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दुर्गा सप्तशती 13.2

अध्याय 13, श्लोक 2

अध्याय 13: Suratha-Vaiśyayor Varapradānaसुरथवैश्ययोर्वरप्रदान

विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया तया त्वमेष वैश्यश्च तथैवान्ये विवेकिनः

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लिप्यंतरण

vidyā tathaiva kriyate bhagavadviṣṇumāyayā tayā tvameṣa vaiśyaśca tathaivānye vivekinaḥ

अर्थ

और ज्ञान (विद्या) भी वैसे ही भगवान् विष्णु की माया से उत्पन्न होता है। उन्हीं के द्वारा आप, यह वैश्य, और वैसे ही अन्य विवेकी जन —

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 13.2 का अर्थ क्या है?
और ज्ञान (विद्या) भी वैसे ही भगवान् विष्णु की माया से उत्पन्न होता है। उन्हीं के द्वारा आप, यह वैश्य, और वैसे ही अन्य विवेकी जन —
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 13 (Suratha-Vaiśyayor Varapradāna — सुरथ व वैश्य को वरदान) का 2वाँ श्लोक है।