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दुर्गा सप्तशती · Uttama Charita · अध्याय 9 / 13

निशुम्भवध

Niśumbha Vadha

निशुम्भ वध · 39 श्लोक

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अध्याय सारांश

राजा सुरथ पूछते हैं कि रक्तबीज के वध के पश्चात् शुम्भ-निशुम्भ ने क्या किया, और मुनि निशुम्भ-वध का वर्णन करते हैं। क्रुद्ध निशुम्भ प्रमुख असुर-सेना के साथ आक्रमण करता है, शुम्भ भी पीछे आता है; घोर बाण-युद्ध छिड़ता है। देवी निशुम्भ का खड्ग और आठ चन्द्रों वाली ढाल काट देती हैं, चक्र से उसकी शक्ति चीर देती हैं, मुक्के से शूल चूर कर देती हैं, त्रिशूल से गदा को भस्म कर देती हैं, और अंत में अपने वेगपूर्वक फेंके शूल से उसका हृदय बेध देती हैं। उसके विदीर्ण हृदय से 'ठहर!' कहता हुआ एक और महाबली प्राणी निकलता है — पर देवी हँसकर उसका सिर काट देती हैं और निशुम्भ गिर पड़ता है। तब सिंह, काली, शिवदूती और सप्तमातृकाएँ असुर-सेना का अन्त कर देती हैं।

ध्यान — आरम्भिक मंगलाचरण

बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम् पाशाङ्कुशवराभीतिर्धारयन्तीं शिवां भजे

oṃ bālārkamaṇḍalābhāsāṃ caturbāhuṃ trilocanām pāśāṅkuśavarābhītirdhārayantīṃ śivāṃ bhaje

मैं उन कल्याणी देवी (शिवा) का भजन करता हूँ, जो उदीयमान सूर्य के मण्डल के समान कांति वाली, चतुर्भुजा और त्रिनेत्रा हैं, और जो पाश, अंकुश तथा वर एवं अभय मुद्राएँ धारण किए हुए हैं।

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9.1

राजोवाच विचित्रमिदमाख्यातं भगवन् भवता मम देव्याश्चरितमाहात्म्यं रक्तबीजवधाश्रितम्

oṃ rājovāca vicitramidamākhyātaṃ bhagavan bhavatā mama devyāścaritamāhātmyaṃ raktabījavadhāśritam

अर्थ(ॐ। राजा बोले —) 'हे भगवन्! आपने मुझे जो रक्तबीज-वध से सम्बद्ध देवी के चरित्र की महिमा सुनाई है, वह अद्भुत है।

9.2

भूयश्चेच्छाम्यहं श्रोतुं रक्तबीजे निपातिते चकार शुम्भो यत्कर्म निशुम्भश्चातिकोपनः

bhūyaścecchāmyahaṃ śrotuṃ raktabīje nipātite cakāra śumbho yatkarma niśumbhaścātikopanaḥ

अर्थऔर मैं यह भी सुनना चाहता हूँ कि रक्तबीज के गिर जाने पर शुम्भ और अत्यन्त क्रोधी निशुम्भ ने क्या किया।'

9.3

ऋषिरुवाच चकार कोपमतुलं रक्तबीजे निपातिते शुम्भासुरो निशुम्भश्च हतेष्वन्येषु चाहवे

ṛṣiruvāca cakāra kopamatulaṃ raktabīje nipātite śumbhāsuro niśumbhaśca hateṣvanyeṣu cāhave

अर्थ(ऋषि बोले —) रक्तबीज के गिर जाने और युद्ध में दूसरों के मारे जाने पर शुम्भ तथा निशुम्भ असुरों ने अतुलनीय क्रोध किया।

9.4

हन्यमानं महासैन्यं विलोक्यामर्षमुद्वहन् अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ मुख्ययासुरसेनया

hanyamānaṃ mahāsainyaṃ vilokyāmarṣamudvahan abhyadhāvanniśumbho'tha mukhyayāsurasenayā

अर्थअपनी महासेना का संहार होते देख और अमर्ष धारण कर तब निशुम्भ प्रमुख असुर-सेना के साथ आगे बढ़ा।

9.5

तस्याग्रतस्तथा पृष्ठे पार्श्वयोश्च महासुराः सन्दष्टौष्ठपुटाः क्रुद्धा हन्तुं देवीमुपाययुः

tasyāgratastathā pṛṣṭhe pārśvayośca mahāsurāḥ sandaṣṭauṣṭhapuṭāḥ kruddhā hantuṃ devīmupāyayuḥ

