रक्तबीजवध
Raktabīja Vadha
रक्तबीज वध · 62 श्लोक
▶ पाठ सुनेंअध्याय सारांश
चण्ड-मुण्ड के वध से क्रुद्ध शुम्भ युद्ध के लिए प्रत्येक असुर-कुल को एकत्र करता है। जब सेना घेरती है, तब ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु, वराह, नृसिंह और इन्द्र की शक्तियाँ देवताओं के शरीर से प्रकट होती हैं — सप्तमातृकाएँ: ब्राह्मणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही और ऐन्द्री — और स्वयं देवी से शिवदूती प्रकट होती हैं, जिन्होंने शिव को दूत बनाया इसी से यह नाम पड़ा। मातृगण असुर-सेनाओं को कुचल देती हैं, तब रक्तबीज आता है — उसके रक्त की जो भी बूँद भूमि पर गिरती है उससे समान बल वाला नया असुर उत्पन्न हो जाता है, और शीघ्र ही संसार उसके प्रतिरूपों से भर जाता है तथा देवता घबरा उठते हैं। तब चण्डिका चामुण्डा (काली) को मुख फैलाकर उसके रक्त की हर बूँद पीने और उससे उत्पन्न प्रत्येक असुर को खा जाने का आदेश देती हैं; रक्तहीन होकर अंततः रक्तबीज गिर पड़ता है, और मातृगण विजय-मद से नृत्य करती हैं।
✦ ध्यान — आरम्भिक मंगलाचरण
ॐ अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं धृतपाशाङ्कुशबाणाचापहस्ताम् । अणिमादिभिरावृतां मयूखै- रहमित्येव विभावये भवानीम् ॥
oṃ aruṇāṃ karuṇātaraṅgitākṣīṃ dhṛtapāśāṅkuśabāṇācāpahastām aṇimādibhirāvṛtāṃ mayūkhai- rahamityeva vibhāvaye bhavānīm
मैं भवानी का 'वे मैं ही हूँ' इस भाव से ध्यान करता हूँ — जो अरुण वर्ण की हैं, जिनके नेत्र करुणा से तरंगित हैं, जो अपने हाथों में पाश, अंकुश, बाण और धनुष धारण किए हुए हैं, और अणिमा आदि (आठ सिद्धियों) रूपी किरणों से घिरी हुई हैं।
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ॐ ऋषिरुवाच चण्डे च निहते दैत्ये मुण्डे च विनिपातिते । बहुलेषु च सैन्येषु क्षयितेष्वसुरेश्वरः ॥
oṃ ṛṣiruvāca caṇḍe ca nihate daitye muṇḍe ca vinipātite bahuleṣu ca sainyeṣu kṣayiteṣvasureśvaraḥ
अर्थ(ॐ। ऋषि बोले —) जब दैत्य चण्ड मारा गया, मुण्ड गिरा दिया गया और बहुत-सी सेनाएँ नष्ट हो गईं, तब असुरराज (शुम्भ) —
ततः कोपपराधीनचेताः शुम्भः प्रतापवान् । उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह ॥
tataḥ kopaparādhīnacetāḥ śumbhaḥ pratāpavān udyogaṃ sarvasainyānāṃ daityānāmādideśa ha
अर्थतब प्रतापी शुम्भ ने, जिसका चित्त क्रोध के अधीन हो गया था, समस्त दैत्य-सेनाओं को सन्नद्ध होने की आज्ञा दी:
अद्य सर्वबलैर्दैत्याः षडशीतिरुदायुधाः । कम्बूनां चतुरशीतिर्निर्यान्तु स्वबलैर्वृताः ॥
adya sarvabalairdaityāḥ ṣaḍaśītirudāyudhāḥ kambūnāṃ caturaśītirniryāntu svabalairvṛtāḥ
अर्थ'आज छियासी उदायुध दैत्य अपनी समस्त सेनाओं और उठाए हुए शस्त्रों सहित निकलें, और चौरासी कम्बु अपने-अपने बलों से घिरे हुए निकलें।
