अध्याय 5, श्लोक 4
अध्याय 5: Devyā Dūta Saṃvāda — देव्या दूतसंवादहृताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यां सर्वे निराकृताः । महासुराभ्यां तां देवीं संस्मरन्त्यपराजिताम् ॥
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लिप्यंतरण
hṛtādhikārāstridaśāstābhyāṃ sarve nirākṛtāḥ mahāsurābhyāṃ tāṃ devīṃ saṃsmarantyaparājitām
अर्थ
उन दोनों महान् असुरों द्वारा अधिकार छीने जाकर बहिष्कृत समस्त देवता उस अपराजिता देवी का स्मरण करने लगे:
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 5.4 का अर्थ क्या है?▼
उन दोनों महान् असुरों द्वारा अधिकार छीने जाकर बहिष्कृत समस्त देवता उस अपराजिता देवी का स्मरण करने लगे:
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 5 (Devyā Dūta Saṃvāda — देवी-दूत संवाद) का 4वाँ श्लोक है।