अर्थउसके आगे, पीछे और दोनों ओर महान् असुर क्रोध से ओठ चबाते हुए देवी को मारने के लिए बढ़े।

9.6

आजगाम महावीर्यः शुम्भोऽपि स्वबलैर्वृतः निहन्तुं चण्डिकां कोपात्कृत्वा युद्धं तु मातृभिः

ājagāma mahāvīryaḥ śumbho'pi svabalairvṛtaḥ nihantuṃ caṇḍikāṃ kopātkṛtvā yuddhaṃ tu mātṛbhiḥ

अर्थमहावीर्यवान् शुम्भ भी अपनी सेनाओं से घिरा हुआ, मातृकाओं से युद्ध करके, क्रोध से चण्डिका को मारने आ पहुँचा।

9.7

ततो युद्धमतीवासीद्देव्या शुम्भनिशुम्भयोः शरवर्षमतीवोग्रं मेघयोरिव वर्षतोः

tato yuddhamatīvāsīddevyā śumbhaniśumbhayoḥ śaravarṣamatīvograṃ meghayoriva varṣatoḥ

अर्थतब देवी और शुम्भ-निशुम्भ में घोर युद्ध हुआ, जिसमें दो बरसते मेघों के समान अत्यन्त उग्र बाण-वर्षा हुई।

9.8

चिच्छेदास्ताञ्छरांस्ताभ्यां चण्डिका स्वशरोत्करैः ताडयामास चाङ्गेषु शस्त्रौघैरसुरेश्वरौ

cicchedāstāñcharāṃstābhyāṃ caṇḍikā svaśarotkaraiḥ tāḍayāmāsa cāṅgeṣu śastraughairasureśvarau

अर्थचण्डिका ने उन दोनों के छोड़े उन बाणों को अपने बाण-समूहों से काट डाला, और शस्त्र-समूहों से दोनों असुरराजों के अंगों पर प्रहार किया।

9.9

निशुम्भो निशितं खड्गं चर्म चादाय सुप्रभम् अताडयन्मूर्ध्नि सिंहं देव्या वाहनमुत्तमम्

niśumbho niśitaṃ khaḍgaṃ carma cādāya suprabham atāḍayanmūrdhni siṃhaṃ devyā vāhanamuttamam

अर्थनिशुम्भ ने तीखा खड्ग और चमकती ढाल लेकर देवी के उत्तम वाहन सिंह के मस्तक पर प्रहार किया।

9.10

ताडिते वाहने देवी क्षुरप्रेणासिमुत्तमम् निशुम्भस्याशु चिच्छेद चर्म चाप्यष्टचन्द्रकम्

tāḍite vāhane devī kṣurapreṇāsimuttamam niśumbhasyāśu ciccheda carma cāpyaṣṭacandrakam

अर्थवाहन के आहत होने पर देवी ने क्षुरप्र (छुरे-समान) बाण से निशुम्भ का उत्तम खड्ग और आठ चन्द्रों से अंकित ढाल भी शीघ्र काट डाली।

9.11

छिन्ने चर्मणि खड्गे शक्तिं चिक्षेप सोऽसुरः तामप्यस्य द्विधा चक्रे चक्रेणाभिमुखागताम्

chinne carmaṇi khaḍge ca śaktiṃ cikṣepa so'suraḥ tāmapyasya dvidhā cakre cakreṇābhimukhāgatām

अर्थढाल और खड्ग कट जाने पर उस असुर ने शक्ति फेंकी; पर सामने आती उस शक्ति को भी देवी ने चक्र से दो टुकड़े कर दिया।

9.12

कोपाध्मातो निशुम्भोऽथ शूलं जग्राह दानवः आयातं मुष्टिपातेन देवी तच्चाप्यचूर्णयत्

kopādhmāto niśumbho'tha śūlaṃ jagrāha dānavaḥ āyātaṃ muṣṭipātena devī taccāpyacūrṇayat

अर्थतब क्रोध से उन्मत्त निशुम्भ दानव ने शूल पकड़ा; पर आते हुए उसे भी देवी ने मुक्के के प्रहार से चूर्ण कर दिया।

9.13

आविद्याथ गदां सोऽपि चिक्षेप चण्डिकां प्रति सापि देव्यास् त्रिशूलेन भिन्ना भस्मत्वमागता

āvidyātha gadāṃ so'pi cikṣepa caṇḍikāṃ prati sāpi devyās triśūlena bhinnā bhasmatvamāgatā

