भगवतीवाक्य (फलश्रुति)
Bhagavatī Vākya (Phalaśruti)
भगवती वाक्य — फलश्रुति · 39 श्लोक
▶ पाठ सुनेंअध्याय सारांश
देवी स्वयं अपने माहात्म्य की फलश्रुति कहती हैं। जो भी भक्तिपूर्वक इसका पाठ या श्रवण करता है — विशेषकर अष्टमी, नवमी व चतुर्दशी को और शरत्कालीन महापूजा (नवरात्रि) में — उसे वे समस्त विपत्तियों, दरिद्रता व वियोग से तथा शत्रु, चोर, राजा, शस्त्र, अग्नि और जल के समस्त भय से मुक्ति का वचन देती हैं। यह पाठ महामारी और उत्पातों को शान्त करता है, उग्र ग्रह-पीड़ा व दुःस्वप्न दूर करता है, बालग्रह से पीड़ित बच्चों को शान्ति देता है, शत्रुओं में मैत्री कराता है, और राक्षस-भूत-पिशाचों का नाश करता है; एक बार का पाठ वर्ष भर की पूजा के समान है। उनके चरित्र का स्मरण मनुष्य को अग्नि, चोर, बन्धन, जलयान-संकट और रणभूमि से उबार लेता है। फिर चण्डिका अन्तर्धान हो जाती हैं; देवता अपने अधिकार पुनः पाते हैं, शेष असुर पाताल भाग जाते हैं, और मुनि उन्हें नित्या के रूप में प्रकट करते हैं — महाकाली, सृष्टि व संहार, समृद्धि में लक्ष्मी और विनाश में अलक्ष्मी — जो पूजित होकर धन, संतान और शुभ गति प्रदान करती हैं।
✦ ध्यान — आरम्भिक मंगलाचरण
ॐ विद्युद्धामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां कन्याभिः करवाळखेटविलसधस्ताभिरासेविताम् । हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे ॥
oṃ vidyuddhāmasamaprabhāṃ mṛgapatiskandhasthitāṃ bhīṣaṇāṃ kanyābhiḥ karavāḻakheṭavilasadhastābhirāsevitām hastaiścakragadāsikheṭaviśikhāṃścāpaṃ guṇaṃ tarjanīṃ bibhrāṇāmanalātmikāṃ śaśidharāṃ durgāṃ trinetrāṃ bhaje
मैं उन त्रिनेत्रा दुर्गा का भजन करता हूँ, जो बिजली के समान कांति वाली, सिंह के कंधे पर विराजमान, भयंकर रूप वाली, और हाथों में चमकती तलवार व ढाल लिए कन्याओं से सेवित हैं; जो अपने हाथों में चक्र, गदा, खड्ग, खेट (ढाल), बाण, धनुष, प्रत्यंचा और तर्जनी मुद्रा धारण किए हुए, अग्नि-स्वरूपा और चन्द्रमा धारण करने वाली हैं।
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ॐ देव्युवाच एभिः स्तवैश्च मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः । तस्याहं सकलां बाधां शमयिष्याम्यसंशयम् ॥
oṃ devyuvāca ebhiḥ stavaiśca māṃ nityaṃ stoṣyate yaḥ samāhitaḥ tasyāhaṃ sakalāṃ bādhāṃ śamayiṣyāmyasaṃśayam
अर्थ(ॐ। देवी बोलीं —) 'जो एकाग्रचित्त होकर इन स्तुतियों से सदा मेरी स्तुति करेगा, उसकी समस्त बाधा मैं निःसंदेह शान्त कर दूँगी।
मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम् । कीर्तयिष्यन्ति ये तद्वद्वधं शुम्भनिशुम्भयोः ॥
