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ਭਗਵਦ੍ਗੀਤਾ · ਅਧ੍ਯਾਯ 4 / 18

ਜ੍ਞਾਨਕਰ੍ਮਸਂਨ੍ਯਾਸਯੋਗ

Bhagavad Gita Chapter 4 in Punjabi (Gurmukhi)

Jñāna Karm Sanyās Yog · ज्ञान और कर्म · 42 श्लोक

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अध्याय सारांश

भगवद गीता का चौथा अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग योग है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण कर्मयोग का गुणगान करते हैं अथवा अर्जुन को आत्मा एवं परम सत्य का बोध कराते हैं। वे भौतिक संसार में अपनी उपस्तिथि के पीछे कारण का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि भले ही वह अनन्त हैं, फिर भी वह इस धरती पर धर्म और शांति को पुन: स्थापित करने के लिए समय समय पर जन्म लेते रहते हैं। उनके जन्म और क्रियाकलाप शाश्वत हैं और सामूहिक दोषों से कभी भी दूषित नहीं होते हैं। वे मनुष्य जो इस सत्य को जानते और समझते हैं, वे संपूर्ण श्रद्धा के साथ उनकी भक्ति करते हैं और अंततः उन्हें प्राप्त करते हैं। उनहे इस दुनिया में फिर से जन्म लेने की जरूरत नहीं है।

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ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚ ਇਮਂ ਵਿਵਸ੍ਵਤੇ ਯੋਗਂ ਪ੍ਰੋਕ੍ਤਵਾਨਹਮਵ੍ਯਯਮ੍। ਵਿਵਸ੍ਵਾਨ੍ ਮਨਵੇ ਪ੍ਰਾਹ ਮਨੁਰਿਕ੍ष੍ਵਾਕਵੇऽਬ੍ਰਵੀਤ੍॥

śhrī bhagavān uvācha imaṁ vivasvate yogaṁ proktavān aham avyayam vivasvān manave prāha manur ikṣhvākave ’bravīt

अर्थश्रीभगवान् ने कहा --- मैंने इस अविनाशी योग को विवस्वान् (सूर्य देवता) से कहा (सिखाया); विवस्वान् ने मनु से कहा; मनु ने इक्ष्वाकु से कहा।।

ਏਵਂ ਪਰਮ੍ਪਰਾਪ੍ਰਾਪ੍ਤਮਿਮਂ ਰਾਜਰ੍षਯੋ ਵਿਦੁਃ। ਕਾਲੇਨੇਹ ਮਹਤਾ ਯੋਗੋ ਨष੍ਟਃ ਪਰਨ੍ਤਪ॥

evaṁ paramparā-prāptam imaṁ rājarṣhayo viduḥ sa kāleneha mahatā yogo naṣhṭaḥ parantapa

अर्थइस प्रकार परम्परा से प्राप्त हुये इस योग को राजर्षियों ने जाना, (परन्तु) हे परन्तप ! वह योग बहुत काल (के अन्तराल) से यहाँ (इस लोक में) नष्टप्राय हो गया।।

ਏਵਾਯਂ ਮਯਾ ਤੇऽਦ੍ਯ ਯੋਗਃ ਪ੍ਰੋਕ੍ਤਃ ਪੁਰਾਤਨਃ। ਭਕ੍ਤੋऽਸਿ ਮੇ ਸਖਾ ਚੇਤਿ ਰਹਸ੍ਯਂ ਹ੍ਯੇਤਦੁਤ੍ਤਮਮ੍॥

sa evāyaṁ mayā te ’dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ bhakto ’si me sakhā cheti rahasyaṁ hyetad uttamam

अर्थवह ही यह पुरातन योग आज मैंने तुम्हें कहा (सिखाया) क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो। यह उत्तम रहस्य है।।

ਅਰ੍ਜੁਨ ਉਵਾਚ ਅਪਰਂ ਭਵਤੋ ਜਨ੍ਮ ਪਰਂ ਜਨ੍ਮ ਵਿਵਸ੍ਵਤਃ। ਕਥਮੇਤਦ੍ਵਿਜਾਨੀਯਾਂ ਤ੍ਵਮਾਦੌ ਪ੍ਰੋਕ੍ਤਵਾਨਿਤਿ॥

arjuna uvācha aparaṁ bhavato janma paraṁ janma vivasvataḥ katham etad vijānīyāṁ tvam ādau proktavān iti

अर्थअर्जुन ने कहा -- आपका जन्म अपर अर्थात् पश्चात का है और विवस्वान् का जन्म (आपके) पूर्व का है, इसलिये यह मैं कैसे जानूँ कि (सृष्टि के) आदि में आपने (इस योग को) कहा था?

ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚ ਬਹੂਨਿ ਮੇ ਵ੍ਯਤੀਤਾਨਿ ਜਨ੍ਮਾਨਿ ਤਵ ਚਾਰ੍ਜੁਨ। ਤਾਨ੍ਯਹਂ ਵੇਦ ਸਰ੍ਵਾਣਿ ਤ੍ਵਂ ਵੇਤ੍ਥ ਪਰਨ੍ਤਪ॥

śhrī bhagavān uvācha bahūni me vyatītāni janmāni tava chārjuna tānyahaṁ veda sarvāṇi na tvaṁ vettha parantapa

अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके हैं, (परन्तु) हे परन्तप ! उन सबको मैं जानता हूँ और तुम नहीं जानते।।

ਅਜੋऽਪਿ ਸਨ੍ਨਵ੍ਯਯਾਤ੍ਮਾ ਭੂਤਾਨਾਮੀਸ਼੍ਵਰੋऽਪਿ ਸਨ੍। ਪ੍ਰਕृਤਿਂ ਸ੍ਵਾਮਧਿष੍ਠਾਯ ਸਂਭਵਾਮ੍ਯਾਤ੍ਮਮਾਯਯਾ॥

ajo ’pi sannavyayātmā bhūtānām īśhvaro ’pi san prakṛitiṁ svām adhiṣhṭhāya sambhavāmyātma-māyayā

अर्थयद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप हूँ और भूतमात्र का ईश्वर हूँ (तथापि) अपनी प्रकृति को अपने अधीन रखकर (अधिष्ठाय) मैं अपनी माया से जन्म लेता हूँ।।

ਯਦਾ ਯਦਾ ਹਿ ਧਰ੍ਮਸ੍ਯ ਗ੍ਲਾਨਿਰ੍ਭਵਤਿ ਭਾਰਤ। ਅਭ੍ਯੁਤ੍ਥਾਨਮਧਰ੍ਮਸ੍ਯ ਤਦਾऽऽਤ੍ਮਾਨਂ ਸृਜਾਮ੍ਯਹਮ੍॥

yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛijāmyaham

अर्थहे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।।

ਪਰਿਤ੍ਰਾਣਾਯ ਸਾਧੂਨਾਂ ਵਿਨਾਸ਼ਾਯ ਦੁष੍ਕृਤਾਮ੍। ਧਰ੍ਮਸਂਸ੍ਥਾਪਨਾਰ੍ਥਾਯ ਸਂਭਵਾਮਿ ਯੁਗੇ ਯੁਗੇ॥

paritrāṇāya sādhūnāṁ vināśhāya cha duṣhkṛitām dharma-sansthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge

अर्थसाधु पुरुषों के रक्षण, दुष्कृत्य करने वालों के नाश, तथा धर्म संस्थापना के लिये, मैं प्रत्येक युग में प्रगट होता हूँ।।

ਜਨ੍ਮ ਕਰ੍ਮ ਮੇ ਦਿਵ੍ਯਮੇਵਂ ਯੋ ਵੇਤ੍ਤਿ ਤਤ੍ਤ੍ਵਤਃ। ਤ੍ਯਕ੍ਤ੍ਵਾ ਦੇਹਂ ਪੁਨਰ੍ਜਨ੍ਮ ਨੈਤਿ ਮਾਮੇਤਿ ਸੋऽਰ੍ਜੁਨ॥

janma karma cha me divyam evaṁ yo vetti tattvataḥ tyaktvā dehaṁ punar janma naiti mām eti so ’rjuna

अर्थहे अर्जुन ! मेरा जन्म और कर्म दिव्य है, इस प्रकार जो पुरुष तत्त्वत: जानता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को नहीं प्राप्त होता; वह मुझे ही प्राप्त होता है।।

ਵੀਤਰਾਗਭਯਕ੍ਰੋਧਾ ਮਨ੍ਮਯਾ ਮਾਮੁਪਾਸ਼੍ਰਿਤਾਃ। ਬਹਵੋ ਜ੍ਞਾਨਤਪਸਾ ਪੂਤਾ ਮਦ੍ਭਾਵਮਾਗਤਾਃ॥

vīta-rāga-bhaya-krodhā man-mayā mām upāśhritāḥ bahavo jñāna-tapasā pūtā mad-bhāvam āgatāḥ

अर्थराग भय और क्रोध से रहित मनमय मेरे शरण हुए बहुत से पुरुष ज्ञान रुप तप से पवित्र‌ हुए मेरे स्वरुप को प्राप्त हुए हैं।।

