अध्याय 5, श्लोक 44
अध्याय 5: Devyā Dūta Saṃvāda — देव्या दूतसंवादनैव तादृक् क्वचिद्रूपं दृष्टं केनचिदुत्तमम् । ज्ञायतां काप्यसौ देवी गृह्यतां चासुरेश्वर ॥
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लिप्यंतरण
naiva tādṛk kvacidrūpaṃ dṛṣṭaṃ kenaciduttamam jñāyatāṃ kāpyasau devī gṛhyatāṃ cāsureśvara
अर्थ
वैसा उत्तम रूप कभी किसी ने कहीं नहीं देखा। हे असुरेश्वर! पता लगाइए कि वह देवी कौन है, और उसे ग्रहण कर लीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 5.44 का अर्थ क्या है?▼
वैसा उत्तम रूप कभी किसी ने कहीं नहीं देखा। हे असुरेश्वर! पता लगाइए कि वह देवी कौन है, और उसे ग्रहण कर लीजिए।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 5 (Devyā Dūta Saṃvāda — देवी-दूत संवाद) का 44वाँ श्लोक है।