सुरथवैश्ययोर्वरप्रदान
Suratha-Vaiśyayor Varapradāna
सुरथ व वैश्य को वरदान · 23 श्लोक
▶ पाठ सुनेंअध्याय सारांश
समापन अध्याय फ्रेम-कथा पर लौटता है और सप्तशती को ठीक सात सौ श्लोकों पर पूर्ण करता है। सम्पूर्ण देवी माहात्म्य कह चुकने पर मेधा मुनि राजा सुरथ को परम देवी की शरण लेने को कहते हैं, जिनकी माया से समस्त प्राणी मोहित होते हैं और जो पूजित होने पर भोग, स्वर्ग और मोक्ष देती हैं। राजा और वैश्य समाधि नदी-तट पर जाकर देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाते हैं, और तीन वर्ष तक पुष्प, अग्नि व संयम से उनकी आराधना करते हैं, यहाँ तक कि अपने शरीर के रक्त से सिंचित बलि भी अर्पित करते हैं। प्रसन्न होकर चण्डिका प्रत्यक्ष प्रकट होती हैं और दोनों को वर देती हैं: संसार से बँधे सुरथ अपने राज्य की वापसी माँगते हैं, जो अगले जन्म में अविनाशी होगा, और उन्हें वचन मिलता है कि वे सूर्य से जन्म लेकर सावर्णि मनु होंगे; आसक्ति-रहित वैश्य वह ज्ञान माँगता है जो 'मैं' और 'मेरा' को मिटा दे। दोनों को वर देकर देवी अन्तर्धान हो जाती हैं — और इस प्रकार देवी माहात्म्य समाप्त होता है।
✦ ध्यान — आरम्भिक मंगलाचरण
ॐ बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम् । पाशाङ्कुशवराभीतिर्धारयन्तीं शिवां भजे ॥
oṃ bālārkamaṇḍalābhāsāṃ caturbāhuṃ trilocanām pāśāṅkuśavarābhītirdhārayantīṃ śivāṃ bhaje
मैं उन कल्याणी देवी (शिवा) का भजन करता हूँ, जो उदीयमान सूर्य के मण्डल के समान कांति वाली, चतुर्भुजा और त्रिनेत्रा हैं, और जो पाश, अंकुश तथा वर एवं अभय मुद्राएँ धारण किए हुए हैं।
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ॐ ऋषिरुवाच एतत्ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तमम् । एवं प्रभावा सा देवी ययेदं धार्यते जगत् ॥
oṃ ṛṣiruvāca etatte kathitaṃ bhūpa devīmāhātmyamuttamam evaṃ prabhāvā sā devī yayedaṃ dhāryate jagat
अर्थ(ॐ। ऋषि बोले —) 'हे राजन्! देवी का यह उत्तम माहात्म्य आपको कह सुनाया। ऐसे प्रभाव वाली हैं वे देवी, जिनसे यह जगत् धारण किया जाता है।
विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया । तया त्वमेष वैश्यश्च तथैवान्ये विवेकिनः ॥
vidyā tathaiva kriyate bhagavadviṣṇumāyayā tayā tvameṣa vaiśyaśca tathaivānye vivekinaḥ
अर्थऔर ज्ञान (विद्या) भी वैसे ही भगवान् विष्णु की माया से उत्पन्न होता है। उन्हीं के द्वारा आप, यह वैश्य, और वैसे ही अन्य विवेकी जन —
मोह्यन्ते मोहिताश्चैव मोहमेष्यन्ति चापरे । तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम् ॥
mohyante mohitāścaiva mohameṣyanti cāpare tāmupaihi mahārāja śaraṇaṃ parameśvarīm
अर्थमोहित किए जाते हैं; (कुछ) मोहित हुए हैं, और कुछ अन्य मोह को प्राप्त होंगे। हे महाराज! उन परमेश्वरी की शरण में जाइए।
आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा ॥
ārādhitā saiva nṛṇāṃ bhogasvargāpavargadā
अर्थवही आराधना किए जाने पर मनुष्यों को भोग, स्वर्ग और मोक्ष देने वाली होती हैं।'
मार्कण्डेय उवाच इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरथः स नराधिपः ॥
mārkaṇḍeya uvāca iti tasya vacaḥ śrutvā surathaḥ sa narādhipaḥ
अर्थ(मार्कण्डेय बोले —) मुनि के ये वचन सुनकर वह नरेश सुरथ,
प्रणिपत्य महाभागं तमृषिं संशितव्रतम् । निर्विण्णोऽतिममत्वेन राज्यापहरणेन च ॥
praṇipatya mahābhāgaṃ tamṛṣiṃ saṃśitavratam nirviṇṇo'timamatvena rājyāpaharaṇena ca
अर्थदृढ़व्रती उन महाभाग ऋषि को प्रणाम करके — अत्यधिक ममता और राज्य के अपहरण से विरक्त होकर —
जगाम सद्यस्तपसे स च वैश्यो महामुने । सन्दर्शनार्थमम्बाया नदीपुलिनमास्थितः ॥
jagāma sadyastapase sa ca vaiśyo mahāmune sandarśanārthamambāyā nadīpulinamāsthitaḥ
अर्थतुरन्त तपस्या के लिए चल पड़े; और हे महामुने! वह वैश्य भी अम्बा के दर्शन के लिए नदी के तट पर जा बैठा।
स च वैश्यस्तपस्तेपे देवीसूक्तं परं जपन् । तौ तस्मिन् पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम् ॥
sa ca vaiśyastapastepe devīsūktaṃ paraṃ japan tau tasmin puline devyāḥ kṛtvā mūrtiṃ mahīmayīm
अर्थऔर वह वैश्य परम देवी-सूक्त का जप करते हुए तपस्या करने लगा। उन दोनों ने उस तट पर देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर,
अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः । निराहारौ यतात्मानौ तन्मनस्कौ समाहितौ ॥
arhaṇāṃ cakratustasyāḥ puṣpadhūpāgnitarpaṇaiḥ nirāhārau yatātmānau tanmanaskau samāhitau
अर्थपुष्प, धूप, अग्नि (हवन) और तर्पण से उनकी पूजा की; निराहार रहकर, संयमी होकर, उन्हीं में मन लगाए, एकाग्रचित्त होकर,
ददतुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुक्षितम् । एवं समाराधयतोस्त्रिभिर्वर्षैर्यतात्मनोः ॥
dadatustau baliṃ caiva nijagātrāsṛgukṣitam evaṃ samārādhayatostribhirvarṣairyatātmanoḥ
अर्थउन दोनों ने अपने ही शरीर के रक्त से सिंचित बलि भी अर्पित की। इस प्रकार तीन वर्षों तक आराधना करते उन संयमी जनों पर,
परितुष्टा जगद्धात्री प्रत्यक्षं प्राह चण्डिका ॥
parituṣṭā jagaddhātrī pratyakṣaṃ prāha caṇḍikā
अर्थजगद्धात्री चण्डिका परम प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष प्रकट होकर उनसे बोलीं:
देव्युवाच यत्प्रार्थ्यते त्वया भूप त्वया च कुलनन्दन । मत्तस्तत्प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददामिते ॥
devyuvāca yatprārthyate tvayā bhūpa tvayā ca kulanandana mattastatprāpyatāṃ sarvaṃ parituṣṭā dadāmite
अर्थ(देवी बोलीं —) 'हे राजन्! और हे कुलनन्दन! तुम दोनों जो माँगते हो, वह सब मुझसे प्राप्त करो; प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वह देती हूँ।'
मार्कण्डेय उवाच ततो वव्रे नृपो राज्यमविभ्रंश्यन्यजन्मनि । अत्रैव च निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात् ॥
mārkaṇḍeya uvāca tato vavre nṛpo rājyamavibhraṃśyanyajanmani atraiva ca nijaṃ rājyaṃ hataśatrubalaṃ balāt
अर्थ(मार्कण्डेय बोले —) तब राजा ने दूसरे जन्म में अविनाशी राज्य, और इसी जन्म में बलपूर्वक शत्रुओं का बल नष्ट कर अपना राज्य माँगा।
सोऽपि वैश्यस्ततो ज्ञानं वव्रे निर्विण्णमानसः । ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्गविच्युतिकारकम् ॥
so'pi vaiśyastato jñānaṃ vavre nirviṇṇamānasaḥ mametyahamiti prājñaḥ saṅgavicyutikārakam
अर्थऔर उस वैश्य ने भी विरक्त मन वाले उस प्राज्ञ ने 'मेरा' और 'मैं' की आसक्ति को दूर करने वाला ज्ञान माँगा।
देव्युवाच स्वल्पैरहोभिर्नृपते स्वं राज्यं प्राप्स्यते भवान् ॥
devyuvāca svalpairahobhirnṛpate svaṃ rājyaṃ prāpsyate bhavān
अर्थ(देवी बोलीं —) 'हे नृपते! थोड़े ही दिनों में आप अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे।
हत्वा रिपूनस्खलितं तव तत्र भविष्यति ॥
hatvā ripūnaskhalitaṃ tava tatra bhaviṣyati
अर्थशत्रुओं का वध करके वह राज्य वहाँ आपको अविचल रूप से प्राप्त होगा।
मृतश्च भूयः सम्प्राप्य जन्म देवाद्विवस्वतः ॥
mṛtaśca bhūyaḥ samprāpya janma devādvivasvataḥ
अर्थऔर मृत्यु के पश्चात् पुनः सूर्य (विवस्वान्) देव से जन्म पाकर,
सावर्णिको मनुर्नाम भवान्भुवि भविष्यति ॥
sāvarṇiko manurnāma bhavānbhuvi bhaviṣyati
अर्थआप पृथ्वी पर सावर्णि नामक मनु होंगे।
वैश्यवर्य त्वया यश्च वरोऽस्मत्तोऽभिवाञ्छितः ॥
vaiśyavarya tvayā yaśca varo'smatto'bhivāñchitaḥ
अर्थऔर हे वैश्यश्रेष्ठ! तुमने मुझसे जो वर चाहा है —
तं प्रयच्छामि संसिद्ध्यै तव ज्ञानं भविष्यति ॥
taṃ prayacchāmi saṃsiddhyai tava jñānaṃ bhaviṣyati
अर्थवह मैं तुम्हारी सिद्धि के लिए प्रदान करती हूँ: तुम्हें ज्ञान प्राप्त होगा।'
मार्कण्डेय उवाच इति दत्त्वा तयोर्देवी यथाभिलषितं वरम् ॥
mārkaṇḍeya uvāca iti dattvā tayordevī yathābhilaṣitaṃ varam
अर्थ(मार्कण्डेय बोले —) इस प्रकार उन दोनों को यथेच्छ वर देकर देवी,
बभूवान्तर्हिता सद्यो भक्त्या ताभ्यामभिष्टुता । एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः ॥
babhūvāntarhitā sadyo bhaktyā tābhyāmabhiṣṭutā evaṃ devyā varaṃ labdhvā surathaḥ kṣatriyarṣabhaḥ
अर्थउन दोनों द्वारा भक्तिपूर्वक स्तुति की जाकर तत्काल अन्तर्धान हो गईं। इस प्रकार देवी से वर पाकर क्षत्रियश्रेष्ठ सुरथ,
सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः ॥
sūryājjanma samāsādya sāvarṇirbhavitā manuḥ
अर्थसूर्य से जन्म पाकर सावर्णि (आठवें) मनु होंगे।