ਯੇ ਯਥਾ ਮਾਂ ਪ੍ਰਪਦ੍ਯਨ੍ਤੇ ਤਾਂਸ੍ਤਥੈਵ ਭਜਾਮ੍ਯਹਮ੍। ਮਮ ਵਰ੍ਤ੍ਮਾਨੁਵਰ੍ਤਨ੍ਤੇ ਮਨੁष੍ਯਾਃ ਪਾਰ੍ਥ ਸਰ੍ਵਸ਼ਃ॥

ye yathā māṁ prapadyante tāns tathaiva bhajāmyaham mama vartmānuvartante manuṣhyāḥ pārtha sarvaśhaḥ

अर्थजो मुझे जैसे भजते हैं, मैं उन पर वैसे ही अनुग्रह करता हूँ; हे पार्थ सभी मनुष्य सब प्रकार से, मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते हैं।।

ਕਾਙ੍ਕ੍षਨ੍ਤਃ ਕਰ੍ਮਣਾਂ ਸਿਦ੍ਧਿਂ ਯਜਨ੍ਤ ਇਹ ਦੇਵਤਾਃ। ਕ੍षਿਪ੍ਰਂ ਹਿ ਮਾਨੁषੇ ਲੋਕੇ ਸਿਦ੍ਧਿਰ੍ਭਵਤਿ ਕਰ੍ਮਜਾ॥

kāṅkṣhantaḥ karmaṇāṁ siddhiṁ yajanta iha devatāḥ kṣhipraṁ hi mānuṣhe loke siddhir bhavati karmajā

अर्थ(सामान्य मनुष्य) यहाँ (इस लोक में) कर्मों के फल को चाहते हुये देवताओं को पूजते हैं; क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मों के फल शीघ्र ही प्राप्त होते हैं।।

ਚਾਤੁਰ੍ਵਰ੍ਣ੍ਯਂ ਮਯਾ ਸृष੍ਟਂ ਗੁਣਕਰ੍ਮਵਿਭਾਗਸ਼ਃ। ਤਸ੍ਯ ਕਰ੍ਤਾਰਮਪਿ ਮਾਂ ਵਿਦ੍ਧ੍ਯਕਰ੍ਤਾਰਮਵ੍ਯਯਮ੍॥

chātur-varṇyaṁ mayā sṛiṣhṭaṁ guṇa-karma-vibhāgaśhaḥ tasya kartāram api māṁ viddhyakartāram avyayam

अर्थगुण और कर्मों के विभाग से चातुर्वण्य मेरे द्वारा रचा गया है। यद्यपि मैं उसका कर्ता हूँ, तथापि तुम मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।।

ਮਾਂ ਕਰ੍ਮਾਣਿ ਲਿਮ੍ਪਨ੍ਤਿ ਮੇ ਕਰ੍ਮਫਲੇ ਸ੍ਪृਹਾ। ਇਤਿ ਮਾਂ ਯੋऽਭਿਜਾਨਾਤਿ ਕਰ੍ਮਭਿਰ੍ਨ ਬਧ੍ਯਤੇ॥

na māṁ karmāṇi limpanti na me karma-phale spṛihā iti māṁ yo ’bhijānāti karmabhir na sa badhyate

अर्थकर्म मुझे लिप्त नहीं करते; न मुझे कर्मफल में स्पृहा है। इस प्रकार मुझे जो जानता है, वह भी कर्मों से नहीं बन्धता है।।

ਏਵਂ ਜ੍ਞਾਤ੍ਵਾ ਕृਤਂ ਕਰ੍ਮ ਪੂਰ੍ਵੈਰਪਿ ਮੁਮੁਕ੍षੁਭਿਃ। ਕੁਰੁ ਕਰ੍ਮੈਵ ਤਸ੍ਮਾਤ੍ਤ੍ਵਂ ਪੂਰ੍ਵੈਃ ਪੂਰ੍ਵਤਰਂ ਕृਤਮ੍॥

evaṁ jñātvā kṛitaṁ karma pūrvair api mumukṣhubhiḥ kuru karmaiva tasmāttvaṁ pūrvaiḥ pūrvataraṁ kṛitam

अर्थपूर्व के मुमुक्ष पुरुषों द्वारा भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किया गया है; इसलिये तुम भी पूर्वजों द्वारा सदा से किये हुए कर्मों को ही करो।।

