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ਭਗਵਦ੍ਗੀਤਾ · ਅਧ੍ਯਾਯ 3 / 18

ਕਰ੍ਮਯੋਗ

Bhagavad Gita Chapter 3 in Punjabi (Gurmukhi)

Karm Yog · निष्काम कर्म · 43 श्लोक

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अध्याय सारांश

भगवद गीता का तीसरा अध्याय कर्मयोग या निःस्वार्थ सेवा का मार्ग है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण जीवन में कर्म के महत्व पर जोर देते हैं। वे बताते हैं कि इस भौतिक संसार में हर मनुष्य का किसी न किसी प्रकार की क्रिया में सम्मिलित होना अनिवार्य है। इसके अलावा, वह उन कार्यों के बारे में बताते हैं जो मनुष्य को बांधते हैं अथवा वे जो मनुष्य को मुक्ति दिलाते हैं। वे मनुष्य जो अपने कर्तव्यों को भगवन की ख़ुशी के लिए एवं बिना फल की अपेक्षा किये हुए निरंतर करते रहते हैं, वे अंत में मुक्ति प्राप्त करते हैं।

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ਅਰ੍ਜੁਨ ਉਵਾਚ ਜ੍ਯਾਯਸੀ ਚੇਤ੍ਕਰ੍ਮਣਸ੍ਤੇ ਮਤਾ ਬੁਦ੍ਧਿਰ੍ਜਨਾਰ੍ਦਨ। ਤਤ੍ਕਿਂ ਕਰ੍ਮਣਿ ਘੋਰੇ ਮਾਂ ਨਿਯੋਜਯਸਿ ਕੇਸ਼ਵ॥

arjuna uvācha jyāyasī chet karmaṇas te matā buddhir janārdana tat kiṁ karmaṇi ghore māṁ niyojayasi keśhava

अर्थहे जनार्दन यदि आपको यह मान्य है कि कर्म से ज्ञान श्रेष्ठ है तो फिर हे केशव आप मुझे इस भयंकर कर्म में क्यों प्रवृत्त करते हैं

ਵ੍ਯਾਮਿਸ਼੍ਰੇਣੇਵ ਵਾਕ੍ਯੇਨ ਬੁਦ੍ਧਿਂ ਮੋਹਯਸੀਵ ਮੇ। ਤਦੇਕਂ ਵਦ ਨਿਸ਼੍ਿਚਤ੍ਯ ਯੇਨ ਸ਼੍ਰੇਯੋऽਹਮਾਪ੍ਨੁਯਾਮ੍॥

vyāmiśhreṇeva vākyena buddhiṁ mohayasīva me tad ekaṁ vada niśhchitya yena śhreyo ’ham āpnuyām

अर्थआप इस मिश्रित वाक्य से मेरी बुद्धि को मोहितसा करते हैं अत आप उस एक (मार्ग) को निश्चित रूप से कहिये जिससे मैं परम श्रेय को प्राप्त कर सकूँ।।

ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚ ਲੋਕੇऽਸ੍ਮਿਨ੍ਦ੍ਵਿਵਿਧਾ ਨਿष੍ਠਾ ਪੁਰਾ ਪ੍ਰੋਕ੍ਤਾ ਮਯਾਨਘ। ਜ੍ਞਾਨਯੋਗੇਨ ਸਾਂਖ੍ਯਾਨਾਂ ਕਰ੍ਮਯੋਗੇਨ ਯੋਗਿਨਾਮ੍॥

śhrī bhagavān uvācha loke’smin dvi-vidhā niṣhṭhā purā proktā mayānagha jñāna-yogena sāṅkhyānāṁ karma-yogena yoginām

अर्थश्री भगवान् ने कहा हे निष्पाप (अनघ) अर्जुन इस श्लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है ज्ञानियों की (सांख्यानां) ज्ञानयोग से और योगियों की कर्मयोग से।।

ਕਰ੍ਮਣਾਮਨਾਰਮ੍ਭਾਨ੍ਨੈष੍ਕਰ੍ਮ੍ਯਂ ਪੁਰੁषੋऽਸ਼੍ਨੁਤੇ। ਸਂਨ੍ਯਸਨਾਦੇਵ ਸਿਦ੍ਧਿਂ ਸਮਧਿਗਚ੍ਛਤਿ॥

na karmaṇām anārambhān naiṣhkarmyaṁ puruṣho ’śhnute na cha sannyasanād eva siddhiṁ samadhigachchhati

अर्थकर्मों के न करने से मनुष्य नैर्ष्कम्य को प्राप्त नहीं होता और न कर्मों के संन्यास से ही वह सिद्धि (पूर्णत्व) प्राप्त करता है।।

