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ਭਗਵਦ੍ਗੀਤਾ · ਅਧ੍ਯਾਯ 2 / 18

ਸਾਂਖ੍ਯਯੋਗ

Bhagavad Gita Chapter 2 in Punjabi (Gurmukhi)

Sānkhya Yog · ज्ञान योग · 72 श्लोक

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अध्याय सारांश

भगवद गीता का दूसरा अध्याय सांख्य योग है। यह अध्याय भगवद गीता का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है क्योंकि इसमें भगवान श्रीकृष्ण संपूर्ण गीता की शिक्षाओं को संघनित करते हैं। यह अध्याय पूरी गीता का सार है। सांख्य योग को 4 मुख्य विषयों में वर्गीकृत किया जा सकता है - १. अर्जुन ने पूरी तरह से भगवान कृष्ण को आत्मसमर्पण किया और उन्हें अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया। २. सभी दु:खों के मुख्य कारणों की व्याख्या, जो स्व की वास्तविक प्रकृति की अज्ञानता है। ३. कर्मयोग - अपने कर्मों के फलों से जुड़े बिना नि:स्वार्थ क्रिया का अनुशासन। ४. एक परिपूर्ण मनुष्य का विवरण - जिसका मस्तिष्क स्थिर और एक-इशारा है।

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ਸਞ੍ਜਯ ਉਵਾਚ ਤਂ ਤਥਾ ਕृਪਯਾऽਵਿष੍ਟਮਸ਼੍ਰੁਪੂਰ੍ਣਾਕੁਲੇਕ੍षਣਮ੍। ਵਿषੀਦਨ੍ਤਮਿਦਂ ਵਾਕ੍ਯਮੁਵਾਚ ਮਧੁਸੂਦਨਃ॥

sañjaya uvācha taṁ tathā kṛipayāviṣhṭamaśhru pūrṇākulekṣhaṇam viṣhīdantamidaṁ vākyam uvācha madhusūdanaḥ

अर्थसंजय ने कहा -- इस प्रकार करुणा और विषाद से अभिभूत, अश्रुपूरित नेत्रों वाले आकुल अर्जुन से मधुसूदन ने यह वाक्य कहा।।

ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚ ਕੁਤਸ੍ਤ੍ਵਾ ਕਸ਼੍ਮਲਮਿਦਂ ਵਿषਮੇ ਸਮੁਪਸ੍ਥਿਤਮ੍। ਅਨਾਰ੍ਯਜੁष੍ਟਮਸ੍ਵਰ੍ਗ੍ਯਮਕੀਰ੍ਤਿਕਰਮਰ੍ਜੁਨ॥

śhrī bhagavān uvācha kutastvā kaśhmalamidaṁ viṣhame samupasthitam anārya-juṣhṭamaswargyam akīrti-karam arjuna

अर्थश्री भगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! तुमको इस विषम स्थल में यह मोह कहाँ से उत्पन्न हुआ? यह आर्य आचरण के विपरीत न तो स्वर्ग प्राप्ति का साधन ही है और न कीर्ति कराने वाला ही है।।

ਕ੍ਲੈਬ੍ਯਂ ਮਾ ਸ੍ਮ ਗਮਃ ਪਾਰ੍ਥ ਨੈਤਤ੍ਤ੍ਵਯ੍ਯੁਪਪਦ੍ਯਤੇ। ਕ੍षੁਦ੍ਰਂ ਹृਦਯਦੌਰ੍ਬਲ੍ਯਂ ਤ੍ਯਕ੍ਤ੍ਵੋਤ੍ਤਿष੍ਠ ਪਰਨ੍ਤਪ॥

klaibyaṁ mā sma gamaḥ pārtha naitat tvayyupapadyate kṣhudraṁ hṛidaya-daurbalyaṁ tyaktvottiṣhṭha parantapa

अर्थहे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।।

ਅਰ੍ਜੁਨ ਉਵਾਚ ਕਥਂ ਭੀष੍ਮਮਹਂ ਸਂਖ੍ਯੇ ਦ੍ਰੋਣਂ ਮਧੁਸੂਦਨ। ਇषੁਭਿਃ ਪ੍ਰਤਿਯੋਤ੍ਸ੍ਯਾਮਿ ਪੂਜਾਰ੍ਹਾਵਰਿਸੂਦਨ॥

arjuna uvācha kathaṁ bhīṣhmam ahaṁ sankhye droṇaṁ cha madhusūdana iṣhubhiḥ pratiyotsyāmi pūjārhāvari-sūdana

अर्थअर्जुन ने कहा -- हे मधुसूदन ! मैं रणभूमि में किस प्रकार भीष्म और द्रोण के साथ बाणों से युद्ध करूँगा। हे अरिसूदन, वे दोनों ही पूजनीय हैं।।

ਗੁਰੂਨਹਤ੍ਵਾ ਹਿ ਮਹਾਨੁਭਾਵਾਨ੍ ਸ਼੍ਰੇਯੋ ਭੋਕ੍ਤੁਂ ਭੈਕ੍ष੍ਯਮਪੀਹ ਲੋਕੇ। ਹਤ੍ਵਾਰ੍ਥਕਾਮਾਂਸ੍ਤੁ ਗੁਰੂਨਿਹੈਵ ਭੁਞ੍ਜੀਯ ਭੋਗਾਨ੍ ਰੁਧਿਰਪ੍ਰਦਿਗ੍ਧਾਨ੍॥

gurūnahatvā hi mahānubhāvān śhreyo bhoktuṁ bhaikṣhyamapīha loke hatvārtha-kāmāṁstu gurūnihaiva bhuñjīya bhogān rudhira-pradigdhān

अर्थइन महानुभाव गुरुजनों को मारने से इस लोक में भिक्षा का अन्न भी ग्रहण करना अधिक कल्याण कारक है, क्योंकि गुरुजनों को मारकर मैं इस लोक में रक्तरंजित अर्थ और काम रूप भोगों को ही भोगूँगा।।

ਚੈਤਦ੍ਵਿਦ੍ਮਃ ਕਤਰਨ੍ਨੋ ਗਰੀਯੋ ਯਦ੍ਵਾ ਜਯੇਮ ਯਦਿ ਵਾ ਨੋ ਜਯੇਯੁਃ। ਯਾਨੇਵ ਹਤ੍ਵਾ ਜਿਜੀਵਿषਾਮ ਸ੍ਤੇऽਵਸ੍ਥਿਤਾਃ ਪ੍ਰਮੁਖੇ ਧਾਰ੍ਤਰਾष੍ਟ੍ਰਾਃ॥

na chaitadvidmaḥ kataranno garīyo yadvā jayema yadi vā no jayeyuḥ yāneva hatvā na jijīviṣhāmas te ’vasthitāḥ pramukhe dhārtarāṣhṭrāḥ

अर्थहम नहीं जानते कि हमें क्या करना उचित है। हम यह भी नहीं जानते कि हम जीतेंगे, या वे हमको जीतेंगे, जिनको मारकर हम जीवित नहीं रहना चाहते वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं।।

ਕਾਰ੍ਪਣ੍ਯਦੋषੋਪਹਤਸ੍ਵਭਾਵਃ ਪृਚ੍ਛਾਮਿ ਤ੍ਵਾਂ ਧਰ੍ਮਸਂਮੂਢਚੇਤਾਃ। ਯਚ੍ਛ੍ਰੇਯਃ ਸ੍ਯਾਨ੍ਨਿਸ਼੍ਿਚਤਂ ਬ੍ਰੂਹਿ ਤਨ੍ਮੇ ਸ਼ਿष੍ਯਸ੍ਤੇऽਹਂ ਸ਼ਾਧਿ ਮਾਂ ਤ੍ਵਾਂ ਪ੍ਰਪਨ੍ਨਮ੍॥

kārpaṇya-doṣhopahata-svabhāvaḥ pṛichchhāmi tvāṁ dharma-sammūḍha-chetāḥ yach-chhreyaḥ syānniśhchitaṁ brūhi tanme śhiṣhyaste ’haṁ śhādhi māṁ tvāṁ prapannam