madhukaiṭabhanāśaṃ ca mahiṣāsuraghātanam kīrtayiṣyanti ye tadvadvadhaṃ śumbhaniśumbhayoḥ
अर्थऔर जो मधु-कैटभ के नाश, महिषासुर के वध, तथा वैसे ही शुम्भ-निशुम्भ के वध का कीर्तन करेंगे,
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां चैकचेतसः । श्रोष्यन्ति चैव ये भक्त्या मम माहात्म्यमुत्तमम् ॥
aṣṭamyāṃ ca caturdaśyāṃ navamyāṃ caikacetasaḥ śroṣyanti caiva ye bhaktyā mama māhātmyamuttamam
अर्थऔर जो अष्टमी, चतुर्दशी तथा नवमी को एकचित्त होकर भक्तिपूर्वक मेरे इस उत्तम माहात्म्य को सुनेंगे —
न तेषां दुष्कृतं किञ्चिद्दुष्कृतोत्था न चापदः । भविष्यति न दारिद्र्यं न चैवेष्टवियोजनम् ॥
na teṣāṃ duṣkṛtaṃ kiñcidduṣkṛtotthā na cāpadaḥ bhaviṣyati na dāridryaṃ na caiveṣṭaviyojanam
अर्थउन्हें न कोई दुष्कर्म होगा, न दुष्कर्मों से उत्पन्न विपत्तियाँ; न दरिद्रता, और न ही प्रियजनों का वियोग।
शत्रुभ्यो न भयं तस्य दस्युतो वा न राजतः । न शस्त्रानलतोयौघात्कदाचित् सम्भविष्यति ॥
śatrubhyo na bhayaṃ tasya dasyuto vā na rājataḥ na śastrānalatoyaughātkadācit sambhaviṣyati
अर्थउसे शत्रुओं से भय न होगा, न चोरों से, न राजा से; शस्त्र, अग्नि और जल-प्रवाह से भी कभी (हानि) न होगी।
तस्मान्ममैतन्माहात्म्यं पठितव्यं समाहितैः । श्रोतव्यं च सदा भक्त्या परं स्वस्त्ययनं महत् ॥
tasmānmamaitanmāhātmyaṃ paṭhitavyaṃ samāhitaiḥ śrotavyaṃ ca sadā bhaktyā paraṃ svastyayanaṃ mahat
अर्थइसलिए मेरा यह माहात्म्य एकाग्रचित्त होकर पढ़ना चाहिए और सदा भक्ति से सुनना चाहिए; यह परम और महान् कल्याणकारी है।
उपसर्गानशेषांस्तु महामारीसमुद्भवान् । तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम ॥
upasargānaśeṣāṃstu mahāmārīsamudbhavān tathā trividhamutpātaṃ māhātmyaṃ śamayenmama
अर्थमेरा यह माहात्म्य महामारी से उत्पन्न समस्त उपसर्गों, तथा तीन प्रकार के उत्पातों को शान्त कर दे।
यत्रैतत्पठ्यते सम्यङ्नित्यमायतने मम । सदा न तद्विमोक्ष्यामि सान्निध्यं तत्र मे स्थितम् ॥
yatraitatpaṭhyate samyaṅnityamāyatane mama sadā na tadvimokṣyāmi sānnidhyaṃ tatra me sthitam
अर्थजहाँ मेरे मन्दिर में नित्य भलीभाँति इसका पाठ होता है, वह स्थान मैं कभी नहीं छोड़ूँगी; वहाँ मेरी सन्निधि (उपस्थिति) स्थित रहती है।
बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्ये महोत्सवे । सर्वं ममैतन्माहात्म्यम् उच्चार्यं श्राव्यमेव च ॥
balipradāne pūjāyāmagnikārye mahotsave sarvaṃ mamaitanmāhātmyam uccāryaṃ śrāvyameva ca
