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दुर्गा सप्तशती 13.12

अध्याय 13, श्लोक 12

अध्याय 13: Suratha-Vaiśyayor Varapradānaसुरथवैश्ययोर्वरप्रदान

देव्युवाच यत्प्रार्थ्यते त्वया भूप त्वया कुलनन्दन मत्तस्तत्प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददामिते

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लिप्यंतरण

devyuvāca yatprārthyate tvayā bhūpa tvayā ca kulanandana mattastatprāpyatāṃ sarvaṃ parituṣṭā dadāmite

अर्थ

(देवी बोलीं —) 'हे राजन्! और हे कुलनन्दन! तुम दोनों जो माँगते हो, वह सब मुझसे प्राप्त करो; प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वह देती हूँ।'

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 13.12 का अर्थ क्या है?
(देवी बोलीं —) 'हे राजन्! और हे कुलनन्दन! तुम दोनों जो माँगते हो, वह सब मुझसे प्राप्त करो; प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वह देती हूँ।'
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 13 (Suratha-Vaiśyayor Varapradāna — सुरथ व वैश्य को वरदान) का 12वाँ श्लोक है।