अर्थकरुणा के कलुष से अभिभूत और कर्तव्यपथ पर संभ्रमित हुआ मैं आपसे पूछता हूँ, कि मेरे लिये जो श्रेयष्कर हो, उसे आप निश्चय करके कहिये, क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ; शरण में आये मुझको आप उपदेश दीजिये।।

ਹਿ ਪ੍ਰਪਸ਼੍ਯਾਮਿ ਮਮਾਪਨੁਦ੍ਯਾ ਦ੍ਯਚ੍ਛੋਕਮੁਚ੍ਛੋषਣਮਿਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਣਾਮ੍। ਅਵਾਪ੍ਯ ਭੂਮਾਵਸਪਤ੍ਨਮृਦ੍ਧਮ੍ ਰਾਜ੍ਯਂ ਸੁਰਾਣਾਮਪਿ ਚਾਧਿਪਤ੍ਯਮ੍॥

na hi prapaśhyāmi mamāpanudyād yach-chhokam uchchhoṣhaṇam-indriyāṇām avāpya bhūmāv-asapatnamṛiddhaṁ rājyaṁ surāṇāmapi chādhipatyam

अर्थपृथ्वी पर निष्कण्टक समृद्ध राज्य को और देवताओं के स्वामित्व को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके।।

ਸਞ੍ਜਯ ਉਵਾਚ ਏਵਮੁਕ੍ਤ੍ਵਾ ਹृषੀਕੇਸ਼ਂ ਗੁਡਾਕੇਸ਼ਃ ਪਰਨ੍ਤਪ। ਯੋਤ੍ਸ੍ਯ ਇਤਿ ਗੋਵਿਨ੍ਦਮੁਕ੍ਤ੍ਵਾ ਤੂष੍ਣੀਂ ਬਭੂਵ ਹ॥

sañjaya uvācha evam-uktvā hṛiṣhīkeśhaṁ guḍākeśhaḥ parantapa na yotsya iti govindam uktvā tūṣhṇīṁ babhūva ha

अर्थसंजय ने कहा -- इस प्रकार गुडाकेश परंतप अर्जुन भगवान् हृषीकेश से यह कहकर कि हे गोविन्द "मैं युद्ध नहीं करूँगा" चुप हो गया।।

ਤਮੁਵਾਚ ਹृषੀਕੇਸ਼ਃ ਪ੍ਰਹਸਨ੍ਨਿਵ ਭਾਰਤ। ਸੇਨਯੋਰੁਭਯੋਰ੍ਮਧ੍ਯੇ ਵਿषੀਦਨ੍ਤਮਿਦਂ ਵਚਃ॥

tam-uvācha hṛiṣhīkeśhaḥ prahasanniva bhārata senayorubhayor-madhye viṣhīdantam-idaṁ vachaḥ

अर्थहे भारत (धृतराष्ट्र) ! दोनों सेनाओं के बीच में उस शोकमग्न अर्जुन को भगवान् हृषीकेश ने हँसते हुए से यह वचन कहे।।

ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚ ਅਸ਼ੋਚ੍ਯਾਨਨ੍ਵਸ਼ੋਚਸ੍ਤ੍ਵਂ ਪ੍ਰਜ੍ਞਾਵਾਦਾਂਸ਼੍ਚ ਭਾषਸੇ। ਗਤਾਸੂਨਗਤਾਸੂਂਸ਼੍ਚ ਨਾਨੁਸ਼ੋਚਨ੍ਤਿ ਪਣ੍ਡਿਤਾਃ॥

śhrī bhagavān uvācha aśhochyān-anvaśhochas-tvaṁ prajñā-vādānśh cha bhāṣhase gatāsūn-agatāsūnśh-cha nānuśhochanti paṇḍitāḥ

अर्थश्री भगवान् ने कहा -- (अशोच्यान्) जिनके लिये शोक करना उचित नहीं है, उनके लिये तुम शोक करते हो और ज्ञानियों के से वचनों को कहते हो, परन्तु ज्ञानी पुरुष मृत (गतासून्) और जीवित (अगतासून्) दोनों के लिये शोक नहीं करते हैं।।

ਤ੍ਵੇਵਾਹਂ ਜਾਤੁ ਨਾਸਂ ਤ੍ਵਂ ਨੇਮੇ ਜਨਾਧਿਪਾਃ। ਚੈਵ ਭਵਿष੍ਯਾਮਃ ਸਰ੍ਵੇ ਵਯਮਤਃ ਪਰਮ੍॥

na tvevāhaṁ jātu nāsaṁ na tvaṁ neme janādhipāḥ na chaiva na bhaviṣhyāmaḥ sarve vayamataḥ param

अर्थवास्तव में न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था अथवा तुम नहीं थे अथवा ये राजालोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।।

ਦੇਹਿਨੋऽਸ੍ਮਿਨ੍ਯਥਾ ਦੇਹੇ ਕੌਮਾਰਂ ਯੌਵਨਂ ਜਰਾ। ਤਥਾ ਦੇਹਾਨ੍ਤਰਪ੍ਰਾਪ੍ਤਿਰ੍ਧੀਰਸ੍ਤਤ੍ਰ ਮੁਹ੍ਯਤਿ॥

dehino ’smin yathā dehe kaumāraṁ yauvanaṁ jarā tathā dehāntara-prāptir dhīras tatra na muhyati

अर्थजैसे इस देह में देही जीवात्मा की कुमार, युवा और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही उसको अन्य शरीर की प्राप्ति होती है; धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता है।।

ਮਾਤ੍ਰਾਸ੍ਪਰ੍ਸ਼ਾਸ੍ਤੁ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਸ਼ੀਤੋष੍ਣਸੁਖਦੁਃਖਦਾਃ। ਆਗਮਾਪਾਯਿਨੋऽਨਿਤ੍ਯਾਸ੍ਤਾਂਸ੍ਤਿਤਿਕ੍षਸ੍ਵ ਭਾਰਤ॥

mātrā-sparśhās tu kaunteya śhītoṣhṇa-sukha-duḥkha-dāḥ āgamāpāyino ’nityās tans-titikṣhasva bhārata

अर्थहे कुन्तीपुत्र ! शीत और उष्ण और सुख दुख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग का प्रारम्भ और अन्त होता है; वे अनित्य हैं, इसलिए, हे भारत ! उनको तुम सहन करो।।

ਯਂ ਹਿ ਵ੍ਯਥਯਨ੍ਤ੍ਯੇਤੇ ਪੁਰੁषਂ ਪੁਰੁषਰ੍षਭ। ਸਮਦੁਃਖਸੁਖਂ ਧੀਰਂ ਸੋऽਮृਤਤ੍ਵਾਯ ਕਲ੍ਪਤੇ॥

yaṁ hi na vyathayantyete puruṣhaṁ puruṣharṣhabha sama-duḥkha-sukhaṁ dhīraṁ so ’mṛitatvāya kalpate

अर्थहे पुरुषश्रेष्ठ ! दुख और सुख में समान भाव से रहने वाले जिस धीर पुरुष को ये व्यथित नहीं कर सकते हैं वह अमृतत्व (मोक्ष) का अधिकारी होता है।।