अर्थबलि अर्पण में, पूजा में, अग्निकार्य में और महोत्सव में — मेरा यह सम्पूर्ण माहात्म्य उच्चारण करने और सुनने योग्य है।
जानताजानता वापि बलिपूजां यथा कृताम् । प्रतीक्षिष्याम्यहं प्रीत्या वह्निहोमं तथाकृतम् ॥
jānatājānatā vāpi balipūjāṃ yathā kṛtām pratīkṣiṣyāmyahaṃ prītyā vahnihomaṃ tathākṛtam
अर्थजाने या अनजाने में जैसी भी बलि-पूजा की गई, और जैसा भी अग्नि-होम किया गया, उसे मैं प्रेमपूर्वक स्वीकार करूँगी।
शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी । तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः ॥
śaratkāle mahāpūjā kriyate yā ca vārṣikī tasyāṃ mamaitanmāhātmyaṃ śrutvā bhaktisamanvitaḥ
अर्थजो भक्ति से युक्त होकर शरत्काल में की जाने वाली वार्षिक महापूजा में मेरे इस माहात्म्य को सुन लेता है —
सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसमन्वितः । मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॥
sarvābādhāvinirmukto dhanadhānyasamanvitaḥ manuṣyo matprasādena bhaviṣyati na saṃśayaḥ
अर्थवह मनुष्य मेरी कृपा से समस्त बाधाओं से मुक्त और धन-धान्य से सम्पन्न हो जाएगा; इसमें कोई संदेह नहीं।
श्रुत्वा ममैतन्माहात्म्यं तथा चोत्पत्तयः शुभाः । पराक्रमं च युद्धेषु जायते निर्भयः पुमान् ॥
śrutvā mamaitanmāhātmyaṃ tathā cotpattayaḥ śubhāḥ parākramaṃ ca yuddheṣu jāyate nirbhayaḥ pumān
अर्थमेरे इस माहात्म्य को, तथा मेरी शुभ उत्पत्तियों (प्राकट्यों) और युद्धों में पराक्रम को सुनकर मनुष्य निर्भय हो जाता है।
रिपवः सङ्क्षयं यान्ति कल्याणं चोपपद्यते । नन्दते च कुलं पुंसां माहात्म्यं मव शृण्वताम् ॥
ripavaḥ saṅkṣayaṃ yānti kalyāṇaṃ copapadyate nandate ca kulaṃ puṃsāṃ māhātmyaṃ mava śaṛṇvatām
अर्थउसके शत्रु नष्ट हो जाते हैं, कल्याण की प्राप्ति होती है, और मेरे माहात्म्य को सुनने वालों का कुल आनन्दित होता है।
शान्तिकर्मणि सर्वत्र तथा दुःस्वप्नदर्शने । ग्रहपीडासु चोग्रासु माहात्म्यं शृणुयान्मम ॥
śāntikarmaṇi sarvatra tathā duḥsvapnadarśane grahapīḍāsu cogrāsu māhātmyaṃ śaṛṇuyānmama
अर्थसर्वत्र — शान्ति-कर्म में, दुःस्वप्न-दर्शन में, और उग्र ग्रह-पीड़ाओं में — मनुष्य को मेरा माहात्म्य सुनना चाहिए।
उपसर्गाः शमं यान्ति ग्रहपीडाश्च दारुणाः । दुःस्वप्नं च नृभिर्दृष्टं सुस्वप्नमुपजायते ॥
upasargāḥ śamaṃ yānti grahapīḍāśca dāruṇāḥ duḥsvapnaṃ ca nṛbhirdṛṣṭaṃ susvapnamupajāyate
अर्थउपसर्ग शान्त हो जाते हैं, और दारुण ग्रह-पीड़ाएँ भी; और मनुष्यों द्वारा देखा गया दुःस्वप्न सुस्वप्न में बदल जाता है।
