अध्याय 5, श्लोक 34
अध्याय 5: Devyā Dūta Saṃvāda — देव्या दूतसंवादचितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत् । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
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लिप्यंतरण
citirūpeṇa yā kṛtsnametad vyāpya sthitā jagat namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ
अर्थ
जो देवी चिति (चैतन्य) रूप से इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 5.34 का अर्थ क्या है?▼
जो देवी चिति (चैतन्य) रूप से इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, बार-बार नमस्कार।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 5 (Devyā Dūta Saṃvāda — देवी-दूत संवाद) का 34वाँ श्लोक है।