ਨਾਸਤੋ ਵਿਦ੍ਯਤੇ ਭਾਵੋ ਨਾਭਾਵੋ ਵਿਦ੍ਯਤੇ ਸਤਃ। ਉਭਯੋਰਪਿ ਦृष੍ਟੋऽਨ੍ਤਸ੍ਤ੍ਵਨਯੋਸ੍ਤਤ੍ਤ੍ਵਦਰ੍ਸ਼ਿਭਿਃ॥

nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ ubhayorapi dṛiṣhṭo ’nta stvanayos tattva-darśhibhiḥ

अर्थअसत् वस्तु का तो अस्तित्व नहीं है और सत् का कभी अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्त्व, तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुषों के द्वारा देखा गया है।।

ਅਵਿਨਾਸ਼ਿ ਤੁ ਤਦ੍ਵਿਦ੍ਧਿ ਯੇਨ ਸਰ੍ਵਮਿਦਂ ਤਤਮ੍। ਵਿਨਾਸ਼ਮਵ੍ਯਯਸ੍ਯਾਸ੍ਯ ਕਸ਼੍ਚਿਤ੍ ਕਰ੍ਤੁਮਰ੍ਹਤਿ॥

avināśhi tu tadviddhi yena sarvam idaṁ tatam vināśham avyayasyāsya na kaśhchit kartum arhati

अर्थउस वस्तु को तुम अविनाशी जानों, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। इस अव्यय का नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।।

ਅਨ੍ਤਵਨ੍ਤ ਇਮੇ ਦੇਹਾ ਨਿਤ੍ਯਸ੍ਯੋਕ੍ਤਾਃ ਸ਼ਰੀਰਿਣਃ। ਅਨਾਸ਼ਿਨੋऽਪ੍ਰਮੇਯਸ੍ਯ ਤਸ੍ਮਾਦ੍ਯੁਧ੍ਯਸ੍ਵ ਭਾਰਤ॥

antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śharīriṇaḥ anāśhino ’prameyasya tasmād yudhyasva bhārata

अर्थइस नाशरहित अप्रमेय नित्य देही आत्मा के ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं। इसलिये हे भारत ! तुम युद्ध करो।।

ਏਨਂ ਵੇਤ੍ਤਿ ਹਨ੍ਤਾਰਂ ਯਸ਼੍ਚੈਨਂ ਮਨ੍ਯਤੇ ਹਤਮ੍। ਉਭੌ ਤੌ ਵਿਜਾਨੀਤੋ ਨਾਯਂ ਹਨ੍ਤਿ ਹਨ੍ਯਤੇ॥

ya enaṁ vetti hantāraṁ yaśh chainaṁ manyate hatam ubhau tau na vijānīto nāyaṁ hanti na hanyate

अर्थजो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसको मरा समझता है वे दोनों ही नहीं जानते हैं, क्योंकि यह आत्मा न मरता है और न मारा जाता है।।

ਜਾਯਤੇ ਮ੍ਰਿਯਤੇ ਵਾ ਕਦਾਚਿ ਨ੍ਨਾਯਂ ਭੂਤ੍ਵਾ ਭਵਿਤਾ ਵਾ ਭੂਯਃ। ਅਜੋ ਨਿਤ੍ਯਃ ਸ਼ਾਸ਼੍ਵਤੋऽਯਂ ਪੁਰਾਣੋ ਹਨ੍ਯਤੇ ਹਨ੍ਯਮਾਨੇ ਸ਼ਰੀਰੇ॥

na jāyate mriyate vā kadāchin nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ ajo nityaḥ śhāśhvato ’yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śharīre

अर्थयह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।।

ਵੇਦਾਵਿਨਾਸ਼ਿਨਂ ਨਿਤ੍ਯਂ ਏਨਮਜਮਵ੍ਯਯਮ੍। ਕਥਂ ਪੁਰੁषਃ ਪਾਰ੍ਥ ਕਂ ਘਾਤਯਤਿ ਹਨ੍ਤਿ ਕਮ੍॥

vedāvināśhinaṁ nityaṁ ya enam ajam avyayam kathaṁ sa puruṣhaḥ pārtha kaṁ ghātayati hanti kam

अर्थहे पार्थ ! जो पुरुष इस आत्मा को अविनाशी, नित्य और अव्ययस्वरूप जानता है, वह कैसे किसको मरवायेगा और कैसे किसको मारेगा?

ਵਾਸਾਂਸਿ ਜੀਰ੍ਣਾਨਿ ਯਥਾ ਵਿਹਾਯ ਨਵਾਨਿ ਗृਹ੍ਣਾਤਿ ਨਰੋऽਪਰਾਣਿ। ਤਥਾ ਸ਼ਰੀਰਾਣਿ ਵਿਹਾਯ ਜੀਰ੍ਣਾ ਨ੍ਯਨ੍ਯਾਨਿ ਸਂਯਾਤਿ ਨਵਾਨਿ ਦੇਹੀ॥

vāsānsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛihṇāti naro ’parāṇi tathā śharīrāṇi vihāya jīrṇānya nyāni sanyāti navāni dehī

अर्थजैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।।

ਨੈਨਂ ਛਿਨ੍ਦਨ੍ਤਿ ਸ਼ਸ੍ਤ੍ਰਾਣਿ ਨੈਨਂ ਦਹਤਿ ਪਾਵਕਃ। ਚੈਨਂ ਕ੍ਲੇਦਯਨ੍ਤ੍ਯਾਪੋ ਸ਼ੋषਯਤਿ ਮਾਰੁਤਃ॥

nainaṁ chhindanti śhastrāṇi nainaṁ dahati pāvakaḥ na chainaṁ kledayantyāpo na śhoṣhayati mārutaḥ

अर्थइस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते और न अग्नि इसे जला सकती है ; जल इसे गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती।।

ਅਚ੍ਛੇਦ੍ਯੋऽਯਮਦਾਹ੍ਯੋऽਯਮਕ੍ਲੇਦ੍ਯੋऽਸ਼ੋष੍ਯ ਏਵ ਚ। ਨਿਤ੍ਯਃ ਸਰ੍ਵਗਤਃ ਸ੍ਥਾਣੁਰਚਲੋऽਯਂ ਸਨਾਤਨਃ॥

achchhedyo ’yam adāhyo ’yam akledyo ’śhoṣhya eva cha nityaḥ sarva-gataḥ sthāṇur achalo ’yaṁ sanātanaḥ

अर्थक्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य (काटी नहीं जा सकती), अदाह्य (जलाई नहीं जा सकती), अक्लेद्य (गीली नहीं हो सकती ) और अशोष्य (सुखाई नहीं जा सकती) है; यह नित्य, सर्वगत, स्थाणु (स्थिर), अचल और सनातन है।।

ਅਵ੍ਯਕ੍ਤੋऽਯਮਚਿਨ੍ਤ੍ਯੋऽਯਮਵਿਕਾਰ੍ਯੋऽਯਮੁਚ੍ਯਤੇ। ਤਸ੍ਮਾਦੇਵਂ ਵਿਦਿਤ੍ਵੈਨਂ ਨਾਨੁਸ਼ੋਚਿਤੁਮਰ੍ਹਸਿ॥

avyakto ’yam achintyo ’yam avikāryo ’yam uchyate tasmādevaṁ viditvainaṁ nānuśhochitum arhasi

अर्थयह आत्मा अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकारी कहा जाता है; इसलिए इसको इस प्रकार जानकर तुमको शोक करना उचित नहीं है।।

ਅਥ ਚੈਨਂ ਨਿਤ੍ਯਜਾਤਂ ਨਿਤ੍ਯਂ ਵਾ ਮਨ੍ਯਸੇ ਮृਤਮ੍। ਤਥਾਪਿ ਤ੍ਵਂ ਮਹਾਬਾਹੋ ਨੈਵਂ ਸ਼ੋਚਿਤੁਮਰ੍ਹਸਿ॥

atha chainaṁ nitya-jātaṁ nityaṁ vā manyase mṛitam tathāpi tvaṁ mahā-bāho naivaṁ śhochitum arhasi