ਕਿਂ ਕਰ੍ਮ ਕਿਮਕਰ੍ਮੇਤਿ ਕਵਯੋऽਪ੍ਯਤ੍ਰ ਮੋਹਿਤਾਃ। ਤਤ੍ਤੇ ਕਰ੍ਮ ਪ੍ਰਵਕ੍ष੍ਯਾਮਿ ਯਜ੍ਜ੍ਞਾਤ੍ਵਾ ਮੋਕ੍ष੍ਯਸੇऽਸ਼ੁਭਾਤ੍॥

kiṁ karma kim akarmeti kavayo ’pyatra mohitāḥ tat te karma pravakṣhyāmi yaj jñātvā mokṣhyase ’śhubhāt

अर्थकर्म क्या है और अकर्म क्या है? इस विषय में बुद्धिमान पुरुष भी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिये मैं तुम्हें कर्म कहूँगा, (अर्थात् कर्म और अकर्म का स्वरूप समझाऊँगा) जिसको जानकर तुम अशुभ (संसार बन्धन) से मुक्त हो जाओगे।।

ਕਰ੍ਮਣੋ ਹ੍ਯਪਿ ਬੋਦ੍ਧਵ੍ਯਂ ਬੋਦ੍ਧਵ੍ਯਂ ਵਿਕਰ੍ਮਣਃ। ਅਕਰ੍ਮਣਸ਼੍ਚ ਬੋਦ੍ਧਵ੍ਯਂ ਗਹਨਾ ਕਰ੍ਮਣੋ ਗਤਿਃ॥

karmaṇo hyapi boddhavyaṁ boddhavyaṁ cha vikarmaṇaḥ akarmaṇaśh cha boddhavyaṁ gahanā karmaṇo gatiḥ

अर्थकर्म का (स्वरूप) जानना चाहिये और विकर्म का (स्वरूप) भी जानना चाहिये ; (बोद्धव्यम्) तथा अकर्म का भी (स्वरूप) जानना चाहिये (क्योंकि) कर्म की गति गहन है।।

ਕਰ੍ਮਣ੍ਯਕਰ੍ਮ ਯਃ ਪਸ਼੍ਯੇਦਕਰ੍ਮਣਿ ਕਰ੍ਮ ਯਃ। ਬੁਦ੍ਧਿਮਾਨ੍ ਮਨੁष੍ਯੇषੁ ਯੁਕ੍ਤਃ ਕृਤ੍ਸ੍ਨਕਰ੍ਮਕृਤ੍॥

karmaṇyakarma yaḥ paśhyed akarmaṇi cha karma yaḥ sa buddhimān manuṣhyeṣhu sa yuktaḥ kṛitsna-karma-kṛit

अर्थजो पुरुष कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है, वह योगी सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।।

ਯਸ੍ਯ ਸਰ੍ਵੇ ਸਮਾਰਮ੍ਭਾਃ ਕਾਮਸਙ੍ਕਲ੍ਪਵਰ੍ਜਿਤਾਃ। ਜ੍ਞਾਨਾਗ੍ਨਿਦਗ੍ਧਕਰ੍ਮਾਣਂ ਤਮਾਹੁਃ ਪਣ੍ਡਿਤਂ ਬੁਧਾਃ॥

yasya sarve samārambhāḥ kāma-saṅkalpa-varjitāḥ jñānāgni-dagdha-karmāṇaṁ tam āhuḥ paṇḍitaṁ budhāḥ

अर्थजिसके समस्त कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं, ऐसे उस ज्ञानरूप अग्नि के द्वारा भस्म हुये कर्मों वाले पुरुष को ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं।।

ਤ੍ਯਕ੍ਤ੍ਵਾ ਕਰ੍ਮਫਲਾਸਙ੍ਗਂ ਨਿਤ੍ਯਤृਪ੍ਤੋ ਨਿਰਾਸ਼੍ਰਯਃ। ਕਰ੍ਮਣ੍ਯਭਿਪ੍ਰਵृਤ੍ਤੋऽਪਿ ਨੈਵ ਕਿਞ੍ਚਿਤ੍ਕਰੋਤਿ ਸਃ॥

tyaktvā karma-phalāsaṅgaṁ nitya-tṛipto nirāśhrayaḥ karmaṇyabhipravṛitto ’pi naiva kiñchit karoti saḥ

अर्थजो पुरुष, कर्मफलासक्ति को त्यागकर, नित्यतृप्त और सब आश्रयों से रहित है वह कर्म में प्रवृत्त होते हुए भी (वास्तव में) कुछ भी नहीं करता है।।

ਨਿਰਾਸ਼ੀਰ੍ਯਤਚਿਤ੍ਤਾਤ੍ਮਾ ਤ੍ਯਕ੍ਤਸਰ੍ਵਪਰਿਗ੍ਰਹਃ। ਸ਼ਾਰੀਰਂ ਕੇਵਲਂ ਕਰ੍ਮ ਕੁਰ੍ਵਨ੍ਨਾਪ੍ਨੋਤਿ ਕਿਲ੍ਬਿषਮ੍॥

nirāśhīr yata-chittātmā tyakta-sarva-parigrahaḥ śhārīraṁ kevalaṁ karma kurvan nāpnoti kilbiṣham