ਹਿ ਕਸ਼੍ਿਚਤ੍ਕ੍षਣਮਪਿ ਜਾਤੁ ਤਿष੍ਠਤ੍ਯਕਰ੍ਮਕृਤ੍। ਕਾਰ੍ਯਤੇ ਹ੍ਯਵਸ਼ਃ ਕਰ੍ਮ ਸਰ੍ਵਃ ਪ੍ਰਕृਤਿਜੈਰ੍ਗੁਣੈਃ॥

na hi kaśhchit kṣhaṇam api jātu tiṣhṭhatyakarma-kṛit kāryate hyavaśhaḥ karma sarvaḥ prakṛiti-jair guṇaiḥ

अर्थकोई भी पुरुष कभी क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुणों के द्वारा अवश हुए सब (पुरुषों) से कर्म करवा लिया जाता है।।

ਕਰ੍ਮੇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਣਿ ਸਂਯਮ੍ਯ ਆਸ੍ਤੇ ਮਨਸਾ ਸ੍ਮਰਨ੍। ਇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਰ੍ਥਾਨ੍ਵਿਮੂਢਾਤ੍ਮਾ ਮਿਥ੍ਯਾਚਾਰਃ ਉਚ੍ਯਤੇ॥

karmendriyāṇi sanyamya ya āste manasā smaran indriyārthān vimūḍhātmā mithyāchāraḥ sa uchyate

अर्थजो मूढ बुद्धि पुरुष कर्मेन्द्रियों का निग्रह कर इन्द्रियों के भोगों का मन से स्मरण (चिन्तन) करता रहता है वह मिथ्याचारी (दम्भी) कहा जाता है।।

ਯਸ੍ਤ੍ਵਿਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਣਿ ਮਨਸਾ ਨਿਯਮ੍ਯਾਰਭਤੇऽਰ੍ਜੁਨ। ਕਰ੍ਮੇਨ੍ਦ੍ਰਿਯੈਃ ਕਰ੍ਮਯੋਗਮਸਕ੍ਤਃ ਵਿਸ਼ਿष੍ਯਤੇ॥

yas tvindriyāṇi manasā niyamyārabhate ’rjuna karmendriyaiḥ karma-yogam asaktaḥ sa viśhiṣhyate

अर्थपरन्तु हे अर्जुन जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ कर्मेंन्द्रियों से कर्मयोग का आचरण करता है वह श्रेष्ठ है।।

ਨਿਯਤਂ ਕੁਰੁ ਕਰ੍ਮ ਤ੍ਵਂ ਕਰ੍ਮ ਜ੍ਯਾਯੋ ਹ੍ਯਕਰ੍ਮਣਃ। ਸ਼ਰੀਰਯਾਤ੍ਰਾਪਿ ਤੇ ਪ੍ਰਸਿਦ੍ਧ੍ਯੇਦਕਰ੍ਮਣਃ॥

niyataṁ kuru karma tvaṁ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ śharīra-yātrāpi cha te na prasiddhyed akarmaṇaḥ

अर्थतुम (अपने) नियत (कर्तव्य) कर्म करो क्योंकि अकर्म से श्रेष्ठ कर्म है। तुम्हारे अकर्म होने से (तुम्हारा) शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।।

ਯਜ੍ਞਾਰ੍ਥਾਤ੍ਕਰ੍ਮਣੋऽਨ੍ਯਤ੍ਰ ਲੋਕੋऽਯਂ ਕਰ੍ਮਬਨ੍ਧਨਃ। ਤਦਰ੍ਥਂ ਕਰ੍ਮ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਮੁਕ੍ਤਸਂਗਃ ਸਮਾਚਰ॥

yajñārthāt karmaṇo ’nyatra loko ’yaṁ karma-bandhanaḥ tad-arthaṁ karma kaunteya mukta-saṅgaḥ samāchara

अर्थयज्ञ के लिये किये हुए कर्म के अतिरिक्त अन्य कर्म में प्रवृत्त हुआ यह पुरुष कर्मों द्वारा बंधता है इसलिए हे कौन्तेय आसक्ति को त्यागकर यज्ञ के निमित्त ही कर्म का सम्यक् आचरण करो।।

ਸਹਯਜ੍ਞਾਃ ਪ੍ਰਜਾਃ ਸृष੍ਟ੍ਵਾ ਪੁਰੋਵਾਚ ਪ੍ਰਜਾਪਤਿਃ। ਅਨੇਨ ਪ੍ਰਸਵਿष੍ਯਧ੍ਵਮੇष ਵੋऽਸ੍ਤ੍ਵਿष੍ਟਕਾਮਧੁਕ੍॥

saha-yajñāḥ prajāḥ sṛiṣhṭvā purovācha prajāpatiḥ anena prasaviṣhyadhvam eṣha vo ’stviṣhṭa-kāma-dhuk