अर्थतब उसने भी गदा घुमाकर चण्डिका पर फेंकी; पर वह भी देवी के त्रिशूल से विदीर्ण होकर भस्म हो गई।

9.14

ततः परशुहस्तं तमायान्तं दैत्यपुङ्गवम् आहत्य देवी बाणौघैरपातयत भूतले

tataḥ paraśuhastaṃ tamāyāntaṃ daityapuṅgavam āhatya devī bāṇaughairapātayata bhūtale

अर्थतब परशु हाथ में लिए आते हुए उस दैत्यश्रेष्ठ को देवी ने बाण-समूहों से आहत कर भूमि पर गिरा दिया।

9.15

तस्मिन्निपतिते भूमौ निशुम्भे भीमविक्रमे भ्रातर्यतीव सङ्क्रुद्धः प्रययौ हन्तुमम्बिकाम्

tasminnipatite bhūmau niśumbhe bhīmavikrame bhrātaryatīva saṅkruddhaḥ prayayau hantumambikām

अर्थभयंकर पराक्रमी भाई निशुम्भ के भूमि पर गिर जाने पर (शुम्भ) अत्यन्त क्रुद्ध होकर अम्बिका को मारने चला।

9.16

रथस्थस्तथात्युच्चैर्गृहीतपरमायुधैः भुजैरष्टाभिरतुलैर्व्याप्याशेषं बभौ नभः

sa rathasthastathātyuccairgṛhītaparamāyudhaiḥ bhujairaṣṭābhiratulairvyāpyāśeṣaṃ babhau nabhaḥ

अर्थरथ पर खड़ा, अत्यन्त ऊँचा, अपनी आठ अतुलनीय भुजाओं में श्रेष्ठ आयुध थामे वह सम्पूर्ण आकाश को व्याप्त कर शोभित हुआ।

9.17

तमायान्तं समालोक्य देवी शङ्खमवादयत् ज्याशब्दं चापि धनुषश्चकारातीव दुःसहम्

tamāyāntaṃ samālokya devī śaṅkhamavādayat jyāśabdaṃ cāpi dhanuṣaścakārātīva duḥsaham

अर्थउसे आते देख देवी ने शंख बजाया और धनुष की प्रत्यंचा का अत्यन्त दुःसह नाद किया।

9.18

पूरयामास ककुभो निजघण्टास्वनेन समस्तदैत्यसैन्यानां तेजोवधविधायिना

pūrayāmāsa kakubho nijaghaṇṭāsvanena ca samastadaityasainyānāṃ tejovadhavidhāyinā

अर्थऔर समस्त दैत्य-सेनाओं के तेज का नाश करने वाले अपने घण्टे के नाद से उन्होंने दिशाओं को भर दिया।

9.19

ततः सिंहो महानादैस्त्याजितेभमहामदैः पूरयामास गगनं गां तथैव दिशो दश

tataḥ siṃho mahānādaistyājitebhamahāmadaiḥ pūrayāmāsa gaganaṃ gāṃ tathaiva diśo daśa

अर्थतब सिंह ने हाथियों के महामद को छुड़ा देने वाली महागर्जनाओं से आकाश, पृथ्वी और दसों दिशाओं को भर दिया।

9.20

ततः काली समुत्पत्य गगनं क्ष्मामताडयत् कराभ्यां तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः

tataḥ kālī samutpatya gaganaṃ kṣmāmatāḍayat karābhyāṃ tanninādena prāksvanāste tirohitāḥ

अर्थतब काली ने आकाश में उछलकर दोनों हाथों से पृथ्वी पर आघात किया; उस निनाद से पहले के सब शब्द दब गए।

9.21

अट्टाट्टहासमशिवं शिवदूती चकार वैः शब्दैरसुरास्त्रेसुः शुम्भः कोपं परं ययौ

aṭṭāṭṭahāsamaśivaṃ śivadūtī cakāra ha vaiḥ śabdairasurāstresuḥ śumbhaḥ kopaṃ paraṃ yayau

अर्थशिवदूती ने अमंगलकारी अट्टहास किया; उन शब्दों से असुर काँप उठे, और शुम्भ परम क्रोध को प्राप्त हुआ।

9.22

दुरात्मंस्तिष्ठ तिष्ठेति व्याजहाराम्बिका यदा तदा जयेत्यभिहितं देवैराकाशसंस्थितैः

durātmaṃstiṣṭha tiṣṭheti vyājahārāmbikā yadā tadā jayetyabhihitaṃ devairākāśasaṃsthitaiḥ

