शुम्भवध
Śumbha Vadha
शुम्भ वध · 28 श्लोक
▶ पाठ सुनेंअध्याय सारांश
भाई के वध से शोकाकुल शुम्भ देवी को ताना देता है कि वे दूसरों की सहायता से लड़ती हैं। उत्तर में देवी वह महान् अद्वैत-घोषणा करती हैं — 'इस जगत् में मैं अकेली ही हूँ; मेरे अतिरिक्त दूसरी कौन है?' — और उसे दिखाती हैं कि ब्राह्मणी आदि समस्त शक्तियाँ उनके शरीर में लौट आती हैं, और अकेली अम्बिका शेष रह जाती हैं। फिर समस्त देवों-असुरों के सामने दोनों में घोर द्वन्द्व-युद्ध होता है: देवी उसके अस्त्र, धनुष, शक्ति, खड्ग, ढाल, घोड़े और रथ काट डालती हैं; वह उन्हें पकड़कर आकाश में भी मल्लयुद्ध करता है, जिससे सिद्ध-मुनि विस्मित हो जाते हैं, अंत में देवी उसे घुमाकर पृथ्वी पर पटक देती हैं और शूल से उसका वक्ष बेध देती हैं। अंतिम महान् असुर के निष्प्राण गिरते ही जगत् शान्त हो जाता है — मेघ-उल्काएँ शान्त होती हैं, नदियाँ मार्ग पर बहने लगती हैं, देवता हर्षित होते हैं, गंधर्व गाते, अप्सराएँ नृत्य करती हैं, अग्नियाँ शान्त भाव से प्रज्वलित होती हैं और पुण्य वायु बहती है।
✦ ध्यान — आरम्भिक मंगलाचरण
ॐ उत्तप्तहेमरुचिरां रविचन्द्रवह्नि- नेत्रां धनुश्शरयुताङ्कुशपाशशूलम् । रम्यैर्भुजैश्च दधतीं शिवशक्तिरूपां कामेश्वरीं हृदि भजामि धृतेन्दुलेखाम् ॥
oṃ uttaptahemarucirāṃ ravicandravahni- netrāṃ dhanuśśarayutāṅkuśapāśaśūlam ramyairbhujaiśca dadhatīṃ śivaśaktirūpāṃ kāmeśvarīṃ hṛdi bhajāmi dhṛtendulekhām
मैं अपने हृदय में उन कामेश्वरी का भजन करता हूँ, जो तपाए स्वर्ण के समान कांतिमयी हैं, जिनके तीन नेत्र सूर्य, चन्द्र और अग्नि हैं, जो अपनी सुन्दर भुजाओं में धनुष-बाण, अंकुश, पाश और शूल धारण किए हुए हैं, जो शिव-शक्ति की मूर्ति हैं, और जो चन्द्रमा की रेखा धारण किए हुए हैं।
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ॐ ऋषिरुवाच निशुम्भं निहतं दृष्ट्वा भ्रातरं प्राणसम्मितम् । हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः ॥
oṃ ṛṣiruvāca niśumbhaṃ nihataṃ dṛṣṭvā bhrātaraṃ prāṇasammitam hanyamānaṃ balaṃ caiva śumbhaḥ kruddho'bravīdvacaḥ
अर्थ(ॐ। ऋषि बोले —) अपने प्राणों के समान प्रिय भाई निशुम्भ को मारा गया और सेना को नष्ट होते देख क्रुद्ध शुम्भ ने ये वचन कहे:
बलावलेपदुष्टे त्वं मा दुर्गे गर्वमावह । अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे चातिमानिनी ॥
balāvalepaduṣṭe tvaṃ mā durge garvamāvaha anyāsāṃ balamāśritya yuddhyase cātimāninī
अर्थ'हे बल के अभिमान से दुष्ट दुर्गे! घमण्ड मत कर! तू अत्यन्त अभिमानिनी होकर दूसरों के बल का आश्रय लेकर लड़ रही है।'
देव्युवाच एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा । पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः ॥
devyuvāca ekaivāhaṃ jagatyatra dvitīyā kā mamāparā paśyaitā duṣṭa mayyeva viśantyo madvibhūtayaḥ
अर्थ(देवी बोलीं —) 'इस जगत् में मैं अकेली ही हूँ; मेरे अतिरिक्त दूसरी कौन है? अरे दुष्ट! देख, ये मेरी विभूतियाँ मुझ में ही प्रवेश कर रही हैं!'
ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम् । तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका ॥
tataḥ samastāstā devyo brahmāṇīpramukhā layam tasyā devyāstanau jagmurekaivāsīttadāmbikā
अर्थतब ब्राह्मणी आदि वे समस्त देवियाँ उस देवी के शरीर में लीन हो गईं; तब अकेली अम्बिका ही शेष रहीं।
देव्युवाच अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता । तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव ॥
devyuvāca ahaṃ vibhūtyā bahubhiriha rūpairyadāsthitā tatsaṃhṛtaṃ mayaikaiva tiṣṭhāmyājau sthiro bhava
अर्थ(देवी बोलीं —) 'अपनी विभूति से जिन अनेक रूपों में मैं यहाँ स्थित थी, उन्हें मैंने समेट लिया है, और अब अकेली ही खड़ी हूँ। तू (युद्ध में) स्थिर हो जा!'
ऋषिरुवाच ततः प्रववृते युद्धं देव्याः शुम्भस्य चोभयोः । पश्यतां सर्वदेवानामसुराणां च दारुणम् ॥
ṛṣiruvāca tataḥ pravavṛte yuddhaṃ devyāḥ śumbhasya cobhayoḥ paśyatāṃ sarvadevānāmasurāṇāṃ ca dāruṇam
अर्थ(ऋषि बोले —) तब समस्त देवों और असुरों के देखते-देखते देवी और शुम्भ दोनों में घोर युद्ध आरम्भ हुआ।
शरवर्षैः शितैः शस्त्रैस्तथा चास्त्रैः सुदारुणैः । तयोर्युद्धमभूद्भूयः सर्वलोकभयङ्करम् ॥
śaravarṣaiḥ śitaiḥ śastraistathā cāstraiḥ sudāruṇaiḥ tayoryuddhamabhūdbhūyaḥ sarvalokabhayaṅkaram
अर्थबाणों की वर्षा, तीखे शस्त्रों और अत्यन्त भयंकर अस्त्रों से उन दोनों का युद्ध फिर समस्त लोकों के लिए भयंकर हो उठा।
दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका । बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः ॥
divyānyastrāṇi śataśo mumuce yānyathāmbikā babhañja tāni daityendrastatpratīghātakartṛbhiḥ
अर्थतब अम्बिका ने सैकड़ों जो दिव्य अस्त्र छोड़े, उन्हें दैत्यराज ने उनके प्रतिकारक अस्त्रों से तोड़ डाला।
मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेश्वरी । बभञ्ज लीलयैवोग्रहुङ्कारोच्चारणादिभिः ॥
muktāni tena cāstrāṇi divyāni parameśvarī babhañja līlayaivograhuṅkāroccāraṇādibhiḥ
अर्थऔर उसके छोड़े हुए दिव्य अस्त्रों को परमेश्वरी ने उग्र हुँकार आदि के उच्चारण मात्र से खेल-खेल में ही तोड़ दिया।
ततः शरशतैर्देवीमाच्छादयत सोऽसुरः । सापि तत्कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेषुभिः ॥
tataḥ śaraśatairdevīmācchādayata so'suraḥ sāpi tatkupitā devī dhanuściccheda ceṣubhiḥ
अर्थतब उस असुर ने सैकड़ों बाणों से देवी को ढक दिया; और उस पर क्रुद्ध देवी ने अपने बाणों से उसका धनुष काट डाला।
छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे । चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम् ॥
chinne dhanuṣi daityendrastathā śaktimathādade ciccheda devī cakreṇa tāmapyasya kare sthitām
अर्थधनुष कट जाने पर दैत्यराज ने शक्ति उठाई; पर उसके हाथ में स्थित उसे भी देवी ने चक्र से काट डाला।
ततः खड्गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत् । अभ्यधा वत तां देवीं दैत्यानामधिपेश्वरः ॥