अर्थप्रजापति (सृष्टिकर्त्ता) ने (सृष्टि के) आदि में यज्ञ सहित प्रजा का निर्माण कर कहा इस यज्ञ द्वारा तुम वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ तुम्हारे लिये इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला (इष्टकामधुक्) होवे।।

ਦੇਵਾਨ੍ਭਾਵਯਤਾਨੇਨ ਤੇ ਦੇਵਾ ਭਾਵਯਨ੍ਤੁ ਵਃ। ਪਰਸ੍ਪਰਂ ਭਾਵਯਨ੍ਤਃ ਸ਼੍ਰੇਯਃ ਪਰਮਵਾਪ੍ਸ੍ਯਥ॥

devān bhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ parasparaṁ bhāvayantaḥ śhreyaḥ param avāpsyatha

अर्थतुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो और वे देवतागण तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार परस्पर उन्नति करते हुये परम श्रेय को तुम प्राप्त होगे।।

ਇष੍ਟਾਨ੍ਭੋਗਾਨ੍ਹਿ ਵੋ ਦੇਵਾ ਦਾਸ੍ਯਨ੍ਤੇ ਯਜ੍ਞਭਾਵਿਤਾਃ। ਤੈਰ੍ਦਤ੍ਤਾਨਪ੍ਰਦਾਯੈਭ੍ਯੋ ਯੋ ਭੁਙ੍ਕ੍ਤੇ ਸ੍ਤੇਨ ਏਵ ਸਃ॥

iṣhṭān bhogān hi vo devā dāsyante yajña-bhāvitāḥ tair dattān apradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ

अर्थयज्ञ द्वारा पोषित देवतागण तुम्हें इष्ट भोग प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दिये हुये भोगों को जो पुरुष उनको दिये बिना ही भोगता है वह निश्चय ही चोर है।।

ਯਜ੍ਞਸ਼ਿष੍ਟਾਸ਼ਿਨਃ ਸਨ੍ਤੋ ਮੁਚ੍ਯਨ੍ਤੇ ਸਰ੍ਵਕਿਲ੍ਬਿषੈਃ। ਭੁਞ੍ਜਤੇ ਤੇ ਤ੍ਵਘਂ ਪਾਪਾ ਯੇ ਪਚਨ੍ਤ੍ਯਾਤ੍ਮਕਾਰਣਾਤ੍॥

yajña-śhiṣhṭāśhinaḥ santo muchyante sarva-kilbiṣhaiḥ bhuñjate te tvaghaṁ pāpā ye pachantyātma-kāraṇāt

अर्थयज्ञ के अवशिष्ट अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं किन्तु जो लोग केवल स्वयं के लिये ही पकाते हैं वे तो पापों को ही खाते हैं।।

ਅਨ੍ਨਾਦ੍ਭਵਨ੍ਤਿ ਭੂਤਾਨਿ ਪਰ੍ਜਨ੍ਯਾਦਨ੍ਨਸਮ੍ਭਵਃ। ਯਜ੍ਞਾਦ੍ਭਵਤਿ ਪਰ੍ਜਨ੍ਯੋ ਯਜ੍ਞਃ ਕਰ੍ਮਸਮੁਦ੍ਭਵਃ॥

annād bhavanti bhūtāni parjanyād anna-sambhavaḥ yajñād bhavati parjanyo yajñaḥ karma-samudbhavaḥ

अर्थसमस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं अन्न की उत्पत्ति पर्जन्य से। पर्जन्य की उत्पत्ति यज्ञ से और यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होता है।।

ਕਰ੍ਮ ਬ੍ਰਹ੍ਮੋਦ੍ਭਵਂ ਵਿਦ੍ਧਿ ਬ੍ਰਹ੍ਮਾਕ੍षਰਸਮੁਦ੍ਭਵਮ੍। ਤਸ੍ਮਾਤ੍ਸਰ੍ਵਗਤਂ ਬ੍ਰਹ੍ਮ ਨਿਤ੍ਯਂ ਯਜ੍ਞੇ ਪ੍ਰਤਿष੍ਠਿਤਮ੍॥

karma brahmodbhavaṁ viddhi brahmākṣhara-samudbhavam tasmāt sarva-gataṁ brahma nityaṁ yajñe pratiṣhṭhitam

