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दुर्गा सप्तशती · Uttama Charita · अध्याय 7 / 13

चण्डमुण्डवध

Caṇḍa-Muṇḍa Vadha

चण्ड-मुण्ड वध · 25 श्लोक

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अध्याय सारांश

चण्ड और मुण्ड चतुरंगिणी सेना के साथ देवी पर चढ़ाई करते हैं। जब वे उन्हें पकड़ने को बढ़ते हैं, तब अम्बिका का मुख क्रोध से स्याही के समान काला हो जाता है, और उनकी टेढ़ी भौंह से काली प्रकट होती हैं — विकराल मुख, हाथ में खड्ग और पाश, मुण्डमाला पहने, बाघ-चर्म धारण किए। वे असुर-सेना को निगल जाती हैं, हाथियों, रथों और योद्धाओं को मुख में फेंककर उनके शस्त्र दाँतों से चबा डालती हैं। जब चण्ड बाणों से और मुण्ड हज़ारों चक्रों से उन्हें ढक देता है, तब वे भयंकर अट्टहास करती हैं, सिंह पर चढ़कर चण्ड और फिर मुण्ड का सिर काट देती हैं। दोनों के सिर चण्डिका के पास लाकर काली उन्हें युद्ध-यज्ञ की बलि के रूप में अर्पित करती हैं — और देवी प्रसन्न होकर घोषित करती हैं कि अब वे संसार में 'चामुण्डा' नाम से विख्यात होंगी।

ध्यान — आरम्भिक मंगलाचरण

ध्यायेयं रत्नपीठे शुककलपठितं श‍ृण्वतीं श्यामलाङ्गीं न्यस्तैकांघ्रिं सरोजे शशिशकलधरां वल्लकीं वादयन्तीम् कल्हाराबद्धमालां नियमितविलसच्चोलिकां रत्नवस्त्रां मातङ्गी शङ्कपात्रां मधुरमधुमदां चित्रकोद्भासिभालाम्

oṃ dhyāyeyaṃ ratnapīṭhe śukakalapaṭhitaṃ śa‍ṛṇvatīṃ śyāmalāṅgīṃ nyastaikāṃghriṃ saroje śaśiśakaladharāṃ vallakīṃ vādayantīm kalhārābaddhamālāṃ niyamitavilasaccolikāṃ ratnavastrāṃ mātaṅgī śaṅkapātrāṃ madhuramadhumadāṃ citrakodbhāsibhālām

मैं उन मातंगी (महासरस्वती) का ध्यान करता हूँ, जो श्यामल अंगों वाली, रत्नमय आसन पर विराजमान, तोते के मधुर कलरव को सुनती हुई, एक चरण कमल पर रखे, मस्तक पर चन्द्रकला धारण किए वीणा बजाती हुई हैं; जो कुमुद पुष्पों की माला, चमकती चोली और रत्नमय वस्त्र धारण किए, शंख-पात्र लिए, मधुर मधु से किंचित् मत्त, और चित्रक (तिलक) से सुशोभित ललाट वाली हैं।

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7.1

ऋषिरुवाच आज्ञप्तास्ते ततो दैत्याश्चण्डमुण्डपुरोगमाः चतुरङ्गबलोपेता ययुरभ्युद्यतायुधाः

oṃ ṛṣiruvāca ājñaptāste tato daityāścaṇḍamuṇḍapurogamāḥ caturaṅgabalopetā yayurabhyudyatāyudhāḥ

अर्थ(ॐ। ऋषि बोले —) इस प्रकार आज्ञा पाकर वे दैत्य, चण्ड और मुण्ड को आगे करके, चतुरंगिणी सेना से युक्त, शस्त्र उठाए हुए चल पड़े।

7.2

ददृशुस्ते ततो देवीमीषद्धासां व्यवस्थिताम् सिंहस्योपरि शैलेन्द्रश‍ृङ्गे महति काञ्चने

dadṛśuste tato devīmīṣaddhāsāṃ vyavasthitām siṃhasyopari śailendraśa‍ṛṅge mahati kāñcane

