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दुर्गा सप्तशती 13.9

अध्याय 13, श्लोक 9

अध्याय 13: Suratha-Vaiśyayor Varapradānaसुरथवैश्ययोर्वरप्रदान

अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः निराहारौ यतात्मानौ तन्मनस्कौ समाहितौ

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लिप्यंतरण

arhaṇāṃ cakratustasyāḥ puṣpadhūpāgnitarpaṇaiḥ nirāhārau yatātmānau tanmanaskau samāhitau

अर्थ

पुष्प, धूप, अग्नि (हवन) और तर्पण से उनकी पूजा की; निराहार रहकर, संयमी होकर, उन्हीं में मन लगाए, एकाग्रचित्त होकर,

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 13.9 का अर्थ क्या है?
पुष्प, धूप, अग्नि (हवन) और तर्पण से उनकी पूजा की; निराहार रहकर, संयमी होकर, उन्हीं में मन लगाए, एकाग्रचित्त होकर,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 13 (Suratha-Vaiśyayor Varapradāna — सुरथ व वैश्य को वरदान) का 9वाँ श्लोक है।