अर्थकर्म की उत्पत्ति ब्रह्माजी से होती है और ब्रह्माजी अक्षर तत्त्व से व्यक्त होते हैं। इसलिये सर्व व्यापी ब्रह्म सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है।।

ਏਵਂ ਪ੍ਰਵਰ੍ਤਿਤਂ ਚਕ੍ਰਂ ਨਾਨੁਵਰ੍ਤਯਤੀਹ ਯਃ। ਅਘਾਯੁਰਿਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਰਾਮੋ ਮੋਘਂ ਪਾਰ੍ਥ ਜੀਵਤਿ॥

evaṁ pravartitaṁ chakraṁ nānuvartayatīha yaḥ aghāyur indriyārāmo moghaṁ pārtha sa jīvati

अर्थजो पुरुष यहाँ इस प्रकार प्रवर्तित हुए चक्र का अनुवर्तन नहीं करता हे पार्थ इंन्द्रियों में रमने वाला वह पाप आयु पुरुष व्यर्थ ही जीता है।।

ਯਸ੍ਤ੍ਵਾਤ੍ਮਰਤਿਰੇਵ ਸ੍ਯਾਦਾਤ੍ਮਤृਪ੍ਤਸ਼੍ਚ ਮਾਨਵਃ। ਆਤ੍ਮਨ੍ਯੇਵ ਸਨ੍ਤੁष੍ਟਸ੍ਤਸ੍ਯ ਕਾਰ੍ਯਂ ਵਿਦ੍ਯਤੇ॥

yas tvātma-ratir eva syād ātma-tṛiptaśh cha mānavaḥ ātmanyeva cha santuṣhṭas tasya kāryaṁ na vidyate

अर्थपरन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमने वाला आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं रहता।।

ਨੈਵ ਤਸ੍ਯ ਕृਤੇਨਾਰ੍ਥੋ ਨਾਕृਤੇਨੇਹ ਕਸ਼੍ਚਨ। ਚਾਸ੍ਯ ਸਰ੍ਵਭੂਤੇषੁ ਕਸ਼੍ਿਚਦਰ੍ਥਵ੍ਯਪਾਸ਼੍ਰਯਃ॥

naiva tasya kṛitenārtho nākṛiteneha kaśhchana na chāsya sarva-bhūteṣhu kaśhchid artha-vyapāśhrayaḥ

अर्थइस जगत् में उस पुरुष का कृत और अकृत से कोई प्रयोजन नहीं है और न वह किसी वस्तु के लिये भूतमात्र पर आश्रित होता है।।

ਤਸ੍ਮਾਦਸਕ੍ਤਃ ਸਤਤਂ ਕਾਰ੍ਯਂ ਕਰ੍ਮ ਸਮਾਚਰ। ਅਸਕ੍ਤੋ ਹ੍ਯਾਚਰਨ੍ਕਰ੍ਮ ਪਰਮਾਪ੍ਨੋਤਿ ਪੂਰੁषਃ॥

tasmād asaktaḥ satataṁ kāryaṁ karma samāchara asakto hyācharan karma param āpnoti pūruṣhaḥ

अर्थइसलिए, तुम अनासक्त होकर सदैव कर्तव्य कर्म का सम्यक् आचरण करो; क्योकि, अनासक्त पुरुष कर्म करता हुआ परमात्मा को प्राप्त होता है।।

ਕਰ੍ਮਣੈਵ ਹਿ ਸਂਸਿਦ੍ਧਿਮਾਸ੍ਥਿਤਾ ਜਨਕਾਦਯਃ। ਲੋਕਸਂਗ੍ਰਹਮੇਵਾਪਿ ਸਂਪਸ਼੍ਯਨ੍ਕਰ੍ਤੁਮਰ੍ਹਸਿ॥

karmaṇaiva hi sansiddhim āsthitā janakādayaḥ loka-saṅgraham evāpi sampaśhyan kartum arhasi

अर्थजनकादि (ज्ञानी जन) भी कर्म द्वारा ही संसिद्धि को प्राप्त हुये लोक संग्रह (लोक रक्षण) को भी देखते हुये; तुम कर्म करने योग्य हो।।

ਯਦ੍ਯਦਾਚਰਤਿ ਸ਼੍ਰੇष੍ਠਸ੍ਤਤ੍ਤਦੇਵੇਤਰੋ ਜਨਃ। ਯਤ੍ਪ੍ਰਮਾਣਂ ਕੁਰੁਤੇ ਲੋਕਸ੍ਤਦਨੁਵਰ੍ਤਤੇ॥

yad yad ācharati śhreṣhṭhas tat tad evetaro janaḥ sa yat pramāṇaṁ kurute lokas tad anuvartate