कोटिवीर्याणि पञ्चाशदसुराणां कुलानि वै । शतं कुलानि धौम्राणां निर्गच्छन्तु ममाज्ञया ॥
koṭivīryāṇi pañcāśadasurāṇāṃ kulāni vai śataṃ kulāni dhaumrāṇāṃ nirgacchantu mamājñayā
अर्थकरोड़ों की वीर्य-शक्ति वाले असुरों के पचास कुल, और धौम्रों के सौ कुल मेरी आज्ञा से निकल पड़ें।
कालका दौर्हृदा मौर्वाः कालिकेयास्तथासुराः । युद्धाय सज्जा निर्यान्तु आज्ञया त्वरिता मम ॥
kālakā daurhṛdā maurvāḥ kālikeyāstathāsurāḥ yuddhāya sajjā niryāntu ājñayā tvaritā mama
अर्थकालक, दौर्हृद, मौर्व और कालिकेय असुर युद्ध के लिए सज्ज होकर मेरी आज्ञा से शीघ्र निकलें।'
इत्याज्ञाप्यासुरपतिः शुम्भो भैरवशासनः । निर्जगाम महासैन्यसहस्रैर्बहुभिर्वृतः ॥
ityājñāpyāsurapatiḥ śumbho bhairavaśāsanaḥ nirjagāma mahāsainyasahasrairbahubhirvṛtaḥ
अर्थइस प्रकार आज्ञा देकर भैरव-शासन असुरपति शुम्भ अनेक सहस्र महासेनाओं से घिरा हुआ निकल पड़ा।
आयान्तं चण्डिका दृष्ट्वा तत्सैन्यमतिभीषणम् । ज्यास्वनैः पूरयामास धरणीगगनान्तरम् ॥
āyāntaṃ caṇḍikā dṛṣṭvā tatsainyamatibhīṣaṇam jyāsvanaiḥ pūrayāmāsa dharaṇīgaganāntaram
अर्थउस आती हुई अत्यन्त भयंकर सेना को देखकर चण्डिका ने अपनी धनुष-प्रत्यंचा के नाद से पृथ्वी और आकाश के बीच का भाग भर दिया।
ततः सिंहो महानादमतीव कृतवान्नृप । घण्टास्वनेन तान्नादानम्बिका चोपबृंहयत् ॥
tataḥ siṃho mahānādamatīva kṛtavānnṛpa ghaṇṭāsvanena tānnādānambikā copabṛṃhayat
अर्थतब हे राजन्! उनके सिंह ने अत्यन्त ऊँची गर्जना की; और अम्बिका ने घण्टा के नाद से उन गर्जनाओं को और बढ़ा दिया।
धनुर्ज्यासिंहघण्टानां नादापूरितदिङ्मुखा । निनादैर्भीषणैः काली जिग्ये विस्तारितानना ॥
dhanurjyāsiṃhaghaṇṭānāṃ nādāpūritadiṅmukhā ninādairbhīṣaṇaiḥ kālī jigye vistāritānanā
अर्थधनुष की टंकार, सिंह और घण्टा के नाद से दिशाओं को भरती हुई, मुख फैलाए काली ने भयंकर निनादों से (शत्रुओं को) अभिभूत कर दिया।
तं निनादमुपश्रुत्य दैत्यसैन्यैश्चतुर्दिशम् । देवी सिंहस्तथा काली सरोषैः परिवारिताः ॥
taṃ ninādamupaśrutya daityasainyaiścaturdiśam devī siṃhastathā kālī saroṣaiḥ parivāritāḥ
अर्थउस निनाद को सुनकर दैत्य-सेनाओं ने क्रोध से भरकर चारों ओर से देवी, सिंह और काली को घेर लिया।
एतस्मिन्नन्तरे भूप विनाशाय सुरद्विषाम् । भवायामरसिंहानामतिवीर्यबलान्विताः ॥
etasminnantare bhūpa vināśāya suradviṣām bhavāyāmarasiṃhānāmativīryabalānvitāḥ
अर्थहे राजन्! इसी बीच देवशत्रुओं के विनाश और श्रेष्ठ देवताओं के कल्याण के लिए, अत्यन्त वीर्य और बल से युक्त —
ब्रह्मेशगुहविष्णूनां तथेन्द्रस्य च शक्तयः । शरीरेभ्यो विनिष्क्रम्य तद्रूपैश्चण्डिकां ययुः ॥