अर्थऔर यदि तुम आत्मा को नित्य जन्मने और नित्य मरने वाला मानो तो भी, हे महाबाहो ! इस प्रकार शोक करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।।

ਜਾਤਸ੍ਯ ਹਿ ਧ੍ਰੁਵੋ ਮृਤ੍ਯੁਰ੍ਧ੍ਰੁਵਂ ਜਨ੍ਮ ਮृਤਸ੍ਯ ਚ। ਤਸ੍ਮਾਦਪਰਿਹਾਰ੍ਯੇऽਰ੍ਥੇ ਤ੍ਵਂ ਸ਼ੋਚਿਤੁਮਰ੍ਹਸਿ॥

jātasya hi dhruvo mṛityur dhruvaṁ janma mṛitasya cha tasmād aparihārye ’rthe na tvaṁ śhochitum arhasi

अर्थजन्मने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है; इसलिए जो अटल है अपरिहार्य - है उसके विषय में तुमको शोक नहीं करना चाहिये।।

ਅਵ੍ਯਕ੍ਤਾਦੀਨਿ ਭੂਤਾਨਿ ਵ੍ਯਕ੍ਤਮਧ੍ਯਾਨਿ ਭਾਰਤ। ਅਵ੍ਯਕ੍ਤਨਿਧਨਾਨ੍ਯੇਵ ਤਤ੍ਰ ਕਾ ਪਰਿਦੇਵਨਾ॥

avyaktādīni bhūtāni vyakta-madhyāni bhārata avyakta-nidhanānyeva tatra kā paridevanā

अर्थहे भारत ! समस्त प्राणी जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद अव्यक्त अवस्था में रहते हैं और बीच में व्यक्त होते हैं। फिर उसमें चिन्ता या शोक की क्या बात है ?

ਆਸ਼੍ਚਰ੍ਯਵਤ੍ਪਸ਼੍ਯਤਿ ਕਸ਼੍ਚਿਦੇਨ ਮਾਸ਼੍ਚਰ੍ਯਵਦ੍ਵਦਤਿ ਤਥੈਵ ਚਾਨ੍ਯਃ। ਆਸ਼੍ਚਰ੍ਯਵਚ੍ਚੈਨਮਨ੍ਯਃ ਸ਼੍ਰृਣੋਤਿ ਸ਼੍ਰੁਤ੍ਵਾਪ੍ਯੇਨਂ ਵੇਦ ਚੈਵ ਕਸ਼੍ਚਿਤ੍॥

āśhcharya-vat paśhyati kaśhchid enan āśhcharya-vad vadati tathaiva chānyaḥ āśhcharya-vach chainam anyaḥ śhṛiṇoti śhrutvāpyenaṁ veda na chaiva kaśhchit

अर्थकोई इसे आश्चर्य के समान देखता है; कोई इसके विषय में आश्चर्य के समान कहता है; और कोई अन्य पुरुष इसे आश्चर्य के समान सुनता है; और फिर कोई सुनकर भी नहीं जानता।।

ਦੇਹੀ ਨਿਤ੍ਯਮਵਧ੍ਯੋऽਯਂ ਦੇਹੇ ਸਰ੍ਵਸ੍ਯ ਭਾਰਤ। ਤਸ੍ਮਾਤ੍ਸਰ੍ਵਾਣਿ ਭੂਤਾਨਿ ਤ੍ਵਂ ਸ਼ੋਚਿਤੁਮਰ੍ਹਸਿ॥

dehī nityam avadhyo ’yaṁ dehe sarvasya bhārata tasmāt sarvāṇi bhūtāni na tvaṁ śhochitum arhasi

अर्थहे भारत ! यह देही आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य है, इसलिए समस्त प्राणियों के लिए तुम्हें शोक करना उचित नहीं।।

ਸ੍ਵਧਰ੍ਮਮਪਿ ਚਾਵੇਕ੍ष੍ਯ ਵਿਕਮ੍ਪਿਤੁਮਰ੍ਹਸਿ। ਧਰ੍ਮ੍ਯਾਦ੍ਧਿ ਯੁਦ੍ਧਾਛ੍ਰੇਯੋऽਨ੍ਯਤ੍ਕ੍षਤ੍ਰਿਯਸ੍ਯ ਵਿਦ੍ਯਤੇ॥

swa-dharmam api chāvekṣhya na vikampitum arhasi dharmyāddhi yuddhāch chhreyo ’nyat kṣhatriyasya na vidyate

अर्थऔर स्वधर्म को भी देखकर तुमको विचलित होना उचित नहीं है, क्योंकि धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारक कर्त्तव्य क्षत्रिय के लिये नहीं है।।

ਯਦृਚ੍ਛਯਾ ਚੋਪਪਨ੍ਨਂ ਸ੍ਵਰ੍ਗਦ੍ਵਾਰਮਪਾਵृਤਮ੍। ਸੁਖਿਨਃ ਕ੍षਤ੍ਰਿਯਾਃ ਪਾਰ੍ਥ ਲਭਨ੍ਤੇ ਯੁਦ੍ਧਮੀਦृਸ਼ਮ੍॥

yadṛichchhayā chopapannaṁ swarga-dvāram apāvṛitam sukhinaḥ kṣhatriyāḥ pārtha labhante yuddham īdṛiśham

अर्थऔर हे पार्थ ! अपने आप प्राप्त हुए और स्वर्ग के लिए खुले हुए द्वाररूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं।।

ਅਥ ਚੈਤ੍ਤ੍ਵਮਿਮਂ ਧਰ੍ਮ੍ਯਂ ਸਂਗ੍ਰਾਮਂ ਕਰਿष੍ਯਸਿ। ਤਤਃ ਸ੍ਵਧਰ੍ਮਂ ਕੀਰ੍ਤਿਂ ਹਿਤ੍ਵਾ ਪਾਪਮਵਾਪ੍ਸ੍ਯਸਿ॥

atha chet tvam imaṁ dharmyaṁ saṅgrāmaṁ na kariṣhyasi tataḥ sva-dharmaṁ kīrtiṁ cha hitvā pāpam avāpsyasi

अर्थऔर यदि तुम इस धर्मयुद्ध को स्वीकार नहीं करोगे, तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त करोगे।।

ਅਕੀਰ੍ਤਿਂ ਚਾਪਿ ਭੂਤਾਨਿ ਕਥਯਿष੍ਯਨ੍ਤਿ ਤੇऽਵ੍ਯਯਾਮ੍। ਸਂਭਾਵਿਤਸ੍ਯ ਚਾਕੀਰ੍ਤਿਰ੍ਮਰਣਾਦਤਿਰਿਚ੍ਯਤੇ॥

akīrtiṁ chāpi bhūtāni kathayiṣhyanti te ’vyayām sambhāvitasya chākīrtir maraṇād atirichyate

अर्थऔर सब लोग तुम्हारी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति को भी कहते रहेंगे; और सम्मानित पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी अधिक होती है।।

ਭਯਾਦ੍ਰਣਾਦੁਪਰਤਂ ਮਂਸ੍ਯਨ੍ਤੇ ਤ੍ਵਾਂ ਮਹਾਰਥਾਃ। ਯੇषਾਂ ਤ੍ਵਂ ਬਹੁਮਤੋ ਭੂਤ੍ਵਾ ਯਾਸ੍ਯਸਿ ਲਾਘਵਮ੍॥

bhayād raṇād uparataṁ mansyante tvāṁ mahā-rathāḥ yeṣhāṁ cha tvaṁ bahu-mato bhūtvā yāsyasi lāghavam