अर्थश्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही अनुकरण करते हैं; वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है, लोग भी उसका अनुसरण करते हैं।।

ਮੇ ਪਾਰ੍ਥਾਸ੍ਤਿ ਕਰ੍ਤਵ੍ਯਂ ਤ੍ਰਿषੁ ਲੋਕੇषੁ ਕਿਞ੍ਚਨ। ਨਾਨਵਾਪ੍ਤਮਵਾਪ੍ਤਵ੍ਯਂ ਵਰ੍ਤ ਏਵ ਕਰ੍ਮਣਿ॥

na me pārthāsti kartavyaṁ triṣhu lokeṣhu kiñchana nānavāptam avāptavyaṁ varta eva cha karmaṇi

अर्थयद्यपि मुझे त्रैलोक्य में कुछ भी कर्तव्य नहीं हैं तथा किंचित भी प्राप्त होने योग्य (अवाप्तव्यम्) वस्तु अप्राप्त नहीं है, तो भी मैं कर्म में ही बर्तता हूँ।।

ਯਦਿ ਹ੍ਯਹਂ ਵਰ੍ਤੇਯਂ ਜਾਤੁ ਕਰ੍ਮਣ੍ਯਤਨ੍ਦ੍ਰਿਤਃ। ਮਮ ਵਰ੍ਤ੍ਮਾਨੁਵਰ੍ਤਨ੍ਤੇ ਮਨੁष੍ਯਾਃ ਪਾਰ੍ਥ ਸਰ੍ਵਸ਼ਃ॥

yadi hyahaṁ na varteyaṁ jātu karmaṇyatandritaḥ mama vartmānuvartante manuṣhyāḥ pārtha sarvaśhaḥ

अर्थयदि मैं सावधान हुआ (अतन्द्रित:) कदाचित कर्म में न लगा रहूँ तो, हे पार्थ ! सब प्रकार से मनुष्य मेरे मार्ग (र्वत्म) का अनुसरण करेंगे।।

ਉਤ੍ਸੀਦੇਯੁਰਿਮੇ ਲੋਕਾ ਕੁਰ੍ਯਾਂ ਕਰ੍ਮ ਚੇਦਹਮ੍। ਸਙ੍ਕਰਸ੍ਯ ਕਰ੍ਤਾ ਸ੍ਯਾਮੁਪਹਨ੍ਯਾਮਿਮਾਃ ਪ੍ਰਜਾਃ॥

utsīdeyur ime lokā na kuryāṁ karma ched aham sankarasya cha kartā syām upahanyām imāḥ prajāḥ

अर्थयदि मैं कर्म न करूँ, तो ये समस्त लोक नष्ट हो जायेंगे; और मैं वर्णसंकर का कर्ता तथा इस प्रजा का हनन करने वाला होऊँगा।।

ਸਕ੍ਤਾਃ ਕਰ੍ਮਣ੍ਯਵਿਦ੍ਵਾਂਸੋ ਯਥਾ ਕੁਰ੍ਵਨ੍ਤਿ ਭਾਰਤ। ਕੁਰ੍ਯਾਦ੍ਵਿਦ੍ਵਾਂਸ੍ਤਥਾਸਕ੍ਤਸ਼੍ਿਚਕੀਰ੍षੁਰ੍ਲੋਕਸਂਗ੍ਰਹਮ੍॥

saktāḥ karmaṇyavidvānso yathā kurvanti bhārata kuryād vidvāns tathāsaktaśh chikīrṣhur loka-saṅgraham

अर्थहे भारत ! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जैसे कर्म करते हैं वैसे ही विद्वान् पुरुष अनासक्त होकर, लोकसंग्रह (लोक कल्याण) की इच्छा से कर्म करे।।

ਬੁਦ੍ਧਿਭੇਦਂ ਜਨਯੇਦਜ੍ਞਾਨਾਂ ਕਰ੍ਮਸਙ੍ਗਿਨਾਮ੍। ਜੋषਯੇਤ੍ਸਰ੍ਵਕਰ੍ਮਾਣਿ ਵਿਦ੍ਵਾਨ੍ ਯੁਕ੍ਤਃ ਸਮਾਚਰਨ੍॥

na buddhi-bhedaṁ janayed ajñānāṁ karma-saṅginām joṣhayet sarva-karmāṇi vidvān yuktaḥ samācharan

अर्थज्ञानी पुरुष, कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे, स्वयं (भक्ति से) युक्त होकर कर्मों का सम्यक् आचरण कर, उनसे भी वैसा ही कराये।।

