अध्याय 12, श्लोक 8
अध्याय 12: Bhagavatī Vākya (Phalaśruti) — भगवतीवाक्य (फलश्रुति)यत्रैतत्पठ्यते सम्यङ्नित्यमायतने मम । सदा न तद्विमोक्ष्यामि सान्निध्यं तत्र मे स्थितम् ॥
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लिप्यंतरण
yatraitatpaṭhyate samyaṅnityamāyatane mama sadā na tadvimokṣyāmi sānnidhyaṃ tatra me sthitam
अर्थ
जहाँ मेरे मन्दिर में नित्य भलीभाँति इसका पाठ होता है, वह स्थान मैं कभी नहीं छोड़ूँगी; वहाँ मेरी सन्निधि (उपस्थिति) स्थित रहती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 12.8 का अर्थ क्या है?▼
जहाँ मेरे मन्दिर में नित्य भलीभाँति इसका पाठ होता है, वह स्थान मैं कभी नहीं छोड़ूँगी; वहाँ मेरी सन्निधि (उपस्थिति) स्थित रहती है।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 12 (Bhagavatī Vākya (Phalaśruti) — भगवती वाक्य — फलश्रुति) का 8वाँ श्लोक है।