brahmeśaguhaviṣṇūnāṃ tathendrasya ca śaktayaḥ śarīrebhyo viniṣkramya tadrūpaiścaṇḍikāṃ yayuḥ
अर्थब्रह्मा, शिव (ईश), गुह (कार्तिकेय), विष्णु तथा इन्द्र की शक्तियाँ उनके शरीरों से उन्हीं के रूपों में निकलकर चण्डिका के पास गईं।
यस्य देवस्य यद्रूपं यथा भूषणवाहनम् । तद्वदेव हि तच्छक्तिरसुरान्योद्धुमाययौ ॥
yasya devasya yadrūpaṃ yathā bhūṣaṇavāhanam tadvadeva hi tacchaktirasurānyoddhumāyayau
अर्थजिस देवता का जैसा रूप, जैसे आभूषण और वाहन थे, उसकी शक्ति भी ठीक वैसी ही होकर असुरों से युद्ध करने आई।
हंसयुक्तविमानस्थे साक्षसूत्रकमण्डलुः । आयाता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणीत्यभिधीयते ॥
haṃsayuktavimānasthe sākṣasūtrakamaṇḍaluḥ āyātā brahmaṇaḥ śaktirbrahmāṇītyabhidhīyate
अर्थहंसयुक्त विमान पर विराजमान, अक्षमाला और कमण्डलु धारण किए ब्रह्मा की शक्ति आईं; वे 'ब्राह्मणी' कहलाती हैं।
माहेश्वरी वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी । महाहिवलया प्राप्ता चन्द्ररेखाविभूषणा ॥
māheśvarī vṛṣārūḍhā triśūlavaradhāriṇī mahāhivalayā prāptā candrarekhāvibhūṣaṇā
अर्थमाहेश्वरी बैल पर सवार, श्रेष्ठ त्रिशूल धारण किए, महासर्पों के कंगन पहने और चन्द्ररेखा से विभूषित होकर आईं।
कौमारी शक्तिहस्ता च मयूरवरवाहना । योद्धुमभ्याययौ दैत्यानम्बिका गुहरूपिणी ॥
kaumārī śaktihastā ca mayūravaravāhanā yoddhumabhyāyayau daityānambikā guharūpiṇī
अर्थगुह (कार्तिकेय) के रूप वाली कौमारी, हाथ में शक्ति लिए और श्रेष्ठ मयूर पर सवार होकर — जो स्वयं अम्बिका हैं — दैत्यों से युद्ध करने आईं।
तथैव वैष्णवी शक्तिर्गरुडोपरि संस्थिता । शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गखड्गहस्ताभ्युपाययौ ॥
tathaiva vaiṣṇavī śaktirgaruḍopari saṃsthitā śaṅkhacakragadāśārṅgakhaḍgahastābhyupāyayau
अर्थवैसे ही गरुड़ पर विराजमान वैष्णवी शक्ति शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और खड्ग हाथों में लिए आईं।
यज्ञवाराहमतुलं रूपं या बिभ्रतो हरेः । शक्तिः साप्याययौ तत्र वाराहीं बिभ्रती तनुम् ॥
yajñavārāhamatulaṃ rūpaṃ yā bibhrato hareḥ śaktiḥ sāpyāyayau tatra vārāhīṃ bibhratī tanum
अर्थजो यज्ञ-वराह का अतुलनीय रूप धारण करते हैं, उन हरि की शक्ति भी वाराही का शरीर धारण कर वहाँ आईं।
नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः । प्राप्ता तत्र सटाक्षेपक्षिप्तनक्षत्रसंहतिः ॥
nārasiṃhī nṛsiṃhasya bibhratī sadṛśaṃ vapuḥ prāptā tatra saṭākṣepakṣiptanakṣatrasaṃhatiḥ
अर्थनृसिंह के समान शरीर धारण किए नारसिंही, अपनी अयाल झटकने से नक्षत्र-समूहों को बिखेरती हुई, वहाँ आईं।
वज्रहस्ता तथैवैन्द्री गजराजोपरि स्थिता । प्राप्ता सहस्रनयना यथा शक्रस्तथैव सा ॥