ਪ੍ਰਕृਤੇਃ ਕ੍ਰਿਯਮਾਣਾਨਿ ਗੁਣੈਃ ਕਰ੍ਮਾਣਿ ਸਰ੍ਵਸ਼ਃ। ਅਹਙ੍ਕਾਰਵਿਮੂਢਾਤ੍ਮਾ ਕਰ੍ਤਾऽਹਮਿਤਿ ਮਨ੍ਯਤੇ॥

prakṛiteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśhaḥ ahankāra-vimūḍhātmā kartāham iti manyate

अर्थसम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं, अहंकार से मोहित हुआ पुरुष, "मैं कर्ता हूँ" ऐसा मान लेता है।।

ਤਤ੍ਤ੍ਵਵਿਤ੍ਤੁ ਮਹਾਬਾਹੋ ਗੁਣਕਰ੍ਮਵਿਭਾਗਯੋਃ। ਗੁਣਾ ਗੁਣੇषੁ ਵਰ੍ਤਨ੍ਤ ਇਤਿ ਮਤ੍ਵਾ ਸਜ੍ਜਤੇ॥

tattva-vit tu mahā-bāho guṇa-karma-vibhāgayoḥ guṇā guṇeṣhu vartanta iti matvā na sajjate

अर्थपरन्तु हे महाबाहो ! गुण और कर्म के विभाग के सत्य (तत्त्व)को जानने वाला ज्ञानी पुरुष यह जानकर कि "गुण गुणों में बर्तते हैं" (कर्म में) आसक्त नहीं होता।।

ਪ੍ਰਕृਤੇਰ੍ਗੁਣਸਮ੍ਮੂਢਾਃ ਸਜ੍ਜਨ੍ਤੇ ਗੁਣਕਰ੍ਮਸੁ। ਤਾਨਕृਤ੍ਸ੍ਨਵਿਦੋ ਮਨ੍ਦਾਨ੍ਕृਤ੍ਸ੍ਨਵਿਨ੍ਨ ਵਿਚਾਲਯੇਤ੍॥

prakṛiter guṇa-sammūḍhāḥ sajjante guṇa-karmasu tān akṛitsna-vido mandān kṛitsna-vin na vichālayet

अर्थप्रकृति के गुणों से मोहित हुए पुरुष गुण और कर्म में आसक्त होते हैं, उन अपूर्ण ज्ञान वाले (अकृत्स्नविद:) मंदबुद्धि पुरुषों को पूर्ण ज्ञान प्राप्त पुरुष विचलित न करे।।

ਮਯਿ ਸਰ੍ਵਾਣਿ ਕਰ੍ਮਾਣਿ ਸਂਨ੍ਯਸ੍ਯਾਧ੍ਯਾਤ੍ਮਚੇਤਸਾ। ਨਿਰਾਸ਼ੀਰ੍ਨਿਰ੍ਮਮੋ ਭੂਤ੍ਵਾ ਯੁਧ੍ਯਸ੍ਵ ਵਿਗਤਜ੍ਵਰਃ॥

mayi sarvāṇi karmāṇi sannyasyādhyātma-chetasā nirāśhīr nirmamo bhūtvā yudhyasva vigata-jvaraḥ

अर्थसम्पूर्ण कर्मों का मुझ में संन्यास करके, आशा और ममता से रहित होकर, संतापरहित हुए तुम युद्ध करो।।

ਯੇ ਮੇ ਮਤਮਿਦਂ ਨਿਤ੍ਯਮਨੁਤਿष੍ਠਨ੍ਤਿ ਮਾਨਵਾਃ। ਸ਼੍ਰਦ੍ਧਾਵਨ੍ਤੋऽਨਸੂਯਨ੍ਤੋ ਮੁਚ੍ਯਨ੍ਤੇ ਤੇऽਪਿ ਕਰ੍ਮਭਿਃ॥

ye me matam idaṁ nityam anutiṣhṭhanti mānavāḥ śhraddhāvanto ’nasūyanto muchyante te ’pi karmabhiḥ

अर्थजो मनुष्य दोष बुद्धि से रहित (अनसूयन्त:) और श्रद्धा से युक्त हुए सदा मेरे इस मत (उपदेश) का अनुष्ठानपूर्वक पालन करते हैं, वे कर्मों से (बन्धन से) मुक्त हो जाते हैं।।

ਯੇ ਤ੍ਵੇਤਦਭ੍ਯਸੂਯਨ੍ਤੋ ਨਾਨੁਤਿष੍ਠਨ੍ਤਿ ਮੇ ਮਤਮ੍। ਸਰ੍ਵਜ੍ਞਾਨਵਿਮੂਢਾਂਸ੍ਤਾਨ੍ਵਿਦ੍ਧਿ ਨष੍ਟਾਨਚੇਤਸਃ॥

ye tvetad abhyasūyanto nānutiṣhṭhanti me matam sarva-jñāna-vimūḍhāns tān viddhi naṣhṭān achetasaḥ

