अध्याय 5, श्लोक 3
अध्याय 5: Devyā Dūta Saṃvāda — देव्या दूतसंवादतावेव पवनर्द्धिं च चक्रतुर्वह्निकर्म च । ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः ॥
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लिप्यंतरण
tāveva pavanarddhiṃ ca cakraturvahnikarma ca tato devā vinirdhūtā bhraṣṭarājyāḥ parājitāḥ
अर्थ
उन्होंने ही वायु की समृद्धि और अग्नि का कार्य भी हथिया लिया। तब देवता राज्य से भ्रष्ट, पराजित और बहिष्कृत हो गए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 5.3 का अर्थ क्या है?▼
उन्होंने ही वायु की समृद्धि और अग्नि का कार्य भी हथिया लिया। तब देवता राज्य से भ्रष्ट, पराजित और बहिष्कृत हो गए।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 5 (Devyā Dūta Saṃvāda — देवी-दूत संवाद) का 3वाँ श्लोक है।