अध्याय 13, श्लोक 22
अध्याय 13: Suratha-Vaiśyayor Varapradāna — सुरथवैश्ययोर्वरप्रदानबभूवान्तर्हिता सद्यो भक्त्या ताभ्यामभिष्टुता । एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः ॥
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लिप्यंतरण
babhūvāntarhitā sadyo bhaktyā tābhyāmabhiṣṭutā evaṃ devyā varaṃ labdhvā surathaḥ kṣatriyarṣabhaḥ
अर्थ
उन दोनों द्वारा भक्तिपूर्वक स्तुति की जाकर तत्काल अन्तर्धान हो गईं। इस प्रकार देवी से वर पाकर क्षत्रियश्रेष्ठ सुरथ,
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 13.22 का अर्थ क्या है?▼
उन दोनों द्वारा भक्तिपूर्वक स्तुति की जाकर तत्काल अन्तर्धान हो गईं। इस प्रकार देवी से वर पाकर क्षत्रियश्रेष्ठ सुरथ,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 13 (Suratha-Vaiśyayor Varapradāna — सुरथ व वैश्य को वरदान) का 22वाँ श्लोक है।