tataḥ khaḍgamupādāya śatacandraṃ ca bhānumat abhyadhā vata tāṃ devīṃ daityānāmadhipeśvaraḥ
अर्थतब दैत्यों के परम अधीश्वर ने खड्ग और सौ चन्द्रों से युक्त चमकती ढाल लेकर देवी पर आक्रमण किया।
तस्यापतत एवाशु खड्गं चिच्छेद चण्डिका । धनुर्मुक्तैः शितैर्बाणैश्चर्म चार्ककरामलम् । अश्वांश्च पातयामास रथं सारथिना सह ॥
tasyāpatata evāśu khaḍgaṃ ciccheda caṇḍikā dhanurmuktaiḥ śitairbāṇaiścarma cārkakarāmalam aśvāṃśca pātayāmāsa rathaṃ sārathinā saha
अर्थउसके झपटते ही चण्डिका ने धनुष से छोड़े तीखे बाणों से उसका खड्ग और सूर्य-किरण के समान निर्मल ढाल काट डाली; और उसके घोड़ों तथा सारथि सहित रथ को गिरा दिया।
हताश्वः स तदा दैत्यश्छिन्नधन्वा विसारथिः । जग्राह मुद्गरं घोरमम्बिकानिधनोद्यतः ॥
hatāśvaḥ sa tadā daityaśchinnadhanvā visārathiḥ jagrāha mudgaraṃ ghoramambikānidhanodyataḥ
अर्थघोड़े मारे जाने, धनुष कटने और सारथि के नष्ट होने पर तब उस दैत्य ने अम्बिका के वध को उद्यत होकर एक भयंकर मुद्गर पकड़ा।
चिच्छेदापततस्तस्य मुद्गरं निशितैः शरैः । तथापि सोऽभ्यधावत्तां मुष्टिमुद्यम्य वेगवान् ॥
cicchedāpatatastasya mudgaraṃ niśitaiḥ śaraiḥ tathāpi so'bhyadhāvattāṃ muṣṭimudyamya vegavān
अर्थआक्रमण करते उसके मुद्गर को उन्होंने तीखे बाणों से काट दिया; फिर भी वह वेगवान् मुक्का उठाए उन पर झपटा।
स मुष्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुङ्गवः । देव्यास्तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत् ॥
sa muṣṭiṃ pātayāmāsa hṛdaye daityapuṅgavaḥ devyāstaṃ cāpi sā devī talenorasyatāḍayat
अर्थउस दैत्यश्रेष्ठ ने देवी के हृदय पर मुक्के का प्रहार किया; और देवी ने भी उसे थप्पड़ से वक्ष पर मारा।
तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले । स दैत्यराजः सहसा पुनरेव तथोत्थितः ॥
talaprahārābhihato nipapāta mahītale sa daityarājaḥ sahasā punareva tathotthitaḥ
अर्थथप्पड़ के प्रहार से आहत होकर वह दैत्यराज भूमि पर गिर पड़ा; पर सहसा फिर वैसे ही उठ खड़ा हुआ।
उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं गगनमास्थितः । तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका ॥
utpatya ca pragṛhyoccairdevīṃ gaganamāsthitaḥ tatrāpi sā nirādhārā yuyudhe tena caṇḍikā
अर्थऔर उछलकर देवी को पकड़े हुए वह ऊँचे आकाश में जा चढ़ा; वहाँ भी निराधार रहकर चण्डिका उससे युद्ध करती रहीं।
नियुद्धं खे तदा दैत्यश्चण्डिका च परस्परम् । चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम् ॥
niyuddhaṃ khe tadā daityaścaṇḍikā ca parasparam cakratuḥ prathamaṃ siddhamunivismayakārakam
अर्थतब आकाश में दैत्य और चण्डिका ने परस्पर ऐसा मल्लयुद्ध किया, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था — जो सिद्धों और मुनियों को विस्मित करने वाला था।
ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह । उत्पाट्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले ॥