अर्थतब उन्होंने पर्वतराज के एक विशाल स्वर्णिम शिखर पर सिंह के ऊपर विराजमान, किंचित् मुस्कुराती देवी को देखा।

7.3

ते दृष्ट्वा तां समादातुमुद्यमं चक्रुरुद्यताः आकृष्टचापासिधरास्तथान्ये तत्समीपगाः

te dṛṣṭvā tāṃ samādātumudyamaṃ cakrurudyatāḥ ākṛṣṭacāpāsidharāstathānye tatsamīpagāḥ

अर्थउन्हें देखकर कुछ असुरों ने उद्यत होकर उन्हें पकड़ने का प्रयत्न किया, और कुछ अन्य धनुष व खड्ग ताने उनके समीप पहुँचे।

7.4

ततः कोपं चकारोच्चैरम्बिका तानरीन्प्रति कोपेन चास्या वदनं मषीवर्णमभूत्तदा

tataḥ kopaṃ cakāroccairambikā tānarīnprati kopena cāsyā vadanaṃ maṣīvarṇamabhūttadā

अर्थतब अम्बिका उन शत्रुओं पर अत्यन्त क्रुद्ध हुईं; और क्रोध से उनका मुख उस समय स्याही के समान काला हो गया।

7.5

भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या ललाटफलकाद्द्रुतम् काली करालवदना विनिष्क्रान्तासिपाशिनी

bhrukuṭīkuṭilāttasyā lalāṭaphalakāddrutam kālī karālavadanā viniṣkrāntāsipāśinī

अर्थउनके भौंहों से टेढ़े हुए ललाट-पटल से सहसा काली प्रकट हुईं, जो विकराल मुख वाली, खड्ग और पाश धारण किए हुए थीं,

7.6

विचित्रखट्वाङ्गधरा नरमालाविभूषणा द्वीपिचर्मपरीधाना शुष्कमांसातिभैरवा

vicitrakhaṭvāṅgadharā naramālāvibhūṣaṇā dvīpicarmaparīdhānā śuṣkamāṃsātibhairavā

अर्थजो विचित्र खट्वांग धारण किए, नर-मुण्डों की माला से विभूषित, बाघ-चर्म पहने, सूखे मांस से अत्यन्त भयंकर थीं,

7.7

अतिविस्तारवदना जिह्वाललनभीषणा निमग्नारक्तनयना नादापूरितदिङ्मुखा

ativistāravadanā jihvālalanabhīṣaṇā nimagnāraktanayanā nādāpūritadiṅmukhā

अर्थजिनका मुख अत्यन्त फैला हुआ, लपलपाती जीभ से भयानक, गहरे लाल नेत्र वाला, और जिनकी गर्जना से दिशाएँ भर गई थीं।

7.8

सा वेगेनाभिपतिता घातयन्ती महासुरान् सैन्ये तत्र सुरारीणामभक्षयत तद्बलम्

sā vegenābhipatitā ghātayantī mahāsurān sainye tatra surārīṇāmabhakṣayata tadbalam

अर्थवे वेग से असुरों पर टूट पड़ीं और महान् असुरों का संहार करती हुईं उस देवशत्रु-सेना को भक्षण करने लगीं।

7.9

पार्ष्णिग्राहाङ्कुशग्राहयोधघण्टासमन्वितान् समादायैकहस्तेन मुखे चिक्षेप वारणान्

pārṣṇigrāhāṅkuśagrāhayodhaghaṇṭāsamanvitān samādāyaikahastena mukhe cikṣepa vāraṇān

अर्थउन्होंने हाथियों को — उनके पृष्ठरक्षकों, महावतों, योद्धाओं और घण्टों सहित — एक ही हाथ से पकड़कर मुख में डाल लिया।

7.10

तथैव योधं तुरगै रथं सारथिना सह निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्चर्वयन्त्यतिभैरवम्

tathaiva yodhaṃ turagai rathaṃ sārathinā saha nikṣipya vaktre daśanaiścarvayantyatibhairavam