vajrahastā tathaivaindrī gajarājopari sthitā prāptā sahasranayanā yathā śakrastathaiva sā
अर्थवैसे ही ऐन्द्री वज्र हाथ में लिए गजराज पर विराजमान आईं — सहस्र नेत्रों वाली, ठीक इन्द्र (शक्र) के समान।
ततः परिवृतस्ताभिरीशानो देवशक्तिभिः । हन्यन्तामसुराः शीघ्रं मम प्रीत्याह चण्डिकाम् ॥
tataḥ parivṛtastābhirīśāno devaśaktibhiḥ hanyantāmasurāḥ śīghraṃ mama prītyāha caṇḍikām
अर्थतब उन देव-शक्तियों से घिरे ईशान (शिव) ने चण्डिका से कहा: 'मेरी प्रसन्नता के लिए असुर शीघ्र मारे जाएँ।'
ततो देवीशरीरात्तु विनिष्क्रान्तातिभीषणा । चण्डिका शक्तिरत्युग्रा शिवाशतनिनादिनी ॥
tato devīśarīrāttu viniṣkrāntātibhīṣaṇā caṇḍikā śaktiratyugrā śivāśataninādinī
अर्थतभी देवी के शरीर से चण्डिका की अत्यन्त भयंकर और उग्र शक्ति निकली, जो सौ शिवाओं (शृगालियों) के समान गरजने वाली थी।
सा चाह धूम्रजटिलमीशानमपराजिता । दूत त्वं गच्छ भगवन् पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः ॥
sā cāha dhūmrajaṭilamīśānamaparājitā dūta tvaṃ gaccha bhagavan pārśvaṃ śumbhaniśumbhayoḥ
अर्थऔर उस अपराजिता ने धूम्रवर्ण जटाओं वाले ईशान (शिव) से कहा: 'हे भगवन्! आप दूत बनकर शुम्भ-निशुम्भ के पास जाइए।
ब्रूहि शुम्भं निशुम्भं च दानवावतिगर्वितौ । ये चान्ये दानवास्तत्र युद्धाय समुपस्थिताः ॥
brūhi śumbhaṃ niśumbhaṃ ca dānavāvatigarvitau ye cānye dānavāstatra yuddhāya samupasthitāḥ
अर्थअत्यन्त गर्वित उन दोनों दानवों शुम्भ-निशुम्भ से और वहाँ युद्ध के लिए एकत्र अन्य दानवों से कहिए:
त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः । यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ ॥
trailokyamindro labhatāṃ devāḥ santu havirbhujaḥ yūyaṃ prayāta pātālaṃ yadi jīvitumicchatha
अर्थ'इन्द्र त्रैलोक्य को प्राप्त करें, देवता हविष्य के भोक्ता हों; यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो पाताल चले जाओ।
बलावलेपादथ चेद्भवन्तो युद्धकाङ्क्षिणः । तदागच्छत तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः ॥
balāvalepādatha cedbhavanto yuddhakāṅkṣiṇaḥ tadāgacchata tṛpyantu macchivāḥ piśitena vaḥ
अर्थकिन्तु यदि बल के अभिमान से तुम युद्ध के इच्छुक हो — तो आ जाओ, और मेरी शिवाएँ तुम्हारे मांस से तृप्त हो जाएँ।''
यतो नियुक्तो दौत्येन तया देव्या शिवः स्वयम् । शिवदूतीति लोकेऽस्मिंस्ततः सा ख्यातिमागता ॥
yato niyukto dautyena tayā devyā śivaḥ svayam śivadūtīti loke'smiṃstataḥ sā khyātimāgatā
अर्थचूँकि स्वयं शिव को उस देवी ने दूत-कर्म में नियुक्त किया, इसीलिए वे इस लोक में 'शिवदूती' नाम से विख्यात हुईं।
