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दुर्गा सप्तशती 12.10

अध्याय 12, श्लोक 10

अध्याय 12: Bhagavatī Vākya (Phalaśruti)भगवतीवाक्य (फलश्रुति)

जानताजानता वापि बलिपूजां यथा कृताम् प्रतीक्षिष्याम्यहं प्रीत्या वह्निहोमं तथाकृतम्

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लिप्यंतरण

jānatājānatā vāpi balipūjāṃ yathā kṛtām pratīkṣiṣyāmyahaṃ prītyā vahnihomaṃ tathākṛtam

अर्थ

जाने या अनजाने में जैसी भी बलि-पूजा की गई, और जैसा भी अग्नि-होम किया गया, उसे मैं प्रेमपूर्वक स्वीकार करूँगी।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 12.10 का अर्थ क्या है?
जाने या अनजाने में जैसी भी बलि-पूजा की गई, और जैसा भी अग्नि-होम किया गया, उसे मैं प्रेमपूर्वक स्वीकार करूँगी।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 12 (Bhagavatī Vākya (Phalaśruti) — भगवती वाक्य — फलश्रुति) का 10वाँ श्लोक है।