अर्थऔर जिनके लिए तुम बहुत माननीय हो उनके लिए अब तुम तुच्छता को प्राप्त होओगे, वे महारथी लोग तुम्हें भय के कारण युद्ध से निवृत्त हुआ मानेंगे।।

ਅਵਾਚ੍ਯਵਾਦਾਂਸ਼੍ਚ ਬਹੂਨ੍ ਵਦਿष੍ਯਨ੍ਤਿ ਤਵਾਹਿਤਾਃ। ਨਿਨ੍ਦਨ੍ਤਸ੍ਤਵ ਸਾਮਰ੍ਥ੍ਯਂ ਤਤੋ ਦੁਃਖਤਰਂ ਨੁ ਕਿਮ੍॥

avāchya-vādānśh cha bahūn vadiṣhyanti tavāhitāḥ nindantastava sāmarthyaṁ tato duḥkhataraṁ nu kim

अर्थतुम्हारे शत्रु तुम्हारे सार्मथ्य की निन्दा करते हुए बहुत से अकथनीय वचनों को कहेंगे, फिर उससे अधिक दु:ख क्या होगा ?

ਹਤੋ ਵਾ ਪ੍ਰਾਪ੍ਸ੍ਯਸਿ ਸ੍ਵਰ੍ਗਂ ਜਿਤ੍ਵਾ ਵਾ ਭੋਕ੍ष੍ਯਸੇ ਮਹੀਮ੍। ਤਸ੍ਮਾਦੁਤ੍ਤਿष੍ਠ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਯੁਦ੍ਧਾਯ ਕृਤਨਿਸ਼੍ਚਯਃ॥

hato vā prāpsyasi swargaṁ jitvā vā bhokṣhyase mahīm tasmād uttiṣhṭha kaunteya yuddhāya kṛita-niśhchayaḥ

अर्थयुद्ध में मरकर तुम स्वर्ग प्राप्त करोगे या जीतकर पृथ्वी को भोगोगे; इसलिय, हे कौन्तेय ! युद्ध का निश्चय कर तुम खड़े हो जाओ।।

ਸੁਖਦੁਃਖੇ ਸਮੇ ਕृਤ੍ਵਾ ਲਾਭਾਲਾਭੌ ਜਯਾਜਯੌ। ਤਤੋ ਯੁਦ੍ਧਾਯ ਯੁਜ੍ਯਸ੍ਵ ਨੈਵਂ ਪਾਪਮਵਾਪ੍ਸ੍ਯਸਿ॥

sukha-duḥkhe same kṛitvā lābhālābhau jayājayau tato yuddhāya yujyasva naivaṁ pāpam avāpsyasi

अर्थसुख-दु:ख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान करके युद्ध के लिये तैयार हो जाओ; इस प्रकार तुमको पाप नहीं होगा।।

ਏषਾ ਤੇऽਭਿਹਿਤਾ ਸਾਂਖ੍ਯੇ ਬੁਦ੍ਧਿਰ੍ਯੋਗੇ ਤ੍ਵਿਮਾਂ ਸ਼੍ਰृਣੁ। ਬੁਦ੍ਧ੍ਯਾਯੁਕ੍ਤੋ ਯਯਾ ਪਾਰ੍ਥ ਕਰ੍ਮਬਨ੍ਧਂ ਪ੍ਰਹਾਸ੍ਯਸਿ॥

eṣhā te ’bhihitā sānkhye buddhir yoge tvimāṁ śhṛiṇu buddhyā yukto yayā pārtha karma-bandhaṁ prahāsyasi

अर्थहे पार्थ ! तुम्हें सांख्य विषयक ज्ञान कहा गया और अब इस (कर्म) योग से सम्बन्धित ज्ञान को सुनो जिस ज्ञान से युक्त होकर तुम कर्मबन्ध का नाश कर सकोगे।।

ਨੇਹਾਭਿਕ੍ਰਮਨਾਸ਼ੋऽਸ੍ਤਿ ਪ੍ਰਤ੍ਯਵਾਯੋ ਵਿਦ੍ਯਤੇ। ਸ੍ਵਲ੍ਪਮਪ੍ਯਸ੍ਯ ਧਰ੍ਮਸ੍ਯ ਤ੍ਰਾਯਤੇ ਮਹਤੋ ਭਯਾਤ੍॥

nehābhikrama-nāśho ’sti pratyavāyo na vidyate svalpam apyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt

अर्थइसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है। इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महान् भय से रक्षण करता है।।

ਵ੍ਯਵਸਾਯਾਤ੍ਮਿਕਾ ਬੁਦ੍ਧਿਰੇਕੇਹ ਕੁਰੁਨਨ੍ਦਨ। ਬਹੁਸ਼ਾਖਾ ਹ੍ਯਨਨ੍ਤਾਸ਼੍ਚ ਬੁਦ੍ਧਯੋऽਵ੍ਯਵਸਾਯਿਨਾਮ੍॥

vyavasāyātmikā buddhir ekeha kuru-nandana bahu-śhākhā hyanantāśh cha buddhayo ’vyavasāyinām

अर्थहे कुरुनन्दन ! इस (विषय) में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही है, अज्ञानी पुरुषों की बुद्धियां (संकल्प) बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं।।

ਯਾਮਿਮਾਂ ਪੁष੍ਪਿਤਾਂ ਵਾਚਂ ਪ੍ਰਵਦਨ੍ਤ੍ਯਵਿਪਸ਼੍ਚਿਤਃ। ਵੇਦਵਾਦਰਤਾਃ ਪਾਰ੍ਥ ਨਾਨ੍ਯਦਸ੍ਤੀਤਿ ਵਾਦਿਨਃ॥

yāmimāṁ puṣhpitāṁ vāchaṁ pravadanty-avipaśhchitaḥ veda-vāda-ratāḥ pārtha nānyad astīti vādinaḥ kāmātmānaḥ swarga-parā janma-karma-phala-pradām kriyā-viśheṣha-bahulāṁ bhogaiśhwarya-gatiṁ prati

अर्थहे पार्थ अविवेकी पुरुष वेदवाद में रमते हुये जो यह पुष्पिता (दिखावटी शोभा की) वाणी बोलते हैं? इससे (स्वर्ग से) बढ़कर और कुछ नहीं है।।।

ਕਾਮਾਤ੍ਮਾਨਃ ਸ੍ਵਰ੍ਗਪਰਾ ਜਨ੍ਮਕਰ੍ਮਫਲਪ੍ਰਦਾਮ੍। ਕ੍ਰਿਯਾਵਿਸ਼ੇषਬਹੁਲਾਂ ਭੋਗੈਸ਼੍ਵਰ੍ਯਗਤਿਂ ਪ੍ਰਤਿ॥

kāmātmānaḥ svarga-parā janma-karma-phala-pradām kriyā-viśeṣa-bahulāṁ bhogaiśvarya-gatiṁ prati

अर्थकामनाओं से युक्त? स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानने वाले लोग भोग और ऐश्वर्य को प्राप्त कराने वाली अनेक क्रियाओं को बताते हैं जो (वास्तव में) जन्मरूप कर्मफल को देने वाली होती हैं।।

ਭੋਗੈਸ਼੍ਵਰ੍ਯਪ੍ਰਸਕ੍ਤਾਨਾਂ ਤਯਾਪਹृਤਚੇਤਸਾਮ੍। ਵ੍ਯਵਸਾਯਾਤ੍ਮਿਕਾ ਬੁਦ੍ਧਿਃ ਸਮਾਧੌ ਵਿਧੀਯਤੇ॥

bhogaiśwvarya-prasaktānāṁ tayāpahṛita-chetasām vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate

अर्थउससे जिनका चित्त हर लिया गया है ऐसे भोग और एश्र्वर्य‌ मॆ आसक्ति रखने वाले पुरुषों के अन्तकरण मे निश्चयात्मक् बुद्धि नही हॊती अर्थात वे ध्यान का अभ्यास करने योग्य‌ नही होते।

ਤ੍ਰੈਗੁਣ੍ਯਵਿषਯਾ ਵੇਦਾ ਨਿਸ੍ਤ੍ਰੈਗੁਣ੍ਯੋ ਭਵਾਰ੍ਜੁਨ। ਨਿਰ੍ਦ੍ਵਨ੍ਦ੍ਵੋ ਨਿਤ੍ਯਸਤ੍ਤ੍ਵਸ੍ਥੋ ਨਿਰ੍ਯੋਗਕ੍षੇਮ ਆਤ੍ਮਵਾਨ੍॥

trai-guṇya-viṣhayā vedā nistrai-guṇyo bhavārjuna nirdvandvo nitya-sattva-stho niryoga-kṣhema ātmavān

अर्थहे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है तुम त्रिगुणातीत? निर्द्वन्द्व? नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित? योगक्षेम से रहित और आत्मवान् बनो।।

ਯਾਵਾਨਰ੍ਥ ਉਦਪਾਨੇ ਸਰ੍ਵਤਃ ਸਂਪ੍ਲੁਤੋਦਕੇ। ਤਾਵਾਨ੍ਸਰ੍ਵੇषੁ ਵੇਦੇषੁ ਬ੍ਰਾਹ੍ਮਣਸ੍ਯ ਵਿਜਾਨਤਃ॥

yāvān artha udapāne sarvataḥ samplutodake tāvānsarveṣhu vedeṣhu brāhmaṇasya vijānataḥ

अर्थसब ओर से परिपूर्ण जलराशि के होने पर मनुष्य का छोटे जलाशय में जितना प्रयोजन रहता है? आत्मज्ञानी ब्राह्मण का सभी वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है।।

ਕਰ੍ਮਣ੍ਯੇਵਾਧਿਕਾਰਸ੍ਤੇ ਮਾ ਫਲੇषੁ ਕਦਾਚਨ। ਮਾ ਕਰ੍ਮਫਲਹੇਤੁਰ੍ਭੂਰ੍ਮਾ ਤੇ ਸਙ੍ਗੋऽਸ੍ਤ੍ਵਕਰ੍ਮਣਿ॥

karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo ’stvakarmaṇi

अर्थकर्म करने मात्र में तुम्हारा अधिकार है? फल में कभी नहीं। तुम कर्मफल के हेतु वाले मत होना और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।।

ਯੋਗਸ੍ਥਃ ਕੁਰੁ ਕਰ੍ਮਾਣਿ ਸਙ੍ਗਂ ਤ੍ਯਕ੍ਤ੍ਵਾ ਧਨਞ੍ਜਯ। ਸਿਦ੍ਧ੍ਯਸਿਦ੍ਧ੍ਯੋਃ ਸਮੋ ਭੂਤ੍ਵਾ ਸਮਤ੍ਵਂ ਯੋਗ ਉਚ੍ਯਤੇ॥

yoga-sthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya siddhy-asiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga uchyate

अर्थहे धनंजय आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो। यह समभाव ही योग कहलाता है।।

ਦੂਰੇਣ ਹ੍ਯਵਰਂ ਕਰ੍ਮ ਬੁਦ੍ਧਿਯੋਗਾਦ੍ਧਨਞ੍ਜਯ। ਬੁਦ੍ਧੌ ਸ਼ਰਣਮਨ੍ਵਿਚ੍ਛ ਕृਪਣਾਃ ਫਲਹੇਤਵਃ॥

dūreṇa hy-avaraṁ karma buddhi-yogād dhanañjaya buddhau śharaṇam anvichchha kṛipaṇāḥ phala-hetavaḥ

अर्थइस बुद्धियोग की तुलना में(सकाम) कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं? इसलिये हे धनंजय तुम बद्धि की शरण लो फल की इच्छा करनेवाले कृपण (दीन) हैं।।

ਬੁਦ੍ਧਿਯੁਕ੍ਤੋ ਜਹਾਤੀਹ ਉਭੇ ਸੁਕृਤਦੁष੍ਕृਤੇ। ਤਸ੍ਮਾਦ੍ਯੋਗਾਯ ਯੁਜ੍ਯਸ੍ਵ ਯੋਗਃ ਕਰ੍ਮਸੁ ਕੌਸ਼ਲਮ੍॥

buddhi-yukto jahātīha ubhe sukṛita-duṣhkṛite tasmād yogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśhalam

अर्थसमत्वबुद्धि युक्त पुरुष यहां (इस जीवन में) पुण्य और पाप इन दोनों कर्मों को त्याग देता है? इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ। कर्मों में कुशलता योग है।।

ਕਰ੍ਮਜਂ ਬੁਦ੍ਧਿਯੁਕ੍ਤਾ ਹਿ ਫਲਂ ਤ੍ਯਕ੍ਤ੍ਵਾ ਮਨੀषਿਣਃ। ਜਨ੍ਮਬਨ੍ਧਵਿਨਿਰ੍ਮੁਕ੍ਤਾਃ ਪਦਂ ਗਚ੍ਛਨ੍ਤ੍ਯਨਾਮਯਮ੍॥

karma-jaṁ buddhi-yuktā hi phalaṁ tyaktvā manīṣhiṇaḥ janma-bandha-vinirmuktāḥ padaṁ gachchhanty-anāmayam

अर्थबुद्धियोग युक्त मनीषी लोग कर्मजन्य फलों को त्यागकर जन्मरूप बन्धन से मुक्त हुये अनामय अर्थात् निर्दोष पद को प्राप्त होते हैं।।

ਯਦਾ ਤੇ ਮੋਹਕਲਿਲਂ ਬੁਦ੍ਧਿਰ੍ਵ੍ਯਤਿਤਰਿष੍ਯਤਿ। ਤਦਾ ਗਨ੍ਤਾਸਿ ਨਿਰ੍ਵੇਦਂ ਸ਼੍ਰੋਤਵ੍ਯਸ੍ਯ ਸ਼੍ਰੁਤਸ੍ਯ ਚ॥

yadā te moha-kalilaṁ buddhir vyatitariṣhyati tadā gantāsi nirvedaṁ śhrotavyasya śhrutasya cha

अर्थजब तुम्हारी बुद्धि मोहरूप दलदल (कलिल) को तर जायेगी तब तुम उन सब वस्तुओं से निर्वेद (वैराग्य) को प्राप्त हो जाओगे? जो सुनने योग्य और सुनी हुई हैं।।

ਸ਼੍ਰੁਤਿਵਿਪ੍ਰਤਿਪਨ੍ਨਾ ਤੇ ਯਦਾ ਸ੍ਥਾਸ੍ਯਤਿ ਨਿਸ਼੍ਚਲਾ। ਸਮਾਧਾਵਚਲਾ ਬੁਦ੍ਧਿਸ੍ਤਦਾ ਯੋਗਮਵਾਪ੍ਸ੍ਯਸਿ॥

śhruti-vipratipannā te yadā sthāsyati niśhchalā samādhāv-achalā buddhis tadā yogam avāpsyasi

अर्थजब अनेक प्रकार के विषयों को सुनने से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि आत्मस्वरूप में अचल और स्थिर हो जायेगी तब तुम (परमार्थ) योग को प्राप्त करोगे।।