तेऽपि श्रुत्वा वचो देव्याः शर्वाख्यातं महासुराः । अमर्षापूरिता जग्मुर्यत्र कात्यायनी स्थिता ॥
te'pi śrutvā vaco devyāḥ śarvākhyātaṃ mahāsurāḥ amarṣāpūritā jagmuryatra kātyāyanī sthitā
अर्थवे महान् असुर भी शर्व (शिव) द्वारा कही गई देवी की वाणी सुनकर अमर्ष से भर गए और वहाँ गए जहाँ कात्यायनी विराजमान थीं।
ततः प्रथममेवाग्रे शरशक्त्यृष्टिवृष्टिभिः । ववर्षुरुद्धतामर्षास्तां देवीममरारयः ॥
tataḥ prathamamevāgre śaraśaktyṛṣṭivṛṣṭibhiḥ vavarṣuruddhatāmarṣāstāṃ devīmamarārayaḥ
अर्थतब आरम्भ में ही उद्धत अमर्ष से भरे देवशत्रुओं ने उस देवी पर बाण, शक्ति और ऋष्टि की वर्षा की।
सा च तान् प्रहितान् बाणाञ्छूलशक्तिपरश्वधान् । चिच्छेद लीलयाध्मातधनुर्मुक्तैर्महेषुभिः ॥
sā ca tān prahitān bāṇāñchūlaśaktiparaśvadhān ciccheda līlayādhmātadhanurmuktairmaheṣubhiḥ
अर्थऔर उन्होंने खींचे हुए टंकारते धनुष से छोड़े गए महान् बाणों से उन फेंके हुए बाणों, शूलों, शक्तियों और परशुओं को मानो खेल-खेल में ही काट डाला।
तस्याग्रतस्तथा काली शूलपातविदारितान् । खट्वाङ्गपोथितांश्चारीन्कुर्वती व्यचरत्तदा ॥
tasyāgratastathā kālī śūlapātavidāritān khaṭvāṅgapothitāṃścārīnkurvatī vyacarattadā
अर्थउनके आगे तब काली विचरने लगीं, शूल के प्रहार से शत्रुओं को विदीर्ण और खट्वांग से कुचलती हुईं।
कमण्डलुजलाक्षेपहतवीर्यान् हतौजसः । ब्रह्माणी चाकरोच्छत्रून्येन येन स्म धावति ॥
kamaṇḍalujalākṣepahatavīryān hataujasaḥ brahmāṇī cākarocchatrūnyena yena sma dhāvati
अर्थब्राह्मणी जहाँ-जहाँ दौड़तीं, वहाँ-वहाँ कमण्डलु के जल के छींटों से शत्रुओं के वीर्य और ओज को हर लेतीं।
माहेश्वरी त्रिशूलेन तथा चक्रेण वैष्णवी । दैत्याञ्जघान कौमारी तथा शक्त्यातिकोपना ॥
māheśvarī triśūlena tathā cakreṇa vaiṣṇavī daityāñjaghāna kaumārī tathā śaktyātikopanā
अर्थमाहेश्वरी ने त्रिशूल से, वैष्णवी ने चक्र से, और अत्यन्त क्रुद्ध कौमारी ने शक्ति से दैत्यों का वध किया।
ऐन्द्री कुलिशपातेन शतशो दैत्यदानवाः । पेतुर्विदारिताः पृथ्व्यां रुधिरौघप्रवर्षिणः ॥
aindrī kuliśapātena śataśo daityadānavāḥ peturvidāritāḥ pṛthvyāṃ rudhiraughapravarṣiṇaḥ
अर्थऐन्द्री के वज्र-प्रहार से दैत्य और दानव सैकड़ों की संख्या में विदीर्ण होकर रक्त की धाराएँ बहाते हुए पृथ्वी पर गिर पड़े।
तुण्डप्रहारविध्वस्ता दंष्ट्राग्रक्षतवक्षसः । वाराहमूर्त्या न्यपतंश्चक्रेण च विदारिताः ॥
tuṇḍaprahāravidhvastā daṃṣṭrāgrakṣatavakṣasaḥ vārāhamūrtyā nyapataṃścakreṇa ca vidāritāḥ
अर्थथूथन के प्रहार से ध्वस्त, दाँतों के अग्रभाग से वक्ष-स्थल पर घायल और चक्र से विदीर्ण होकर असुर वाराही के समक्ष गिर पड़े।
नखैर्विदारितांश्चान्यान् भक्षयन्ती महासुरान् । नारसिंही चचाराजौ नादापूर्णदिगम्बरा ॥