अर्थजब अम्बिका ने 'दुरात्मन्! ठहर, ठहर!' कहा, तब आकाश में स्थित देवताओं ने 'जय हो' कहा।

9.23

शुम्भेनागत्य या शक्तिर्मुक्ता ज्वालातिभीषणा आयान्ती वह्निकूटाभा सा निरस्ता महोल्कया

śumbhenāgatya yā śaktirmuktā jvālātibhīṣaṇā āyāntī vahnikūṭābhā sā nirastā maholkayā

अर्थअग्नि-पुंज के समान देदीप्यमान, अत्यन्त भयंकर ज्वालामयी जो शक्ति शुम्भ ने आकर छोड़ी — वह (देवी की) महान् उल्का से निरस्त कर दी गई।

9.24

सिंहनादेन शुम्भस्य व्याप्तं लोकत्रयान्तरम् निर्घातनिःस्वनो घोरो जितवानवनीपते

siṃhanādena śumbhasya vyāptaṃ lokatrayāntaram nirghātaniḥsvano ghoro jitavānavanīpate

अर्थशुम्भ के सिंहनाद से त्रैलोक्य का अन्तराल भर गया; पर हे भूपते! (देवी के अस्त्र की) भयंकर वज्रपात-सी ध्वनि ने उसे जीत लिया।

9.25

शुम्भमुक्ताञ्छरान्देवी शुम्भस्तत्प्रहिताञ्छरान् चिच्छेद स्वशरैरुग्रैः शतशोऽथ सहस्रशः

śumbhamuktāñcharāndevī śumbhastatprahitāñcharān ciccheda svaśarairugraiḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

अर्थदेवी ने शुम्भ के छोड़े बाणों को, और शुम्भ ने देवी के छोड़े बाणों को, अपने-अपने उग्र बाणों से सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में काट डाला।

9.26

ततः सा चण्डिका क्रुद्धा शूलेनाभिजघान तम् तदाभिहतो भूमौ मूर्च्छितो निपपात

tataḥ sā caṇḍikā kruddhā śūlenābhijaghāna tam sa tadābhihato bhūmau mūrcchito nipapāta ha

अर्थतब क्रुद्ध चण्डिका ने उसे शूल से मारा; उससे आहत होकर वह मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा।

9.27

ततो निशुम्भः सम्प्राप्य चेतनामात्तकार्मुकः आजघान शरैर्देवीं कालीं केसरिणं तथा

tato niśumbhaḥ samprāpya cetanāmāttakārmukaḥ ājaghāna śarairdevīṃ kālīṃ kesariṇaṃ tathā

अर्थतभी निशुम्भ ने होश में आकर धनुष उठाया और बाणों से देवी, काली तथा सिंह पर प्रहार किया।

9.28

पुनश्च कृत्वा बाहूनामयुतं दनुजेश्वरः चक्रायुधेन दितिजश्छादयामास चण्डिकाम्

punaśca kṛtvā bāhūnāmayutaṃ danujeśvaraḥ cakrāyudhena ditijaśchādayāmāsa caṇḍikām

अर्थऔर फिर दनुजों के स्वामी उस दितिपुत्र ने दस हज़ार भुजाएँ बनाकर चक्रायुध से चण्डिका को ढक दिया।

9.29

ततो भगवती क्रुद्धा दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी चिच्छेद देवी चक्राणि स्वशरैः सायकांश्च तान्

tato bhagavatī kruddhā durgā durgārtināśinī ciccheda devī cakrāṇi svaśaraiḥ sāyakāṃśca tān

अर्थतब क्रुद्ध भगवती दुर्गा, दुर्गति और दुस्तर पीड़ाओं का नाश करने वाली, ने अपने बाणों से उन चक्रों और बाणों को काट डाला।

9.30

ततो निशुम्भो वेगेन गदामादाय चण्डिकाम् अभ्यधावत वै हन्तुं दैत्यसैन्यसमावृतः

tato niśumbho vegena gadāmādāya caṇḍikām abhyadhāvata vai hantuṃ daityasainyasamāvṛtaḥ

अर्थतब निशुम्भ वेग से गदा लेकर, दैत्य-सेना से घिरा हुआ, चण्डिका को मारने दौड़ा।

9.31

तस्यापतत एवाशु गदां चिच्छेद चण्डिका खड्गेन शितधारेण शूलं समाददे

tasyāpatata evāśu gadāṃ ciccheda caṇḍikā khaḍgena śitadhāreṇa sa ca śūlaṃ samādade