अर्थपरन्तु जो दोष दृष्टि वाले मूढ़ लोग इस मेरे मत का पालन नहीं करते, उन सब ज्ञानों में मोहित चित्तवालों को नष्ट हुये ही तुम समझो।।

ਸਦृਸ਼ਂ ਚੇष੍ਟਤੇ ਸ੍ਵਸ੍ਯਾਃ ਪ੍ਰਕृਤੇਰ੍ਜ੍ਞਾਨਵਾਨਪਿ। ਪ੍ਰਕृਤਿਂ ਯਾਨ੍ਤਿ ਭੂਤਾਨਿ ਨਿਗ੍ਰਹਃ ਕਿਂ ਕਰਿष੍ਯਤਿ॥

sadṛiśhaṁ cheṣhṭate svasyāḥ prakṛiter jñānavān api prakṛitiṁ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṁ kariṣhyati

अर्थज्ञानवान् पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति पर ही जाते हैं, फिर इनमें (किसी का) निग्रह क्या करेगा।।

ਇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਸ੍ਯੇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਸ੍ਯਾਰ੍ਥੇ ਰਾਗਦ੍ਵੇषੌ ਵ੍ਯਵਸ੍ਥਿਤੌ। ਤਯੋਰ੍ਨ ਵਸ਼ਮਾਗਚ੍ਛੇਤ੍ਤੌ ਹ੍ਯਸ੍ਯ ਪਰਿਪਨ੍ਥਿਨੌ॥

indriyasyendriyasyārthe rāga-dveṣhau vyavasthitau tayor na vaśham āgachchhet tau hyasya paripanthinau

अर्थइन्द्रियइन्द्रिय (अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय) के विषय के प्रति (मन में) रागद्वेष रहते हैं; मनुष्य को चाहिये कि वह उन दोनों के वश में न हो; क्योंकि वे इसके (मनुष्य के) शत्रु हैं।।

ਸ਼੍ਰੇਯਾਨ੍ਸ੍ਵਧਰ੍ਮੋ ਵਿਗੁਣਃ ਪਰਧਰ੍ਮਾਤ੍ਸ੍ਵਨੁष੍ਠਿਤਾਤ੍। ਸ੍ਵਧਰ੍ਮੇ ਨਿਧਨਂ ਸ਼੍ਰੇਯਃ ਪਰਧਰ੍ਮੋ ਭਯਾਵਹਃ॥

śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt swa-dharme nidhanaṁ śhreyaḥ para-dharmo bhayāvahaḥ

अर्थसम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है।।

ਅਰ੍ਜੁਨ ਉਵਾਚ ਅਥ ਕੇਨ ਪ੍ਰਯੁਕ੍ਤੋऽਯਂ ਪਾਪਂ ਚਰਤਿ ਪੂਰੁषਃ। ਅਨਿਚ੍ਛਨ੍ਨਪਿ ਵਾਰ੍ष੍ਣੇਯ ਬਲਾਦਿਵ ਨਿਯੋਜਿਤਃ॥

arjuna uvācha atha kena prayukto ’yaṁ pāpaṁ charati pūruṣhaḥ anichchhann api vārṣhṇeya balād iva niyojitaḥ

अर्थअर्जुन ने कहा -- हे वार्ष्णेय ! फिर यह पुरुष बलपूर्वक बाध्य किये हुये के समान अनिच्छा होते हुये भी किसके द्वारा प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है?

ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚ ਕਾਮ ਏष ਕ੍ਰੋਧ ਏष ਰਜੋਗੁਣਸਮੁਦ੍ਭਵਃ। ਮਹਾਸ਼ਨੋ ਮਹਾਪਾਪ੍ਮਾ ਵਿਦ੍ਧ੍ਯੇਨਮਿਹ ਵੈਰਿਣਮ੍॥

śhrī bhagavān uvācha kāma eṣha krodha eṣha rajo-guṇa-samudbhavaḥ mahāśhano mahā-pāpmā viddhyenam iha vairiṇam

अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- रजोगुण में उत्पन्न हुई यह 'कामना' है, यही क्रोध है; यह महाशना (जिसकी भूख बड़ी हो) और महापापी है, इसे ही तुम यहाँ (इस जगत् में) शत्रु जानो।।