nakhairvidāritāṃścānyān bhakṣayantī mahāsurān nārasiṃhī cacārājau nādāpūrṇadigambarā
अर्थअन्य महान् असुरों को नखों से विदीर्ण कर भक्षण करती हुई नारसिंही रणभूमि में विचरने लगीं, उनकी गर्जना से दिशाएँ भर गईं।
चण्डाट्टहासैरसुराः शिवदूत्यभिदूषिताः । पेतुः पृथिव्यां पतितांस्तांश्चखादाथ सा तदा ॥
caṇḍāṭṭahāsairasurāḥ śivadūtyabhidūṣitāḥ petuḥ pṛthivyāṃ patitāṃstāṃścakhādātha sā tadā
अर्थशिवदूती के प्रचण्ड अट्टहासों से विकल हुए असुर पृथ्वी पर गिर पड़े; और तब उन्होंने उन गिरे हुओं को खा लिया।
इति मातृगणं क्रुद्धं मर्दयन्तं महासुरान् । दृष्ट्वाभ्युपायैर्विविधैर्नेशुर्देवारिसैनिकाः ॥
iti mātṛgaṇaṃ kruddhaṃ mardayantaṃ mahāsurān dṛṣṭvābhyupāyairvividhairneśurdevārisainikāḥ
अर्थइस प्रकार क्रुद्ध मातृगण को अनेक उपायों से महान् असुरों का मर्दन करते देख देवशत्रुओं के सैनिक भाग गए।
पलायनपरान्दृष्ट्वा दैत्यान्मातृगणार्दितान् । योद्धुमभ्याययौ क्रुद्धो रक्तबीजो महासुरः ॥
palāyanaparāndṛṣṭvā daityānmātṛgaṇārditān yoddhumabhyāyayau kruddho raktabījo mahāsuraḥ
अर्थमातृगण से पीड़ित दैत्यों को भागते देख क्रुद्ध महान् असुर रक्तबीज युद्ध करने आ पहुँचा।
रक्तबिन्दुर्यदा भूमौ पतत्यस्य शरीरतः । समुत्पतति मेदिन्यां तत्प्रमाणो महासुरः ॥
raktabinduryadā bhūmau patatyasya śarīrataḥ samutpatati medinyāṃ tatpramāṇo mahāsuraḥ
अर्थजब-जब उसके शरीर से रक्त की एक बूँद भूमि पर गिरती, तब-तब पृथ्वी से उसी के बराबर का एक महान् असुर उत्पन्न हो जाता।
युयुधे स गदापाणिरिन्द्रशक्त्या महासुरः । ततश्चैन्द्री स्ववज्रेण रक्तबीजमताडयत् ॥
yuyudhe sa gadāpāṇirindraśaktyā mahāsuraḥ tataścaindrī svavajreṇa raktabījamatāḍayat
अर्थवह महान् असुर गदा हाथ में लिए इन्द्र की शक्ति (ऐन्द्री) से लड़ा; तब ऐन्द्री ने अपने वज्र से रक्तबीज पर प्रहार किया।
कुलिशेनाहतस्याशु बहु सुस्राव शोणितम् । समुत्तस्थुस्ततो योधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ॥
kuliśenāhatasyāśu bahu susrāva śoṇitam samuttasthustato yodhāstadrūpāstatparākramāḥ
अर्थवज्र से आहत होने पर उससे तुरन्त बहुत रक्त बह निकला; तभी उसी के रूप और पराक्रम वाले योद्धा उठ खड़े हुए।
यावन्तः पतितास्तस्य शरीराद्रक्तबिन्दवः । तावन्तः पुरुषा जातास्तद्वीर्यबलविक्रमाः ॥
yāvantaḥ patitāstasya śarīrādraktabindavaḥ tāvantaḥ puruṣā jātāstadvīryabalavikramāḥ
अर्थउसके शरीर से जितनी रक्त की बूँदें गिरीं, उतने ही उसके बल, वीर्य और पराक्रम वाले पुरुष उत्पन्न हो गए।
ते चापि युयुधुस्तत्र पुरुषा रक्तसम्भवाः । समं मातृभिरत्युग्रशस्त्रपातातिभीषणम् ॥
te cāpi yuyudhustatra puruṣā raktasambhavāḥ samaṃ mātṛbhiratyugraśastrapātātibhīṣaṇam
