अध्याय 12, श्लोक 25
अध्याय 12: Bhagavatī Vākya (Phalaśruti) — भगवतीवाक्य (फलश्रुति)दस्युभिर्वा वृतः शून्ये गृहीतो वापि शत्रुभिः । सिंहव्याघ्रानुयातो वा वने वा वनहस्तिभिः ॥
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लिप्यंतरण
dasyubhirvā vṛtaḥ śūnye gṛhīto vāpi śatrubhiḥ siṃhavyāghrānuyāto vā vane vā vanahastibhiḥ
अर्थ
अथवा सुनसान में डाकुओं से घिरा हुआ, या शत्रुओं द्वारा पकड़ा हुआ, या सिंह-व्याघ्रों अथवा वन के जंगली हाथियों द्वारा पीछा किया हुआ,
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 12.25 का अर्थ क्या है?▼
अथवा सुनसान में डाकुओं से घिरा हुआ, या शत्रुओं द्वारा पकड़ा हुआ, या सिंह-व्याघ्रों अथवा वन के जंगली हाथियों द्वारा पीछा किया हुआ,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 12 (Bhagavatī Vākya (Phalaśruti) — भगवती वाक्य — फलश्रुति) का 25वाँ श्लोक है।