tato niyuddhaṃ suciraṃ kṛtvā tenāmbikā saha utpāṭya bhrāmayāmāsa cikṣepa dharaṇītale
अर्थतब उसके साथ चिरकाल तक मल्लयुद्ध करके अम्बिका ने उसे उठाकर, घुमाकर पृथ्वी पर पटक दिया।
स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगवान् । अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया ॥
sa kṣipto dharaṇīṃ prāpya muṣṭimudyamya vegavān abhyadhāvata duṣṭātmā caṇḍikānidhanecchayā
अर्थपटका हुआ वह दुरात्मा भूमि पर पहुँचकर वेग से मुक्का उठाए चण्डिका के वध की इच्छा से फिर दौड़ा।
तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्वरम् । जगत्यां पातयामास भित्त्वा शूलेन वक्षसि ॥
tamāyāntaṃ tato devī sarvadaityajaneśvaram jagatyāṃ pātayāmāsa bhittvā śūlena vakṣasi
अर्थतब समस्त दैत्यजनों के स्वामी उस आते हुए को देवी ने शूल से वक्ष में बेधकर भूमि पर गिरा दिया।
स गतासुः पपातोर्व्यां देवी शूलाग्रविक्षतः । चालयन् सकलां पृथ्वीं साब्धिद्वीपां सपर्वताम् ॥
sa gatāsuḥ papātorvyāṃ devī śūlāgravikṣataḥ cālayan sakalāṃ pṛthvīṃ sābdhidvīpāṃ saparvatām
अर्थदेवी के शूल के अग्रभाग से क्षत-विक्षत होकर वह प्राणरहित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, और समुद्र, द्वीप व पर्वतों सहित समस्त पृथ्वी को कँपा गया।
ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन् दुरात्मनि । जगत्स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः ॥
tataḥ prasannamakhilaṃ hate tasmin durātmani jagatsvāsthyamatīvāpa nirmalaṃ cābhavannabhaḥ
अर्थतब उस दुरात्मा के मारे जाने पर समस्त जगत् प्रसन्न हो उठा; उसने परम स्वस्थता पाई और आकाश निर्मल हो गया।
उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः । सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते ॥
utpātameghāḥ solkā ye prāgāsaṃste śamaṃ yayuḥ sarito mārgavāhinyastathāsaṃstatra pātite
अर्थपहले प्रकट हुए उल्कासहित उत्पात-मेघ शान्त हो गए; और उसके गिर जाने पर नदियाँ अपने मार्ग पर बहने लगीं।
ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः । बभूवुर्निहते तस्मिन् गन्धर्वा ललितं जगुः ॥
tato devagaṇāḥ sarve harṣanirbharamānasāḥ babhūvurnihate tasmin gandharvā lalitaṃ jaguḥ
अर्थतब उसके वध से समस्त देवगण हर्ष से परिपूर्ण हो उठे; गंधर्व मधुर गान करने लगे।
अवादयंस्तथैवान्ये ननृतुश्चाप्सरोगणाः । ववुः पुण्यास्तथा वाताः सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः ॥
avādayaṃstathaivānye nanṛtuścāpsarogaṇāḥ vavuḥ puṇyāstathā vātāḥ suprabho'bhūddivākaraḥ
अर्थअन्य लोग बाजे बजाने लगे, और अप्सराओं के समूह नृत्य करने लगे; पुण्यमयी वायु बहने लगी और सूर्य देदीप्यमान हो गया;
जज्वलुश्चाग्नयः शान्ताः शान्ता दिग्जनितस्वनाः ॥
jajvaluścāgnayaḥ śāntāḥ śāntā digjanitasvanāḥ
अर्थशान्त अग्नियाँ प्रज्वलित हो उठीं, और दिशाओं में उत्पन्न (अशुभ) ध्वनियाँ शान्त हो गईं।