अर्थइसी प्रकार योद्धा को घोड़ों, रथ और सारथि सहित मुख में डालकर वे अत्यन्त भयंकर रीति से दाँतों से चबा डालती थीं।

7.11

एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामथ चापरम् पादेनाक्रम्य चैवान्यमुरसान्यमपोथयत्

ekaṃ jagrāha keśeṣu grīvāyāmatha cāparam pādenākramya caivānyamurasānyamapothayat

अर्थकिसी को केश से, किसी को गर्दन से पकड़ लिया; किसी को चरण से कुचलकर और किसी अन्य को वक्षःस्थल से मसल डाला।

7.12

तैर्मुक्तानि शस्त्राणि महास्त्राणि तथासुरैः मुखेन जग्राह रुषा दशनैर्मथितान्यपि

tairmuktāni ca śastrāṇi mahāstrāṇi tathāsuraiḥ mukhena jagrāha ruṣā daśanairmathitānyapi

अर्थऔर उन असुरों द्वारा छोड़े गए शस्त्र-अस्त्रों को उन्होंने मुख से पकड़कर क्रोध से दाँतों से चूर-चूर कर दिया।

7.13

बलिनां तद्बलं सर्वमसुराणां दुरात्मनाम् ममर्दाभक्षयच्चान्यानन्यांश्चाताडयत्तदा

balināṃ tadbalaṃ sarvamasurāṇāṃ durātmanām mamardābhakṣayaccānyānanyāṃścātāḍayattadā

अर्थउन बलवान् दुरात्मा असुरों की समस्त सेना को उन्होंने मसल डाला; कुछ को खा गईं और कुछ अन्य को पीट डाला।

7.14

असिना निहताः केचित्केचित्खट्वाङ्गताडिताः जग्मुर्विनाशमसुरा दन्ताग्राभिहतास्तथा

asinā nihatāḥ kecitkecitkhaṭvāṅgatāḍitāḥ jagmurvināśamasurā dantāgrābhihatāstathā

अर्थकुछ खड्ग से मारे गए, कुछ खट्वांग से आहत हुए; और कुछ अन्य असुर दाँतों के अग्रभाग से आहत होकर नष्ट हो गए।

7.15

क्षणेन तद्बलं सर्वमसुराणां निपातितम् दृष्ट्वा चण्डोऽभिदुद्राव तां कालीमतिभीषणाम्

kṣaṇena tadbalaṃ sarvamasurāṇāṃ nipātitam dṛṣṭvā caṇḍo'bhidudrāva tāṃ kālīmatibhīṣaṇām

अर्थक्षण भर में असुरों की वह समस्त सेना धराशायी हो गई। यह देखकर चण्ड उस अत्यन्त भयानक काली पर झपटा।

7.16

शरवर्षैर्महाभीमैर्भीमाक्षीं तां महासुरः छादयामास चक्रैश्च मुण्डः क्षिप्तैः सहस्रशः

śaravarṣairmahābhīmairbhīmākṣīṃ tāṃ mahāsuraḥ chādayāmāsa cakraiśca muṇḍaḥ kṣiptaiḥ sahasraśaḥ

अर्थमहान् असुर चण्ड ने उस भयंकर नेत्रों वाली देवी को भयानक बाणों की वर्षा से, और मुण्ड ने हज़ारों फेंके हुए चक्रों से ढक दिया।

7.17

तानि चक्राण्यनेकानि विशमानानि तन्मुखम् बभुर्यथार्कबिम्बानि सुबहूनि घनोदरम्

tāni cakrāṇyanekāni viśamānāni tanmukham babhuryathārkabimbāni subahūni ghanodaram

अर्थउनके मुख में प्रवेश करते वे अनेक चक्र ऐसे शोभित हुए मानो बहुत-से सूर्यबिम्ब मेघ के उदर में समा रहे हों।

7.18

ततो जहासातिरुषा भीमं भैरवनादिनी काली करालवदना दुर्दर्शदशनोज्ज्वला

tato jahāsātiruṣā bhīmaṃ bhairavanādinī kālī karālavadanā durdarśadaśanojjvalā

अर्थतब विकराल मुख वाली, भयंकर गर्जना करने वाली, दुर्दर्श दाँतों से उज्ज्वल काली अत्यन्त क्रोध से भयानक अट्टहास करने लगीं।