अर्थउसके झपटते ही चण्डिका ने तीखी धार वाले खड्ग से उसकी गदा काट डाली; तब उसने शूल उठा लिया।

9.32

शूलहस्तं समायान्तं निशुम्भममरार्दनम् हृदि विव्याध शूलेन वेगाविद्धेन चण्डिका

śūlahastaṃ samāyāntaṃ niśumbhamamarārdanam hṛdi vivyādha śūlena vegāviddhena caṇḍikā

अर्थशूल हाथ में लिए आते हुए देवद्रोही निशुम्भ को चण्डिका ने वेग से फेंके हुए शूल से हृदय में बेध दिया।

9.33

भिन्नस्य तस्य शूलेन हृदयान्निःसृतोऽपरः महाबलो महावीर्यस्तिष्ठेति पुरुषो वदन्

bhinnasya tasya śūlena hṛdayānniḥsṛto'paraḥ mahābalo mahāvīryastiṣṭheti puruṣo vadan

अर्थशूल से विदीर्ण उसके हृदय से 'ठहर!' कहता हुआ एक और महाबली, महावीर्यवान् पुरुष निकल पड़ा।

9.34

तस्य निष्क्रामतो देवी प्रहस्य स्वनवत्ततः शिरश्चिच्छेद खड्गेन ततोऽसावपतद्भुवि

tasya niṣkrāmato devī prahasya svanavattataḥ śiraściccheda khaḍgena tato'sāvapatadbhuvi

अर्थउसके निकलते ही देवी ने ज़ोर से हँसकर खड्ग से उसका सिर काट डाला; तब वह भूमि पर गिर पड़ा।

9.35

ततः सिंहश्चखादोग्रदंष्ट्राक्षुण्णशिरोधरान् असुरांस्तांस्तथा काली शिवदूती तथापरान्

tataḥ siṃhaścakhādogradaṃṣṭrākṣuṇṇaśirodharān asurāṃstāṃstathā kālī śivadūtī tathāparān

अर्थतब सिंह ने उन असुरों को खा लिया जिनकी गर्दनें उसकी उग्र दाढ़ों से कुचल गई थीं; और इसी प्रकार काली तथा शिवदूती ने अन्य को।

9.36

कौमारीशक्तिनिर्भिन्नाः केचिन्नेशुर्महासुराः ब्रह्माणीमन्त्रपूतेन तोयेनान्ये निराकृताः

kaumārīśaktinirbhinnāḥ kecinneśurmahāsurāḥ brahmāṇīmantrapūtena toyenānye nirākṛtāḥ

अर्थकुछ महान् असुर कौमारी की शक्ति से बिंधकर नष्ट हो गए; कुछ अन्य ब्राह्मणी के मंत्र से पवित्र जल द्वारा निराकृत किए गए।

9.37

माहेश्वरीत्रिशूलेन भिन्नाः पेतुस्तथापरे वाराहीतुण्डघातेन केचिच्चूर्णीकृता भुवि

māheśvarītriśūlena bhinnāḥ petustathāpare vārāhītuṇḍaghātena keciccūrṇīkṛtā bhuvi

अर्थकुछ अन्य माहेश्वरी के त्रिशूल से विदीर्ण होकर गिर पड़े; कुछ वाराही के थूथन के प्रहार से भूमि पर चूर्ण कर दिए गए।

9.38

खण्डं खण्डं चक्रेण वैष्णव्या दानवाः कृताः वज्रेण चैन्द्रीहस्ताग्रविमुक्तेन तथापरे

khaṇḍaṃ khaṇḍaṃ ca cakreṇa vaiṣṇavyā dānavāḥ kṛtāḥ vajreṇa caindrīhastāgravimuktena tathāpare

अर्थदानव वैष्णवी के चक्र से टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए, और कुछ अन्य ऐन्द्री के हाथ के अग्रभाग से छोड़े गए वज्र से।

9.39

केचिद्विनेशुरसुराः केचिन्नष्टा महाहवात् भक्षिताश्चापरे कालीशिवदूतीमृगाधिपैः

kecidvineśurasurāḥ kecinnaṣṭā mahāhavāt bhakṣitāścāpare kālīśivadūtīmṛgādhipaiḥ

अर्थकुछ असुर नष्ट हो गए, कुछ महायुद्ध से भाग गए, और कुछ अन्य काली, शिवदूती तथा मृगराज (सिंह) द्वारा खा लिए गए।