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दुर्गा सप्तशती 10.5

अध्याय 10, श्लोक 5

अध्याय 10: Śumbha Vadhaशुम्भवध

देव्युवाच अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव

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लिप्यंतरण

devyuvāca ahaṃ vibhūtyā bahubhiriha rūpairyadāsthitā tatsaṃhṛtaṃ mayaikaiva tiṣṭhāmyājau sthiro bhava

अर्थ

(देवी बोलीं —) 'अपनी विभूति से जिन अनेक रूपों में मैं यहाँ स्थित थी, उन्हें मैंने समेट लिया है, और अब अकेली ही खड़ी हूँ। तू (युद्ध में) स्थिर हो जा!'

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 10.5 का अर्थ क्या है?
(देवी बोलीं —) 'अपनी विभूति से जिन अनेक रूपों में मैं यहाँ स्थित थी, उन्हें मैंने समेट लिया है, और अब अकेली ही खड़ी हूँ। तू (युद्ध में) स्थिर हो जा!'
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 10 (Śumbha Vadha — शुम्भ वध) का 5वाँ श्लोक है।