7.19

उत्थाय महासिंहं देवी चण्डमधावत गृहीत्वा चास्य केशेषु शिरस्तेनासिनाच्छिनत्

utthāya ca mahāsiṃhaṃ devī caṇḍamadhāvata gṛhītvā cāsya keśeṣu śirastenāsinācchinat

अर्थऔर महासिंह पर चढ़कर देवी चण्ड पर दौड़ीं; उसके केश पकड़कर उन्होंने खड्ग से उसका सिर काट डाला।

7.20

अथ मुण्डोऽभ्यधावत्तां दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् तमप्यपातयद्भूमौ सा खड्गाभिहतं रुषा

atha muṇḍo'bhyadhāvattāṃ dṛṣṭvā caṇḍaṃ nipātitam tamapyapātayadbhūmau sā khaḍgābhihataṃ ruṣā

अर्थतब चण्ड को गिरा देखकर मुण्ड उन पर झपटा; क्रोध से खड्ग के प्रहार से उसे भी उन्होंने भूमि पर गिरा दिया।

7.21

हतशेषं ततः सैन्यं दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् मुण्डं सुमहावीर्यं दिशो भेजे भयातुरम्

hataśeṣaṃ tataḥ sainyaṃ dṛṣṭvā caṇḍaṃ nipātitam muṇḍaṃ ca sumahāvīryaṃ diśo bheje bhayāturam

अर्थतब बची-खुची सेना चण्ड को गिरा और महापराक्रमी मुण्ड को (मारा गया) देखकर भयभीत होकर सब दिशाओं में भाग गई।

7.22

शिरश्चण्डस्य काली गृहीत्वा मुण्डमेव प्राह प्रचण्डाट्टहासमिश्रमभ्येत्य चण्डिकाम्

śiraścaṇḍasya kālī ca gṛhītvā muṇḍameva ca prāha pracaṇḍāṭṭahāsamiśramabhyetya caṇḍikām

अर्थऔर काली चण्ड तथा मुण्ड दोनों के सिर लेकर चण्डिका के पास आईं और प्रचण्ड अट्टहास से मिश्रित वचन बोलीं:

7.23

मया तवात्रोपहृतौ चण्डमुण्डौ महापशू युद्धयज्ञे स्वयं शुम्भं निशुम्भं हनिष्यसि

mayā tavātropahṛtau caṇḍamuṇḍau mahāpaśū yuddhayajñe svayaṃ śumbhaṃ niśumbhaṃ ca haniṣyasi

अर्थ'मैं आपके लिए यहाँ चण्ड और मुण्ड — इन दो महापशुओं को — (बलि रूप में) ले आई हूँ; इस युद्ध-यज्ञ में शुम्भ और निशुम्भ का वध आप स्वयं करेंगी।'

7.24

ऋषिरुवाच तावानीतौ ततो दृष्ट्वा चण्डमुण्डौ महासुरौ उवाच कालीं कल्याणी ललितं चण्डिका वचः

ṛṣiruvāca tāvānītau tato dṛṣṭvā caṇḍamuṇḍau mahāsurau uvāca kālīṃ kalyāṇī lalitaṃ caṇḍikā vacaḥ

अर्थ(ऋषि बोले —) तब चण्ड और मुण्ड — इन दोनों महान् असुरों को लाया हुआ देखकर कल्याणी चण्डिका ने काली से यह मधुर वचन कहा:

7.25

यस्माच्चण्डं मुण्डं गृहीत्वा त्वमुपागता चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवी भविष्यसि

yasmāccaṇḍaṃ ca muṇḍaṃ ca gṛhītvā tvamupāgatā cāmuṇḍeti tato loke khyātā devī bhaviṣyasi

अर्थ'चूँकि तुम चण्ड और मुण्ड को पकड़कर आई हो, इसलिए हे देवी! तुम संसार में 'चामुण्डा' नाम से विख्यात होगी।'