अर्थऔर रक्त से उत्पन्न वे पुरुष भी वहाँ मातृगण के साथ अत्यन्त उग्र शस्त्र-प्रहारों के बीच भयंकर युद्ध करने लगे।
पुनश्च वज्रपातेन क्षतमस्य शिरो यदा । ववाह रक्तं पुरुषास्ततो जाताः सहस्रशः ॥
punaśca vajrapātena kṣatamasya śiro yadā vavāha raktaṃ puruṣāstato jātāḥ sahasraśaḥ
अर्थऔर फिर जब वज्र के प्रहार से उसका सिर घायल हुआ, तब रक्त बहा, और उससे हज़ारों पुरुष उत्पन्न हो गए।
वैष्णवी समरे चैनं चक्रेणाभिजघान ह । गदया ताडयामास ऐन्द्री तमसुरेश्वरम् ॥
vaiṣṇavī samare cainaṃ cakreṇābhijaghāna ha gadayā tāḍayāmāsa aindrī tamasureśvaram
अर्थवैष्णवी ने युद्ध में उसे चक्र से मारा; ऐन्द्री ने उस असुरराज को गदा से पीटा।
वैष्णवीचक्रभिन्नस्य रुधिरस्रावसम्भवैः । सहस्रशो जगद्व्याप्तं तत्प्रमाणैर्महासुरैः ॥
vaiṣṇavīcakrabhinnasya rudhirasrāvasambhavaiḥ sahasraśo jagadvyāptaṃ tatpramāṇairmahāsuraiḥ
अर्थवैष्णवी के चक्र से विदीर्ण उससे बहती रक्त-धाराओं से उत्पन्न उसी के बराबर के महान् असुरों से सहस्रों की संख्या में जगत् भर गया।
शक्त्या जघान कौमारी वाराही च तथासिना । माहेश्वरी त्रिशूलेन रक्तबीजं महासुरम् ॥
śaktyā jaghāna kaumārī vārāhī ca tathāsinā māheśvarī triśūlena raktabījaṃ mahāsuram
अर्थकौमारी ने शक्ति से, वाराही ने खड्ग से, और माहेश्वरी ने त्रिशूल से महान् असुर रक्तबीज पर प्रहार किया।
स चापि गदया दैत्यः सर्वा एवाहनत् पृथक् । मातॄः कोपसमाविष्टो रक्तबीजो महासुरः ॥
sa cāpi gadayā daityaḥ sarvā evāhanat pṛthak mātṝḥ kopasamāviṣṭo raktabījo mahāsuraḥ
अर्थऔर वह दैत्य रक्तबीज महान् असुर क्रोध से भरकर गदा से समस्त मातृकाओं को अलग-अलग मारने लगा।
तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि । पपात यो वै रक्तौघस्तेनासञ्छतशोऽसुराः ॥
tasyāhatasya bahudhā śaktiśūlādibhirbhuvi papāta yo vai raktaughastenāsañchataśo'surāḥ
अर्थशक्ति, शूल आदि से अनेक स्थानों पर आहत उससे जो रक्त-धारा भूमि पर गिरी, उससे सैकड़ों असुर उत्पन्न हो गए।
तैश्चासुरासृक्सम्भूतैरसुरैः सकलं जगत् । व्याप्तमासीत्ततो देवा भयमाजग्मुरुत्तमम् ॥
taiścāsurāsṛksambhūtairasuraiḥ sakalaṃ jagat vyāptamāsīttato devā bhayamājagmuruttamam
अर्थऔर असुर के रक्त से उत्पन्न उन असुरों से सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया; तब देवता अत्यन्त भयभीत हो उठे।
तान् विषण्णान् सुरान् दृष्ट्वा चण्डिका प्राहसत्वरम् । उवाच कालीं चामुण्डे विस्तीर्णं वदनं कुरु ॥
tān viṣaṇṇān surān dṛṣṭvā caṇḍikā prāhasatvaram uvāca kālīṃ cāmuṇḍe vistīrṇaṃ vadanaṃ kuru
अर्थदेवताओं को विषण्ण देख चण्डिका ने हँसकर शीघ्र ही काली से कहा: 'हे चामुण्डे! अपना मुख विस्तृत करो!
