धं महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका । ववर्ष सायकैस्तीक्ष्णैस्तथा शक्तिपरश्वधैः ॥
atha kruddhaṃ mahāsainyamasurāṇāṃ tathāmbikā vavarṣa sāyakaistīkṣṇaistathā śaktiparaśvadhaiḥ
अर्थतब अम्बिका ने असुरों की क्रुद्ध महासेना पर तीखे बाणों, शक्तियों और परशुओं की वर्षा की।
ततो धुतसटः कोपात्कृत्वा नादं सुभैरवम् । पपातासुरसेनायां सिंहो देव्याः स्ववाहनः ॥
tato dhutasaṭaḥ kopātkṛtvā nādaṃ subhairavam papātāsurasenāyāṃ siṃho devyāḥ svavāhanaḥ
अर्थतभी देवी का वाहन सिंह क्रोध से अयाल झटकता और अत्यन्त भयंकर गर्जना करता हुआ असुर-सेना पर टूट पड़ा।
कांश्चित्करप्रहारेण दैत्यानास्येन चापरान् । आक्रान्त्या चाधरेणान्यान् जघान स महासुरान् ॥
kāṃścitkaraprahāreṇa daityānāsyena cāparān ākrāntyā cādhareṇānyān jaghāna sa mahāsurān
अर्थकिन्हीं महान् असुरों को उसने पंजे के प्रहार से, किन्हीं को मुख से, और किन्हीं अन्य को (शरीर से) दबाकर मार डाला।
केषाञ्चित्पाटयामास नखैः कोष्ठानि केसरी । तथा तलप्रहारेण शिरांसि कृतवान्पृथक् ॥
keṣāñcitpāṭayāmāsa nakhaiḥ koṣṭhāni kesarī tathā talaprahāreṇa śirāṃsi kṛtavānpṛthak
अर्थउस केसरी ने किन्हीं के पेट नखों से फाड़ डाले, और थप्पड़ के प्रहार से सिर अलग कर दिए।
विच्छिन्नबाहुशिरसः कृतास्तेन तथापरे । पपौ च रुधिरं कोष्ठादन्येषां धुतकेसरः ॥
vicchinnabāhuśirasaḥ kṛtāstena tathāpare papau ca rudhiraṃ koṣṭhādanyeṣāṃ dhutakesaraḥ
अर्थउसने औरों को भुजा और सिर से रहित कर दिया; और अयाल झटकते हुए दूसरों के पेट से रक्त पी लिया।
क्षणेन तद्बलं सर्वं क्षयं नीतं महात्मना । तेन केसरिणा देव्या वाहनेनातिकोपिना ॥
kṣaṇena tadbalaṃ sarvaṃ kṣayaṃ nītaṃ mahātmanā tena kesariṇā devyā vāhanenātikopinā
अर्थक्षण भर में देवी के वाहन उस महात्मा अत्यन्त क्रुद्ध सिंह ने उस समस्त सेना को नष्ट कर दिया।
श्रुत्वा तमसुरं देव्या निहतं धूम्रलोचनम् । बलं च क्षयितं कृत्स्नं देवीकेसरिणा ततः ॥
śrutvā tamasuraṃ devyā nihataṃ dhūmralocanam balaṃ ca kṣayitaṃ kṛtsnaṃ devīkesariṇā tataḥ
अर्थजब यह सुना गया कि असुर धूम्रलोचन देवी द्वारा मारा गया और उसकी समस्त सेना देवी के सिंह द्वारा नष्ट कर दी गई,
चुकोप दैत्याधिपतिः शुम्भः प्रस्फुरिताधरः । आज्ञापयामास च तौ चण्डमुण्डौ महासुरौ ॥
cukopa daityādhipatiḥ śumbhaḥ prasphuritādharaḥ ājñāpayāmāsa ca tau caṇḍamuṇḍau mahāsurau
अर्थतब दैत्याधिपति शुम्भ अधर फड़काता हुआ क्रोधित हो उठा, और उसने चण्ड व मुण्ड नामक दो महान् असुरों को आज्ञा दी:
हे चण्ड हे मुण्ड बलैर्बहुभिः परिवारितौ । तत्र गच्छत गत्वा च सा समानीयतां लघु ॥
he caṇḍa he muṇḍa balairbahubhiḥ parivāritau tatra gacchata gatvā ca sā samānīyatāṃ laghu
अर्थ'हे चण्ड! हे मुण्ड! तुम अनेक सेनाओं से घिरे हुए वहाँ जाओ; और जाकर उसे शीघ्र यहाँ ले आओ,
केशेष्वाकृष्य बद्ध्वा वा यदि वः संशयो युधि । तदाशेषायुधैः सर्वैरसुरैर्विनिहन्यताम् ॥
keśeṣvākṛṣya baddhvā vā yadi vaḥ saṃśayo yudhi tadāśeṣāyudhaiḥ sarvairasurairvinihanyatām
अर्थकेश पकड़कर खींचते हुए अथवा बाँधकर। पर यदि तुम्हें युद्ध में (जीत का) संशय हो, तो समस्त असुर सब आयुधों से उसका वध कर डालें।
तस्यां हतायां दुष्टायां सिंहे च विनिपातिते । शीघ्रमागम्यतां बद्ध्वा गृहीत्वा तामथाम्बिकाम् ॥
tasyāṃ hatāyāṃ duṣṭāyāṃ siṃhe ca vinipātite śīghramāgamyatāṃ baddhvā gṛhītvā tāmathāmbikām
अर्थऔर जब वह दुष्टा मारी जाए और सिंह गिरा दिया जाए, तब उस अम्बिका को बाँधकर, पकड़कर शीघ्र लौट आना।'