अध्याय 13, श्लोक 10
अध्याय 13: Suratha-Vaiśyayor Varapradāna — सुरथवैश्ययोर्वरप्रदानददतुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुक्षितम् । एवं समाराधयतोस्त्रिभिर्वर्षैर्यतात्मनोः ॥
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लिप्यंतरण
dadatustau baliṃ caiva nijagātrāsṛgukṣitam evaṃ samārādhayatostribhirvarṣairyatātmanoḥ
अर्थ
उन दोनों ने अपने ही शरीर के रक्त से सिंचित बलि भी अर्पित की। इस प्रकार तीन वर्षों तक आराधना करते उन संयमी जनों पर,
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 13.10 का अर्थ क्या है?▼
उन दोनों ने अपने ही शरीर के रक्त से सिंचित बलि भी अर्पित की। इस प्रकार तीन वर्षों तक आराधना करते उन संयमी जनों पर,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 13 (Suratha-Vaiśyayor Varapradāna — सुरथ व वैश्य को वरदान) का 10वाँ श्लोक है।