बालग्रहाभिभूतानां बालानां शान्तिकारकम् । सङ्घातभेदे च नृणां मैत्रीकरणमुत्तमम् ॥
bālagrahābhibhūtānāṃ bālānāṃ śāntikārakam saṅghātabhede ca nṛṇāṃ maitrīkaraṇamuttamam
अर्थयह बालग्रहों से पीड़ित बच्चों को शान्ति देने वाला है; और मनुष्यों में फूट पड़ने पर मैत्री कराने का उत्तम साधन है।
दुर्वृत्तानामशेषाणां बलहानिकरं परम् । रक्षोभूतपिशाचानां पठनादेव नाशनम् ॥
durvṛttānāmaśeṣāṇāṃ balahānikaraṃ param rakṣobhūtapiśācānāṃ paṭhanādeva nāśanam
अर्थयह समस्त दुराचारियों के बल को घटाने वाला परम (साधन) है; इसके पाठ मात्र से राक्षसों, भूतों और पिशाचों का नाश हो जाता है।
सर्वं ममैतन्माहात्म्यं मम सन्निधिकारकम् । पशुपुष्पार्घ्यधूपैश्च गन्धदीपैस्तथोत्तमैः ॥
sarvaṃ mamaitanmāhātmyaṃ mama sannidhikārakam paśupuṣpārghyadhūpaiśca gandhadīpaistathottamaiḥ
अर्थयह सम्पूर्ण माहात्म्य मेरी सन्निधि कराने वाला है। और पशु, पुष्प, अर्घ्य, धूप, तथा उत्तम गन्ध और दीपों से,
विप्राणां भोजनैर्होमैः प्रोक्षणीयैरहर्निशम् । अन्यैश्च विविधैर्भोगैः प्रदानैर्वत्सरेण या ॥
viprāṇāṃ bhojanairhomaiḥ prokṣaṇīyairaharniśam anyaiśca vividhairbhogaiḥ pradānairvatsareṇa yā
अर्थब्राह्मणों के भोजन, होम और प्रोक्षण-कर्मों से, दिन-रात, और अन्य अनेक भोग व दानों से, वर्ष भर में —
प्रीतिर्मे क्रियते सास्मिन् सकृदुच्चरिते श्रुते । श्रुतं हरति पापानि तथारोग्यं प्रयच्छति ॥
prītirme kriyate sāsmin sakṛduccarite śrute śrutaṃ harati pāpāni tathārogyaṃ prayacchati
अर्थमेरी जो प्रीति (वर्ष भर में) की जाती है, वह इस माहात्म्य के एक बार उच्चारण या श्रवण से ही (प्राप्त हो जाती है)। इसका श्रवण पापों को हरता है और आरोग्य प्रदान करता है।
रक्षां करोति भूतेभ्यो जन्मनां कीर्तनं मम । युद्धेषु चरितं यन्मे दुष्टदैत्यनिबर्हणम् ॥
rakṣāṃ karoti bhūtebhyo janmanāṃ kīrtanaṃ mama yuddheṣu caritaṃ yanme duṣṭadaityanibarhaṇam
अर्थमेरे प्राकट्यों का कीर्तन (दुष्ट) भूतों से रक्षा करता है। और युद्धों में मेरा जो चरित्र है, जो दुष्ट दैत्यों का संहार करने वाला है —
तस्मिञ्छ्रुते वैरिकृतं भयं पुंसां न जायते । युष्माभिः स्तुतयो याश्च याश्च ब्रह्मर्षिभिः कृताः ॥
tasmiñchrute vairikṛtaṃ bhayaṃ puṃsāṃ na jāyate yuṣmābhiḥ stutayo yāśca yāśca brahmarṣibhiḥ kṛtāḥ
अर्थउसके सुनने पर मनुष्यों में शत्रुकृत भय उत्पन्न नहीं होता। और जो स्तुतियाँ तुम (देवताओं) द्वारा की गईं, और जो ब्रह्मर्षियों द्वारा,
ब्रह्मणा च कृतास्तास्तु प्रयच्छन्तु शुभां मतिम् । अरण्ये प्रान्तरे वापि दावाग्निपरिवारितः ॥
