अध्याय 5, श्लोक 45
अध्याय 5: Devyā Dūta Saṃvāda — देव्या दूतसंवादस्त्रीरत्नमतिचार्वङ्गी द्योतयन्ती दिशस्त्विषा । सा तु तिष्ठति दैत्येन्द्र तां भवान् द्रष्टुमर्हति ॥
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लिप्यंतरण
strīratnamaticārvaṅgī dyotayantī diśastviṣā sā tu tiṣṭhati daityendra tāṃ bhavān draṣṭumarhati
अर्थ
अत्यन्त सुन्दर अंगों वाली, अपनी कांति से दिशाओं को प्रकाशित करती वह स्त्री-रत्न वहाँ विराजमान है, हे दैत्येन्द्र! आप उसे देखने योग्य हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 5.45 का अर्थ क्या है?▼
अत्यन्त सुन्दर अंगों वाली, अपनी कांति से दिशाओं को प्रकाशित करती वह स्त्री-रत्न वहाँ विराजमान है, हे दैत्येन्द्र! आप उसे देखने योग्य हैं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 5 (Devyā Dūta Saṃvāda — देवी-दूत संवाद) का 45वाँ श्लोक है।