मच्छस्त्रपातसम्भूतान् रक्तबिन्दून् महासुरान् । रक्तबिन्दोः प्रतीच्छ त्वं वक्त्रेणानेन वेगिना ॥
macchastrapātasambhūtān raktabindūn mahāsurān raktabindoḥ pratīccha tvaṃ vaktreṇānena veginā
अर्थमेरे शस्त्र-प्रहार से उत्पन्न रक्त की बूँदों को, और रक्त की बूँदों से उत्पन्न महान् असुरों को, इस अपने वेगवान् मुख से ग्रहण करो।
भक्षयन्ती चरन् रणे तदुत्पन्नान्महासुरान् । एवमेष क्षयं दैत्यः क्षेणरक्तो गमिष्यति ॥
bhakṣayantī caran raṇe tadutpannānmahāsurān evameṣa kṣayaṃ daityaḥ kṣeṇarakto gamiṣyati
अर्थउससे उत्पन्न महान् असुरों को खाती हुई रणभूमि में विचरो; इस प्रकार यह दैत्य रक्तहीन होकर नाश को प्राप्त होगा।
भक्ष्यमाणास्त्वया चोग्रा न चोत्पत्स्यन्ति चापरे । इत्युक्त्वा तां ततो देवी शूलेनाभिजघान तम् ॥
bhakṣyamāṇāstvayā cogrā na cotpatsyanti cāpare ityuktvā tāṃ tato devī śūlenābhijaghāna tam
अर्थतुम्हारे द्वारा भक्षण किए जाते हुए ये उग्र (असुर नष्ट हो जाएँगे), और दूसरे उत्पन्न न होंगे।' ऐसा कहकर तब देवी ने उसे शूल से मारा।
मुखेन काली जगृहे रक्तबीजस्य शोणितम् । ततोऽसावाजघानाथ गदया तत्र चण्डिकाम् ॥
mukhena kālī jagṛhe raktabījasya śoṇitam tato'sāvājaghānātha gadayā tatra caṇḍikām
अर्थकाली ने रक्तबीज के रक्त को मुख से पकड़ लिया। तब उसने वहाँ चण्डिका पर गदा से प्रहार किया।
न चास्या वेदनां चक्रे गदापातोऽल्पिकामपि । तस्याहतस्य देहात्तु बहु सुस्राव शोणितम् ॥
na cāsyā vedanāṃ cakre gadāpāto'lpikāmapi tasyāhatasya dehāttu bahu susrāva śoṇitam
अर्थकिन्तु गदा के प्रहार से उन्हें तनिक भी पीड़ा न हुई; और आहत उसके शरीर से बहुत रक्त बह निकला।
यतस्ततस्तद्वक्त्रेण चामुण्डा सम्प्रतीच्छति । मुखे समुद्गता येऽस्या रक्तपातान्महासुराः ॥
yatastatastadvaktreṇa cāmuṇḍā sampratīcchati mukhe samudgatā ye'syā raktapātānmahāsurāḥ
अर्थजहाँ-जहाँ से वह बहता, चामुण्डा उसे मुख से ग्रहण कर लेतीं; और गिरते रक्त से उनके मुख में जो महान् असुर उत्पन्न होते —
तांश्चखादाथ चामुण्डा पपौ तस्य च शोणितम् । देवी शूलेन वज्रेण बाणैरसिभिरृष्टिभिः ॥
tāṃścakhādātha cāmuṇḍā papau tasya ca śoṇitam devī śūlena vajreṇa bāṇairasibhirṛṣṭibhiḥ
अर्थउन्हें चामुण्डा खा जातीं, और उसका रक्त पी जातीं। देवी ने शूल, वज्र, बाण, खड्ग और ऋष्टि से,
जघान रक्तबीजं तं चामुण्डापीतशोणितम् । स पपात महीपृष्ठे शस्त्रसङ्घसमाहतः ॥
jaghāna raktabījaṃ taṃ cāmuṇḍāpītaśoṇitam sa papāta mahīpṛṣṭhe śastrasaṅghasamāhataḥ
अर्थउस रक्तबीज को, जिसका रक्त चामुण्डा पी रही थीं, प्रहार किया; और वह शस्त्र-समूह से आहत होकर भूमि पर गिर पड़ा।
नीरक्तश्च महीपाल रक्तबीजो महासुरः । ततस्ते हर्षमतुलमवापुस्त्रिदशा नृप ॥
nīraktaśca mahīpāla raktabījo mahāsuraḥ tataste harṣamatulamavāpustridaśā nṛpa
अर्थहे राजन्! और वह महान् असुर रक्तबीज रक्तहीन हो गया; तब देवता अतुलनीय हर्ष को प्राप्त हुए।
तेषां मातृगणो जातो ननर्तासृङ्मदोद्धतः ॥
teṣāṃ mātṛgaṇo jāto nanartāsṛṅmadoddhataḥ
अर्थऔर उनका मातृगण रक्त के मद से उन्मत्त होकर नृत्य करने लगा।