अर्थजो आशा रहित है तथा जिसने चित्त और आत्मा (शरीर) को संयमित किया है, जिसने सब परिग्रहों का त्याग किया है, ऐसा पुरुष शारीरिक कर्म करते हुए भी पाप को नहीं प्राप्त होता है।।

ਯਦृਚ੍ਛਾਲਾਭਸਨ੍ਤੁष੍ਟੋ ਦ੍ਵਨ੍ਦ੍ਵਾਤੀਤੋ ਵਿਮਤ੍ਸਰਃ। ਸਮਃ ਸਿਦ੍ਧਾਵਸਿਦ੍ਧੌ ਕृਤ੍ਵਾਪਿ ਨਿਬਧ੍ਯਤੇ॥

yadṛichchhā-lābha-santuṣhṭo dvandvātīto vimatsaraḥ samaḥ siddhāvasiddhau cha kṛitvāpi na nibadhyate

अर्थयदृच्छया (अपने आप) जो कुछ प्राप्त हो उसमें ही सन्तुष्ट रहने वाला, द्वन्द्वों से अतीत तथा मत्सर से रहित, सिद्धि व असिद्धि में समभाव वाला पुरुष कर्म करके भी नहीं बन्धता है।।

ਗਤਸਙ੍ਗਸ੍ਯ ਮੁਕ੍ਤਸ੍ਯ ਜ੍ਞਾਨਾਵਸ੍ਥਿਤਚੇਤਸਃ। ਯਜ੍ਞਾਯਾਚਰਤਃ ਕਰ੍ਮ ਸਮਗ੍ਰਂ ਪ੍ਰਵਿਲੀਯਤੇ॥

gata-saṅgasya muktasya jñānāvasthita-chetasaḥ yajñāyācharataḥ karma samagraṁ pravilīyate

अर्थजो आसक्तिरहित और मुक्त है, जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है, यज्ञ के लिये आचरण करने वाले ऐसे पुरुष के समस्त कर्म लीन हो जाते हैं।।

ਬ੍ਰਹ੍ਮਾਰ੍ਪਣਂ ਬ੍ਰਹ੍ਮਹਵਿਰ੍ਬ੍ਰਹ੍ਮਾਗ੍ਨੌ ਬ੍ਰਹ੍ਮਣਾ ਹੁਤਮ੍। ਬ੍ਰਹ੍ਮੈਵ ਤੇਨ ਗਨ੍ਤਵ੍ਯਂ ਬ੍ਰਹ੍ਮਕਰ੍ਮਸਮਾਧਿਨਾ॥

brahmārpaṇaṁ brahma havir brahmāgnau brahmaṇā hutam brahmaiva tena gantavyaṁ brahma-karma-samādhinā

अर्थअर्पण (अर्थात् अर्पण करने का साधन श्रुवा) ब्रह्म है और हवि (शाकल्य अथवा हवन करने योग्य द्रव्य) भी ब्रह्म है; ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा जो हवन किया गया है, वह भी ब्रह्म ही है। इस प्रकार ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष का गन्तव्य भी ब्रह्म ही है।।

ਦੈਵਮੇਵਾਪਰੇ ਯਜ੍ਞਂ ਯੋਗਿਨਃ ਪਰ੍ਯੁਪਾਸਤੇ। ਬ੍ਰਹ੍ਮਾਗ੍ਨਾਵਪਰੇ ਯਜ੍ਞਂ ਯਜ੍ਞੇਨੈਵੋਪਜੁਹ੍ਵਤਿ॥

daivam evāpare yajñaṁ yoginaḥ paryupāsate brahmāgnāvapare yajñaṁ yajñenaivopajuhvati

अर्थकोई योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ को ही करते हैं ; और दूसरे (ज्ञानीजन) ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा यज्ञ को हवन करते हैं।।

ਸ਼੍ਰੋਤ੍ਰਾਦੀਨੀਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਣ੍ਯਨ੍ਯੇ ਸਂਯਮਾਗ੍ਨਿषੁ ਜੁਹ੍ਵਤਿ। ਸ਼ਬ੍ਦਾਦੀਨ੍ਵਿषਯਾਨਨ੍ਯ ਇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਗ੍ਨਿषੁ ਜੁਹ੍ਵਤਿ॥

śhrotrādīnīndriyāṇyanye sanyamāgniṣhu juhvati śhabdādīn viṣhayānanya indriyāgniṣhu juhvati