ਅਰ੍ਜੁਨ ਉਵਾਚ ਸ੍ਥਿਤਪ੍ਰਜ੍ਞਸ੍ਯ ਕਾ ਭਾषਾ ਸਮਾਧਿਸ੍ਥਸ੍ਯ ਕੇਸ਼ਵ। ਸ੍ਥਿਤਧੀਃ ਕਿਂ ਪ੍ਰਭਾषੇਤ ਕਿਮਾਸੀਤ ਵ੍ਰਜੇਤ ਕਿਮ੍॥

arjuna uvācha sthita-prajñasya kā bhāṣhā samādhi-sthasya keśhava sthita-dhīḥ kiṁ prabhāṣheta kim āsīta vrajeta kim

अर्थअर्जुन ने कहा -- हे केशव समाधि में स्थित स्थिर बुद्धि वाले पुरुष का क्या लक्षण है स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है कैसे बैठता है कैसे चलता है

ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚ ਪ੍ਰਜਹਾਤਿ ਯਦਾ ਕਾਮਾਨ੍ ਸਰ੍ਵਾਨ੍ ਪਾਰ੍ਥ ਮਨੋਗਤਾਨ੍। ਆਤ੍ਮਨ੍ਯੇਵਾਤ੍ਮਨਾ ਤੁष੍ਟਃ ਸ੍ਥਿਤਪ੍ਰਜ੍ਞਸ੍ਤਦੋਚ੍ਯਤੇ॥

śhrī bhagavān uvācha prajahāti yadā kāmān sarvān pārtha mano-gatān ātmany-evātmanā tuṣhṭaḥ sthita-prajñas tadochyate

अर्थश्री भगवान् ने कहा -- हे पार्थ? जिस समय पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है? उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।

ਦੁਃਖੇष੍ਵਨੁਦ੍ਵਿਗ੍ਨਮਨਾਃ ਸੁਖੇषੁ ਵਿਗਤਸ੍ਪृਹਃ। ਵੀਤਰਾਗਭਯਕ੍ਰੋਧਃ ਸ੍ਥਿਤਧੀਰ੍ਮੁਨਿਰੁਚ੍ਯਤੇ॥

duḥkheṣhv-anudvigna-manāḥ sukheṣhu vigata-spṛihaḥ vīta-rāga-bhaya-krodhaḥ sthita-dhīr munir uchyate

अर्थदुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है? जिसके मन से राग? भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं? वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।

ਯਃ ਸਰ੍ਵਤ੍ਰਾਨਭਿਸ੍ਨੇਹਸ੍ਤਤ੍ਤਤ੍ਪ੍ਰਾਪ੍ਯ ਸ਼ੁਭਾਸ਼ੁਭਮ੍। ਨਾਭਿਨਨ੍ਦਤਿ ਦ੍ਵੇष੍ਟਿ ਤਸ੍ਯ ਪ੍ਰਜ੍ਞਾ ਪ੍ਰਤਿष੍ਠਿਤਾ॥

yaḥ sarvatrānabhisnehas tat tat prāpya śhubhāśhubham nābhinandati na dveṣhṭi tasya prajñā pratiṣhṭhitā

अर्थजो सर्वत्र अति स्नेह से रहित हुआ उन शुभ तथा अशुभ वस्तुओं को प्राप्त कर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है? उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित (स्थिर) है।।

ਯਦਾ ਸਂਹਰਤੇ ਚਾਯਂ ਕੂਰ੍ਮੋऽਙ੍ਗਾਨੀਵ ਸਰ੍ਵਸ਼ਃ। ਇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਣੀਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਰ੍ਥੇਭ੍ਯਸ੍ਤਸ੍ਯ ਪ੍ਰਜ੍ਞਾ ਪ੍ਰਤਿष੍ਠਿਤਾ॥

yadā sanharate chāyaṁ kūrmo ’ṅgānīva sarvaśhaḥ indriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣhṭhitā

अर्थकछुवा अपने अंगों को जैसे समेट लेता है वैसे ही यह पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से परावृत्त कर लेता है? तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।।

ਵਿषਯਾ ਵਿਨਿਵਰ੍ਤਨ੍ਤੇ ਨਿਰਾਹਾਰਸ੍ਯ ਦੇਹਿਨਃ। ਰਸਵਰ੍ਜਂ ਰਸੋऽਪ੍ਯਸ੍ਯ ਪਰਂ ਦृष੍ਟ੍ਵਾ ਨਿਵਰ੍ਤਤੇ॥

viṣhayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ rasa-varjaṁ raso ’pyasya paraṁ dṛiṣhṭvā nivartate

अर्थनिराहारी देही पुरुष से विषय तो निवृत्त (दूर) हो जाते हैं? परन्तु (उनके प्रति) राग नहीं परम तत्व को देखने पर इस (पुरुष) का राग भी निवृत्त हो जाता है।।

ਯਤਤੋ ਹ੍ਯਪਿ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਪੁਰੁषਸ੍ਯ ਵਿਪਸ਼੍ਚਿਤਃ। ਇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਣਿ ਪ੍ਰਮਾਥੀਨਿ ਹਰਨ੍ਤਿ ਪ੍ਰਸਭਂ ਮਨਃ॥

yatato hyapi kaunteya puruṣhasya vipaśhchitaḥ indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṁ manaḥ

अर्थहे कौन्तेय (संयम का) प्रयत्न करते हुए बुद्धिमान (विपश्चित) पुरुष के भी मन को ये इन्द्रियां बलपूर्वक हर लेती हैं।।

ਤਾਨਿ ਸਰ੍ਵਾਣਿ ਸਂਯਮ੍ਯ ਯੁਕ੍ਤ ਆਸੀਤ ਮਤ੍ਪਰਃ। ਵਸ਼ੇ ਹਿ ਯਸ੍ਯੇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਣਿ ਤਸ੍ਯ ਪ੍ਰਜ੍ਞਾ ਪ੍ਰਤਿष੍ਠਿਤਾ॥

tāni sarvāṇi sanyamya yukta āsīta mat-paraḥ vaśhe hi yasyendriyāṇi tasya prajñā pratiṣhṭhitā

अर्थउन सब इन्द्रियों को संयमित कर युक्त और मत्पर होवे। जिस पुरुष की इन्द्रियां वश में होती हैं? उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित होती है।।

ਧ੍ਯਾਯਤੋ ਵਿषਯਾਨ੍ਪੁਂਸਃ ਸਙ੍ਗਸ੍ਤੇषੂਪਜਾਯਤੇ। ਸਙ੍ਗਾਤ੍ ਸਂਜਾਯਤੇ ਕਾਮਃ ਕਾਮਾਤ੍ਕ੍ਰੋਧੋऽਭਿਜਾਯਤੇ॥

dhyāyato viṣhayān puṁsaḥ saṅgas teṣhūpajāyate saṅgāt sañjāyate kāmaḥ kāmāt krodho ’bhijāyate

अर्थविषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उसमें आसक्ति हो जाती है? आसक्ति से इच्छा और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है।।

ਕ੍ਰੋਧਾਦ੍ਭਵਤਿ ਸਂਮੋਹਃ ਸਂਮੋਹਾਤ੍ਸ੍ਮृਤਿਵਿਭ੍ਰਮਃ। ਸ੍ਮृਤਿਭ੍ਰਂਸ਼ਾਦ੍ ਬੁਦ੍ਧਿਨਾਸ਼ੋ ਬੁਦ੍ਧਿਨਾਸ਼ਾਤ੍ਪ੍ਰਣਸ਼੍ਯਤਿ॥

krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati

अर्थक्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति के भ्रमित होने पर बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है।।

