अध्याय 10, श्लोक 2
अध्याय 10: Śumbha Vadha — शुम्भवधबलावलेपदुष्टे त्वं मा दुर्गे गर्वमावह । अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे चातिमानिनी ॥
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लिप्यंतरण
balāvalepaduṣṭe tvaṃ mā durge garvamāvaha anyāsāṃ balamāśritya yuddhyase cātimāninī
अर्थ
'हे बल के अभिमान से दुष्ट दुर्गे! घमण्ड मत कर! तू अत्यन्त अभिमानिनी होकर दूसरों के बल का आश्रय लेकर लड़ रही है।'
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 10.2 का अर्थ क्या है?▼
'हे बल के अभिमान से दुष्ट दुर्गे! घमण्ड मत कर! तू अत्यन्त अभिमानिनी होकर दूसरों के बल का आश्रय लेकर लड़ रही है।'
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 10 (Śumbha Vadha — शुम्भ वध) का 2वाँ श्लोक है।