अध्याय 12, श्लोक 15
अध्याय 12: Bhagavatī Vākya (Phalaśruti) — भगवतीवाक्य (फलश्रुति)शान्तिकर्मणि सर्वत्र तथा दुःस्वप्नदर्शने । ग्रहपीडासु चोग्रासु माहात्म्यं शृणुयान्मम ॥
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लिप्यंतरण
śāntikarmaṇi sarvatra tathā duḥsvapnadarśane grahapīḍāsu cogrāsu māhātmyaṃ śaṛṇuyānmama
अर्थ
सर्वत्र — शान्ति-कर्म में, दुःस्वप्न-दर्शन में, और उग्र ग्रह-पीड़ाओं में — मनुष्य को मेरा माहात्म्य सुनना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 12.15 का अर्थ क्या है?▼
सर्वत्र — शान्ति-कर्म में, दुःस्वप्न-दर्शन में, और उग्र ग्रह-पीड़ाओं में — मनुष्य को मेरा माहात्म्य सुनना चाहिए।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 12 (Bhagavatī Vākya (Phalaśruti) — भगवती वाक्य — फलश्रुति) का 15वाँ श्लोक है।