ਧੂਮੇਨਾਵ੍ਰਿਯਤੇ ਵਹ੍ਨਿਰ੍ਯਥਾऽऽਦਰ੍ਸ਼ੋ ਮਲੇਨ ਚ। ਯਥੋਲ੍ਬੇਨਾਵृਤੋ ਗਰ੍ਭਸ੍ਤਥਾ ਤੇਨੇਦਮਾਵृਤਮ੍॥

dhūmenāvriyate vahnir yathādarśho malena cha yatholbenāvṛito garbhas tathā tenedam āvṛitam

अर्थजैसे धुयें से अग्नि और धूलि से दर्पण ढक जाता है तथा जैसे भ्रूण गर्भाशय से ढका रहता है, वैसे उस (काम) के द्वारा यह (ज्ञान) आवृत होता है।।

ਆਵृਤਂ ਜ੍ਞਾਨਮੇਤੇਨ ਜ੍ਞਾਨਿਨੋ ਨਿਤ੍ਯਵੈਰਿਣਾ। ਕਾਮਰੂਪੇਣ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਦੁष੍ਪੂਰੇਣਾਨਲੇਨ ਚ॥

āvṛitaṁ jñānam etena jñānino nitya-vairiṇā kāma-rūpeṇa kaunteya duṣhpūreṇānalena cha

अर्थहे कौन्तेय ! अग्नि के समान जिसको तृप्त करना कठिन है ऐसे कामरूप, ज्ञानी के इस नित्य शत्रु द्वारा ज्ञान आवृत है।।

ਇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਣਿ ਮਨੋ ਬੁਦ੍ਧਿਰਸ੍ਯਾਧਿष੍ਠਾਨਮੁਚ੍ਯਤੇ। ਏਤੈਰ੍ਵਿਮੋਹਯਤ੍ਯੇष ਜ੍ਞਾਨਮਾਵृਤ੍ਯ ਦੇਹਿਨਮ੍॥

indriyāṇi mano buddhir asyādhiṣhṭhānam uchyate etair vimohayatyeṣha jñānam āvṛitya dehinam

अर्थइन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके निवास स्थान कहे जाते हैं; यह काम इनके द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके देही पुरुष को मोहित करता है।।

ਤਸ੍ਮਾਤ੍ਤ੍ਵਮਿਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਣ੍ਯਾਦੌ ਨਿਯਮ੍ਯ ਭਰਤਰ੍षਭ। ਪਾਪ੍ਮਾਨਂ ਪ੍ਰਜਹਿ ਹ੍ਯੇਨਂ ਜ੍ਞਾਨਵਿਜ੍ਞਾਨਨਾਸ਼ਨਮ੍॥

tasmāt tvam indriyāṇyādau niyamya bharatarṣhabha pāpmānaṁ prajahi hyenaṁ jñāna-vijñāna-nāśhanam

अर्थइसलिये, हे अर्जुन ! तुम पहले इन्द्रियों को वश में करके, ज्ञान और विज्ञान के नाशक इस कामरूप पापी को नष्ट करो।।

ਇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਣਿ ਪਰਾਣ੍ਯਾਹੁਰਿਨ੍ਦ੍ਰਿਯੇਭ੍ਯਃ ਪਰਂ ਮਨਃ। ਮਨਸਸ੍ਤੁ ਪਰਾ ਬੁਦ੍ਧਿਰ੍ਯੋ ਬੁਦ੍ਧੇਃ ਪਰਤਸ੍ਤੁ ਸਃ॥

indriyāṇi parāṇyāhur indriyebhyaḥ paraṁ manaḥ manasas tu parā buddhir yo buddheḥ paratas tu saḥ

अर्थ(शरीर से) परे (श्रेष्ठ) इन्द्रियाँ कही जाती हैं; इन्द्रियों से परे मन है और मन से परे बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी परे है, वह है आत्मा।।

ਏਵਂ ਬੁਦ੍ਧੇਃ ਪਰਂ ਬੁਦ੍ਧ੍ਵਾ ਸਂਸ੍ਤਭ੍ਯਾਤ੍ਮਾਨਮਾਤ੍ਮਨਾ। ਜਹਿ ਸ਼ਤ੍ਰੁਂ ਮਹਾਬਾਹੋ ਕਾਮਰੂਪਂ ਦੁਰਾਸਦਮ੍॥

evaṁ buddheḥ paraṁ buddhvā sanstabhyātmānam ātmanā jahi śhatruṁ mahā-bāho kāma-rūpaṁ durāsadam

अर्थइस प्रकार बुद्धि से परे (शुद्ध) आत्मा को जानकर आत्मा (बुद्धि) के द्वारा आत्मा (मन) को वश में करके, हे महाबाहो ! तुम इस दुर्जेय (दुरासदम्) कामरूप शत्रु को मारो।।