brahmaṇā ca kṛtāstāstu prayacchantu śubhāṃ matim araṇye prāntare vāpi dāvāgniparivāritaḥ
अर्थऔर जो ब्रह्मा द्वारा रची गईं — वे (सब) शुभ बुद्धि प्रदान करें। वन या निर्जन प्रान्तर में दावाग्नि से घिरा हुआ,
दस्युभिर्वा वृतः शून्ये गृहीतो वापि शत्रुभिः । सिंहव्याघ्रानुयातो वा वने वा वनहस्तिभिः ॥
dasyubhirvā vṛtaḥ śūnye gṛhīto vāpi śatrubhiḥ siṃhavyāghrānuyāto vā vane vā vanahastibhiḥ
अर्थअथवा सुनसान में डाकुओं से घिरा हुआ, या शत्रुओं द्वारा पकड़ा हुआ, या सिंह-व्याघ्रों अथवा वन के जंगली हाथियों द्वारा पीछा किया हुआ,
राज्ञा क्रुद्धेन चाज्ञप्तो वध्यो बन्धगतोऽपि वा । आघूर्णितो वा वातेन स्थितः पोते महार्णवे ॥
rājñā kruddhena cājñapto vadhyo bandhagato'pi vā āghūrṇito vā vātena sthitaḥ pote mahārṇave
अर्थअथवा क्रुद्ध राजा की आज्ञा से वध के योग्य या बन्धन में पड़ा हुआ, या महासागर में नाव पर वायु से झकझोरा हुआ,
पतत्सु चापि शस्त्रेषु सङ्ग्रामे भृशदारुणे । सर्वाबाधासु घोरासु वेदनाभ्यर्दितोऽपि वा ॥
patatsu cāpi śastreṣu saṅgrāme bhṛśadāruṇe sarvābādhāsu ghorāsu vedanābhyardito'pi vā
अर्थअथवा अत्यन्त भयंकर संग्राम में गिरते हुए शस्त्रों के बीच, या समस्त घोर बाधाओं में, या वेदना से पीड़ित —
स्मरन् ममैतच्चरितं नरो मुच्येत सङ्कटात् । मम प्रभावात्सिंहाद्या दस्यवो वैरिणस्तथा ॥
smaran mamaitaccaritaṃ naro mucyeta saṅkaṭāt mama prabhāvātsiṃhādyā dasyavo vairiṇastathā
अर्थजो मनुष्य मेरे इस चरित्र का स्मरण करता है, वह संकट से मुक्त हो जाता है। मेरे प्रभाव से सिंह आदि, डाकू और शत्रु भी,
दूरादेव पलायन्ते स्मरतश्चरितं मम ॥
dūrādeva palāyante smarataścaritaṃ mama
अर्थमेरे चरित्र का स्मरण करने वाले से दूर ही भाग जाते हैं।'
ऋषिरुवाच इत्युक्त्वा सा भगवती चण्डिका चण्डविक्रमा ॥
ṛṣiruvāca ityuktvā sā bhagavatī caṇḍikā caṇḍavikramā
अर्थ(ऋषि बोले —) ऐसा कहकर प्रचण्ड पराक्रम वाली वह भगवती चण्डिका,
पश्यतां सर्वदेवानां तत्रैवान्तरधीयत । तेऽपि देवा निरातङ्काः स्वाधिकारान्यथा पुरा ॥
paśyatāṃ sarvadevānāṃ tatraivāntaradhīyata te'pi devā nirātaṅkāḥ svādhikārānyathā purā
अर्थसमस्त देवताओं के देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गईं। और वे देवता भी निर्भय होकर पहले की भाँति अपने अधिकारों को (पुनः प्राप्त करके) —
यज्ञभागभुजः सर्वे चक्रुर्विनिहतारयः । दैत्याश्च देव्या निहते शुम्भे देवरिपौ युधि ॥
yajñabhāgabhujaḥ sarve cakrurvinihatārayaḥ daityāśca devyā nihate śumbhe devaripau yudhi
अर्थशत्रुओं के मारे जाने पर सब यज्ञभाग के भोक्ता हो गए। और देवशत्रु शुम्भ के देवी द्वारा युद्ध में मारे जाने पर,
जगद्विध्वंसके तस्मिन् महोग्रेऽतुलविक्रमे । निशुम्भे च महावीर्ये शेषाः पातालमाययुः ॥
jagadvidhvaṃsake tasmin mahogre'tulavikrame niśumbhe ca mahāvīrye śeṣāḥ pātālamāyayuḥ
अर्थतथा जगत् का विध्वंस करने वाले, अतुलनीय पराक्रमी, महावीर्य निशुम्भ के (मारे जाने पर) — शेष दैत्य पाताल चले गए।
एवं भगवती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः । सम्भूय कुरुते भूप जगतः परिपालनम् ॥
evaṃ bhagavatī devī sā nityāpi punaḥ punaḥ sambhūya kurute bhūpa jagataḥ paripālanam
अर्थइस प्रकार वह भगवती देवी नित्या होने पर भी बार-बार प्रकट होकर जगत् का पालन करती हैं, हे राजन्।
तयैतन्मोह्यते विश्वं सैव विश्वं प्रसूयते । सा याचिता च विज्ञानं तुष्टा ऋद्धिं प्रयच्छति ॥
tayaitanmohyate viśvaṃ saiva viśvaṃ prasūyate sā yācitā ca vijñānaṃ tuṣṭā ṛddhiṃ prayacchati
अर्थउन्हीं से यह विश्व मोहित होता है; वही विश्व को प्रकट करती हैं। प्रार्थना करने पर वे विज्ञान देती हैं, और प्रसन्न होने पर समृद्धि प्रदान करती हैं।
व्याप्तं तयैतत्सकलं ब्रह्माण्डं मनुजेश्वर । महादेव्या महाकाली महामारीस्वरूपया ॥
vyāptaṃ tayaitatsakalaṃ brahmāṇḍaṃ manujeśvara mahādevyā mahākālī mahāmārīsvarūpayā
अर्थहे मनुजेश्वर! महाकाली और महामारी-स्वरूपा उन महादेवी से ही यह समस्त ब्रह्माण्ड व्याप्त है।
सैव काले महामारी सैव सृष्टिर्भवत्यजा । स्थितिं करोति भूतानां सैव काले सनातनी ॥
saiva kāle mahāmārī saiva sṛṣṭirbhavatyajā sthitiṃ karoti bhūtānāṃ saiva kāle sanātanī
अर्थवही समय आने पर महामारी हैं, वही अजन्मा सृष्टि हैं; और वही सनातनी समय पर प्राणियों की स्थिति (पालन) करती हैं।
भवकाले नृणां सैव लक्ष्मीर्वृद्धिप्रदा गृहे । सैवाभावे तथालक्ष्मीर्विनाशायोपजायते ॥
bhavakāle nṛṇāṃ saiva lakṣmīrvṛddhipradā gṛhe saivābhāve tathālakṣmīrvināśāyopajāyate
अर्थअभ्युदय के समय वे मनुष्यों के घर में वृद्धि देने वाली लक्ष्मी हैं; और अभाव (दुर्भाग्य) के समय वे ही अलक्ष्मी होकर विनाश के लिए प्रकट होती हैं।
स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्गन्धधूपादिभिस्तथा । ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे गतिं शुभाम् ॥
stutā sampūjitā puṣpairgandhadhūpādibhistathā dadāti vittaṃ putrāṃśca matiṃ dharme gatiṃ śubhām
अर्थपुष्प, गन्ध, धूप आदि से स्तुति और पूजन किए जाने पर वे धन और पुत्र, धर्म में बुद्धि तथा शुभ गति प्रदान करती हैं।