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दुर्गा सप्तशती 12.21

अध्याय 12, श्लोक 21

अध्याय 12: Bhagavatī Vākya (Phalaśruti)भगवतीवाक्य (फलश्रुति)

प्रीतिर्मे क्रियते सास्मिन् सकृदुच्चरिते श्रुते श्रुतं हरति पापानि तथारोग्यं प्रयच्छति

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लिप्यंतरण

prītirme kriyate sāsmin sakṛduccarite śrute śrutaṃ harati pāpāni tathārogyaṃ prayacchati

अर्थ

मेरी जो प्रीति (वर्ष भर में) की जाती है, वह इस माहात्म्य के एक बार उच्चारण या श्रवण से ही (प्राप्त हो जाती है)। इसका श्रवण पापों को हरता है और आरोग्य प्रदान करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 12.21 का अर्थ क्या है?
मेरी जो प्रीति (वर्ष भर में) की जाती है, वह इस माहात्म्य के एक बार उच्चारण या श्रवण से ही (प्राप्त हो जाती है)। इसका श्रवण पापों को हरता है और आरोग्य प्रदान करता है।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 12 (Bhagavatī Vākya (Phalaśruti) — भगवती वाक्य — फलश्रुति) का 21वाँ श्लोक है।