ਰਾਗਦ੍ਵੇषਵਿਯੁਕ੍ਤੈਸ੍ਤੁ ਵਿषਯਾਨਿਨ੍ਦ੍ਰਿਯੈਸ਼੍ਚਰਨ੍। ਆਤ੍ਮਵਸ਼੍ਯੈਰ੍ਵਿਧੇਯਾਤ੍ਮਾ ਪ੍ਰਸਾਦਮਧਿਗਚ੍ਛਤਿ॥

rāga-dveṣha-viyuktais tu viṣhayān indriyaiśh charan ātma-vaśhyair-vidheyātmā prasādam adhigachchhati

अर्थआत्मसंयमी (विधेयात्मा) पुरुष रागद्वेष से रहित अपने वश में की हुई (आत्मवश्यै) इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ प्रसन्नता (प्रस्ेााद) प्राप्त करता है।।

ਪ੍ਰਸਾਦੇ ਸਰ੍ਵਦੁਃਖਾਨਾਂ ਹਾਨਿਰਸ੍ਯੋਪਜਾਯਤੇ। ਪ੍ਰਸਨ੍ਨਚੇਤਸੋ ਹ੍ਯਾਸ਼ੁ ਬੁਦ੍ਧਿਃ ਪਰ੍ਯਵਤਿष੍ਠਤੇ॥

prasāde sarva-duḥkhānāṁ hānir asyopajāyate prasanna-chetaso hyāśhu buddhiḥ paryavatiṣhṭhate

अर्थप्रसाद के होने पर सम्पूर्ण दुखों का अन्त हो जाता है और प्रसन्नचित्त पुरुष की बुद्धि ही शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।।

ਨਾਸ੍ਤਿ ਬੁਦ੍ਧਿਰਯੁਕ੍ਤਸ੍ਯ ਚਾਯੁਕ੍ਤਸ੍ਯ ਭਾਵਨਾ। ਚਾਭਾਵਯਤਃ ਸ਼ਾਨ੍ਤਿਰਸ਼ਾਨ੍ਤਸ੍ਯ ਕੁਤਃ ਸੁਖਮ੍॥

nāsti buddhir-ayuktasya na chāyuktasya bhāvanā na chābhāvayataḥ śhāntir aśhāntasya kutaḥ sukham

अर्थ(संयमरहित) अयुक्त पुरुष को (आत्म) ज्ञान नहीं होता और अयुक्त को भावना और ध्यान की क्षमता नहीं होती भावना रहित पुरुष को शान्ति नहीं मिलती अशान्त पुरुष को सुख कहाँ

ਇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਣਾਂ ਹਿ ਚਰਤਾਂ ਯਨ੍ਮਨੋऽਨੁਵਿਧੀਯਤੇ। ਤਦਸ੍ਯ ਹਰਤਿ ਪ੍ਰਜ੍ਞਾਂ ਵਾਯੁਰ੍ਨਾਵਮਿਵਾਮ੍ਭਸਿ॥

indriyāṇāṁ hi charatāṁ yan mano ’nuvidhīyate tadasya harati prajñāṁ vāyur nāvam ivāmbhasi

अर्थजल में वायु जैसे नाव को हर लेता है वैसे ही विषयों में विरचती हुई इन्द्रियों के बीच में जिस इन्द्रिय का अनुकरण मन करता है? वह एक ही इन्द्रिय इसकी प्रज्ञा को हर लेती है।।

ਤਸ੍ਮਾਦ੍ਯਸ੍ਯ ਮਹਾਬਾਹੋ ਨਿਗृਹੀਤਾਨਿ ਸਰ੍ਵਸ਼ਃ। ਇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਣੀਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਰ੍ਥੇਭ੍ਯਸ੍ਤਸ੍ਯ ਪ੍ਰਜ੍ਞਾ ਪ੍ਰਤਿष੍ਠਿਤਾ॥

tasmād yasya mahā-bāho nigṛihītāni sarvaśhaḥ indriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣhṭhitā

अर्थइसलिये? हे महाबाहो जिस पुरुष की इन्द्रियाँ सब प्रकार इन्द्रियों के विषयों के वश में की हुई होती हैं? उसकी बुद्धि स्थिर होती है।।

ਯਾ ਨਿਸ਼ਾ ਸਰ੍ਵਭੂਤਾਨਾਂ ਤਸ੍ਯਾਂ ਜਾਗਰ੍ਤਿ ਸਂਯਮੀ। ਯਸ੍ਯਾਂ ਜਾਗ੍ਰਤਿ ਭੂਤਾਨਿ ਸਾ ਨਿਸ਼ਾ ਪਸ਼੍ਯਤੋ ਮੁਨੇਃ॥

yā niśhā sarva-bhūtānāṁ tasyāṁ jāgarti sanyamī yasyāṁ jāgrati bhūtāni sā niśhā paśhyato muneḥ

अर्थसब प्रणियों के लिए जो रात्रि है? उसमें संयमी पुरुष जागता है और जहाँ सब प्राणी जागते हैं? वह (तत्त्व को) देखने वाले मुनि के लिए रात्रि है।।

ਆਪੂਰ੍ਯਮਾਣਮਚਲਪ੍ਰਤਿष੍ਠਂ ਸਮੁਦ੍ਰਮਾਪਃ ਪ੍ਰਵਿਸ਼ਨ੍ਤਿ ਯਦ੍ਵਤ੍। ਤਦ੍ਵਤ੍ਕਾਮਾ ਯਂ ਪ੍ਰਵਿਸ਼ਨ੍ਤਿ ਸਰ੍ਵੇ ਸ਼ਾਨ੍ਤਿਮਾਪ੍ਨੋਤਿ ਕਾਮਕਾਮੀ॥

āpūryamāṇam achala-pratiṣhṭhaṁ samudram āpaḥ praviśhanti yadvat tadvat kāmā yaṁ praviśhanti sarve sa śhāntim āpnoti na kāma-kāmī

अर्थजैसे सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में (अनेक नदियों के) जल (उसे विचलित किये बिना) समा जाते हैं? वैसे ही जिस पुरुष के प्रति कामनाओं के विषय उसमें (विकार उत्पन्न किये बिना) समा जाते हैं? वह पुरुष शान्ति प्राप्त करता है? न कि भोगों की कामना करने वाला पुरुष।।

ਵਿਹਾਯ ਕਾਮਾਨ੍ਯਃ ਸਰ੍ਵਾਨ੍ਪੁਮਾਂਸ਼੍ਚਰਤਿ ਨਿਃਸ੍ਪृਹਃ। ਨਿਰ੍ਮਮੋ ਨਿਰਹਂਕਾਰਃ ਸ਼ਾਂਤਿਮਧਿਗਚ੍ਛਤਿ॥

vihāya kāmān yaḥ sarvān pumānśh charati niḥspṛihaḥ nirmamo nirahankāraḥ sa śhāntim adhigachchhati

अर्थजो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर स्पृहारहित? ममभाव रहित और निरहंकार हुआ विचरण करता है? वह शान्ति प्राप्त करता है।।

ਏषਾ ਬ੍ਰਾਹ੍ਮੀ ਸ੍ਥਿਤਿਃ ਪਾਰ੍ਥ ਨੈਨਾਂ ਪ੍ਰਾਪ੍ਯ ਵਿਮੁਹ੍ਯਤਿ। ਸ੍ਥਿਤ੍ਵਾऽਸ੍ਯਾਮਨ੍ਤਕਾਲੇऽਪਿ ਬ੍ਰਹ੍ਮਨਿਰ੍ਵਾਣਮृਚ੍ਛਤਿ॥

eṣhā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṁ prāpya vimuhyati sthitvāsyām anta-kāle ’pi brahma-nirvāṇam ṛichchhati

अर्थहे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है।।