अर्थअन्य (योगीजन) श्रोत्रादिक सब इन्द्रियों को संयमरूप अग्नि में हवन करते हैं, और अन्य (लोग) शब्दादिक विषयों को इन्द्रियरूप अग्नि में हवन करते हैं।।

ਸਰ੍ਵਾਣੀਨ੍ਦ੍ਰਿਯਕਰ੍ਮਾਣਿ ਪ੍ਰਾਣਕਰ੍ਮਾਣਿ ਚਾਪਰੇ। ਆਤ੍ਮਸਂਯਮਯੋਗਾਗ੍ਨੌ ਜੁਹ੍ਵਤਿ ਜ੍ਞਾਨਦੀਪਿਤੇ॥

sarvāṇīndriya-karmāṇi prāṇa-karmāṇi chāpare ātma-sanyama-yogāgnau juhvati jñāna-dīpite

अर्थदूसरे (योगीजन) सम्पूर्ण इन्द्रियों के तथा प्राणों के कर्मों को ज्ञान से प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्नि में हवन करते हैं।।

ਦ੍ਰਵ੍ਯਯਜ੍ਞਾਸ੍ਤਪੋਯਜ੍ਞਾ ਯੋਗਯਜ੍ਞਾਸ੍ਤਥਾਪਰੇ। ਸ੍ਵਾਧ੍ਯਾਯਜ੍ਞਾਨਯਜ੍ਞਾਸ਼੍ਚ ਯਤਯਃ ਸਂਸ਼ਿਤਵ੍ਰਤਾਃ॥

dravya-yajñās tapo-yajñā yoga-yajñās tathāpare swādhyāya-jñāna-yajñāśh cha yatayaḥ sanśhita-vratāḥ

अर्थकुछ (साधक) द्रव्ययज्ञ, तपयज्ञ और योगयज्ञ करने वाले होते हैं; और दूसरे कठिन व्रत करने वाले स्वाध्याय और ज्ञानयज्ञ करने वाले योगीजन होते हैं।।

ਅਪਾਨੇ ਜੁਹ੍ਵਤਿ ਪ੍ਰਾਣ ਪ੍ਰਾਣੇऽਪਾਨਂ ਤਥਾऽਪਰੇ। ਪ੍ਰਾਣਾਪਾਨਗਤੀ ਰੁਦ੍ਧ੍ਵਾ ਪ੍ਰਾਣਾਯਾਮਪਰਾਯਣਾਃ॥

apāne juhvati prāṇaṁ prāṇe ’pānaṁ tathāpare prāṇāpāna-gatī ruddhvā prāṇāyāma-parāyaṇāḥ apare niyatāhārāḥ prāṇān prāṇeṣhu juhvati sarve ’pyete yajña-vido yajña-kṣhapita-kalmaṣhāḥ

अर्थअन्य (योगीजन) अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, तथा प्राण में अपान की आहुति देते हैं, प्राण और अपान की गति को रोककर, वे प्राणायाम के ही समलक्ष्य समझने वाले होते हैं।।

ਅਪਰੇ ਨਿਯਤਾਹਾਰਾਃ ਪ੍ਰਾਣਾਨ੍ਪ੍ਰਾਣੇषੁ ਜੁਹ੍ਵਤਿ। ਸਰ੍ਵੇऽਪ੍ਯੇਤੇ ਯਜ੍ਞਵਿਦੋ ਯਜ੍ਞਕ੍षਪਿਤਕਲ੍ਮषਾਃ॥

apare niyatāhārāḥ prāṇān prāṇeṣu juhvati sarve py 'ete yajña-vido yajña-kṣapita-kalmaṣāḥ

अर्थदूसरे नियमित आहार करने वाले (साधक जन) प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं। ये सभी यज्ञ को जानने वाले हैं, जिनके पाप यज्ञ के द्वारा नष्ट हो चुके हैं।।

ਯਜ੍ਞਸ਼ਿष੍ਟਾਮृਤਭੁਜੋ ਯਾਨ੍ਤਿ ਬ੍ਰਹ੍ਮ ਸਨਾਤਨਮ੍। ਨਾਯਂ ਲੋਕੋऽਸ੍ਤ੍ਯਯਜ੍ਞਸ੍ਯ ਕੁਤੋ़ऽਨ੍ਯਃ ਕੁਰੁਸਤ੍ਤਮ॥

yajña-śhiṣhṭāmṛita-bhujo yānti brahma sanātanam nāyaṁ loko ’styayajñasya kuto ’nyaḥ kuru-sattama

अर्थहे कुरुश्रेष्ठ ! यज्ञ के अवशिष्ट अमृत को भोगने वाले पुरुष सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ रहित पुरुष को यह लोक भी नहीं मिलता, फिर परलोक कैसे मिलेगा?

ਏਵਂ ਬਹੁਵਿਧਾ ਯਜ੍ਞਾ ਵਿਤਤਾ ਬ੍ਰਹ੍ਮਣੋ ਮੁਖੇ। ਕਰ੍ਮਜਾਨ੍ਵਿਦ੍ਧਿ ਤਾਨ੍ਸਰ੍ਵਾਨੇਵਂ ਜ੍ਞਾਤ੍ਵਾ ਵਿਮੋਕ੍ष੍ਯਸੇ॥

evaṁ bahu-vidhā yajñā vitatā brahmaṇo mukhe karma-jān viddhi tān sarvān evaṁ jñātvā vimokṣhyase

अर्थऐसे अनेक प्रकार के यज्ञों का ब्रह्मा के मुख अर्थात् वेदों में प्रसार है अर्थात् वर्णित हैं। उन सब को कर्मों से उत्पन्न हुए जानो; इस प्रकार जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।।

ਸ਼੍ਰੇਯਾਨ੍ਦ੍ਰਵ੍ਯਮਯਾਦ੍ਯਜ੍ਞਾਜ੍ਜ੍ਞਾਨਯਜ੍ਞਃ ਪਰਨ੍ਤਪ। ਸਰ੍ਵਂ ਕਰ੍ਮਾਖਿਲਂ ਪਾਰ੍ਥ ਜ੍ਞਾਨੇ ਪਰਿਸਮਾਪ੍ਯਤੇ॥

śhreyān dravya-mayād yajñāj jñāna-yajñaḥ parantapa sarvaṁ karmākhilaṁ pārtha jñāne parisamāpyate

अर्थहे परन्तप ! द्रव्यों से सम्पन्न होने वाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ ! सम्पूर्ण अखिल कर्म ज्ञान में समाप्त होते हैं, अर्थात् ज्ञान उनकी पराकाष्ठा है।।

ਤਦ੍ਵਿਦ੍ਧਿ ਪ੍ਰਣਿਪਾਤੇਨ ਪਰਿਪ੍ਰਸ਼੍ਨੇਨ ਸੇਵਯਾ। ਉਪਦੇਕ੍ष੍ਯਨ੍ਤਿ ਤੇ ਜ੍ਞਾਨਂ ਜ੍ਞਾਨਿਨਸ੍ਤਤ੍ਤ੍ਵਦਰ੍ਸ਼ਿਨਃ॥

tad viddhi praṇipātena paripraśhnena sevayā upadekṣhyanti te jñānaṁ jñāninas tattva-darśhinaḥ

अर्थउस (ज्ञान) को (गुरु के समीप जाकर) साष्टांग प्रणिपात, प्रश्न तथा सेवा करके जानो; ये तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुष तुम्हें ज्ञान का उपदेश करेंगे।।

ਯਜ੍ਜ੍ਞਾਤ੍ਵਾ ਪੁਨਰ੍ਮੋਹਮੇਵਂ ਯਾਸ੍ਯਸਿ ਪਾਣ੍ਡਵ। ਯੇਨ ਭੂਤਾਨ੍ਯਸ਼ੇषੇਣ ਦ੍ਰਕ੍ष੍ਯਸ੍ਯਾਤ੍ਮਨ੍ਯਥੋ ਮਯਿ॥

yaj jñātvā na punar moham evaṁ yāsyasi pāṇḍava yena bhūtānyaśheṣheṇa drakṣhyasyātmanyatho mayi

अर्थजिसको जानकर तुम पुन इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगे, और हे पाण्डव ! जिसके द्वारा तुम भूतमात्र को अपने आत्मस्वरूप में तथा मुझमें भी देखोगे।।

ਅਪਿ ਚੇਦਸਿ ਪਾਪੇਭ੍ਯਃ ਸਰ੍ਵੇਭ੍ਯਃ ਪਾਪਕृਤ੍ਤਮਃ। ਸਰ੍ਵਂ ਜ੍ਞਾਨਪ੍ਲਵੇਨੈਵ ਵृਜਿਨਂ ਸਨ੍ਤਰਿष੍ਯਸਿ॥

api ched asi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpa-kṛit-tamaḥ sarvaṁ jñāna-plavenaiva vṛijinaṁ santariṣhyasi

अर्थयदि तुम सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो, तो भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा, निश्चय ही सम्पूर्ण पापों का तुम संतरण कर जाओगे।।

ਯਥੈਧਾਂਸਿ ਸਮਿਦ੍ਧੋऽਗ੍ਨਿਰ੍ਭਸ੍ਮਸਾਤ੍ਕੁਰੁਤੇऽਰ੍ਜੁਨ। ਜ੍ਞਾਨਾਗ੍ਨਿਃ ਸਰ੍ਵਕਰ੍ਮਾਣਿ ਭਸ੍ਮਸਾਤ੍ਕੁਰੁਤੇ ਤਥਾ॥

yathaidhānsi samiddho ’gnir bhasma-sāt kurute ’rjuna jñānāgniḥ sarva-karmāṇi bhasma-sāt kurute tathā

अर्थजैसे प्रज्जवलित अग्नि ईन्धन को भस्मसात् कर देती है, वैसे ही, हे अर्जुन ! ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्मसात् कर देती है।।

ਹਿ ਜ੍ਞਾਨੇਨ ਸਦृਸ਼ਂ ਪਵਿਤ੍ਰਮਿਹ ਵਿਦ੍ਯਤੇ। ਤਤ੍ਸ੍ਵਯਂ ਯੋਗਸਂਸਿਦ੍ਧਃ ਕਾਲੇਨਾਤ੍ਮਨਿ ਵਿਨ੍ਦਤਿ॥

na hi jñānena sadṛiśhaṁ pavitramiha vidyate tatsvayaṁ yogasansiddhaḥ kālenātmani vindati

अर्थइस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला, निसंदेह, कुछ भी नहीं है। योग में संसिद्ध पुरुष स्वयं ही उसे (उचित) काल में आत्मा में प्राप्त करता है।।

ਸ਼੍ਰਦ੍ਧਾਵਾਂਲ੍ਲਭਤੇ ਜ੍ਞਾਨਂ ਤਤ੍ਪਰਃ ਸਂਯਤੇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਃ। ਜ੍ਞਾਨਂ ਲਬ੍ਧ੍ਵਾ ਪਰਾਂ ਸ਼ਾਨ੍ਤਿਮਚਿਰੇਣਾਧਿਗਚ੍ਛਤਿ॥

śhraddhāvān labhate jñānaṁ tat-paraḥ sanyatendriyaḥ jñānaṁ labdhvā parāṁ śhāntim achireṇādhigachchhati

अर्थश्रद्धावान्, तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है।।

ਅਜ੍ਞਸ਼੍ਚਾਸ਼੍ਰਦ੍ਦਧਾਨਸ਼੍ਚ ਸਂਸ਼ਯਾਤ੍ਮਾ ਵਿਨਸ਼੍ਯਤਿ। ਨਾਯਂ ਲੋਕੋऽਸ੍ਤਿ ਪਰੋ ਸੁਖਂ ਸਂਸ਼ਯਾਤ੍ਮਨਃ॥

ajñaśh chāśhraddadhānaśh cha sanśhayātmā vinaśhyati nāyaṁ loko ’sti na paro na sukhaṁ sanśhayātmanaḥ

अर्थअज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष नष्ट हो जाता है, (उनमें भी) संशयी पुरुष के लिये न यह लोक है, न परलोक और न सुख।।

ਯੋਗਸਂਨ੍ਯਸ੍ਤਕਰ੍ਮਾਣਂ ਜ੍ਞਾਨਸਂਛਿਨ੍ਨਸਂਸ਼ਯਮ੍। ਆਤ੍ਮਵਨ੍ਤਂ ਕਰ੍ਮਾਣਿ ਨਿਬਧ੍ਨਨ੍ਤਿ ਧਨਞ੍ਜਯ॥

yoga-sannyasta-karmāṇaṁ jñāna-sañchhinna-sanśhayam ātmavantaṁ na karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya

अर्थजिसने योगद्वारा कर्मों का संन्यास किया है, ज्ञानद्वारा जिसके संशय नष्ट हो गये हैं, ऐसे आत्मवान् पुरुष को, हे धनंजय ! कर्म नहीं बांधते हैं।।

ਤਸ੍ਮਾਦਜ੍ਞਾਨਸਂਭੂਤਂ ਹृਤ੍ਸ੍ਥਂ ਜ੍ਞਾਨਾਸਿਨਾऽऽਤ੍ਮਨਃ। ਛਿਤ੍ਤ੍ਵੈਨਂ ਸਂਸ਼ਯਂ ਯੋਗਮਾਤਿष੍ਠੋਤ੍ਤਿष੍ਠ ਭਾਰਤ॥

tasmād ajñāna-sambhūtaṁ hṛit-sthaṁ jñānāsinātmanaḥ chhittvainaṁ sanśhayaṁ yogam ātiