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दुर्गा सप्तशती 13.14

अध्याय 13, श्लोक 14

अध्याय 13: Suratha-Vaiśyayor Varapradānaसुरथवैश्ययोर्वरप्रदान

सोऽपि वैश्यस्ततो ज्ञानं वव्रे निर्विण्णमानसः ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्गविच्युतिकारकम्

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लिप्यंतरण

so'pi vaiśyastato jñānaṃ vavre nirviṇṇamānasaḥ mametyahamiti prājñaḥ saṅgavicyutikārakam

अर्थ

और उस वैश्य ने भी विरक्त मन वाले उस प्राज्ञ ने 'मेरा' और 'मैं' की आसक्ति को दूर करने वाला ज्ञान माँगा।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 13.14 का अर्थ क्या है?
और उस वैश्य ने भी विरक्त मन वाले उस प्राज्ञ ने 'मेरा' और 'मैं' की आसक्ति को दूर करने वाला ज्ञान माँगा।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 13 (Suratha-Vaiśyayor Varapradāna — सुरथ व वैश्य को वरदान) का 14वाँ श्लोक है।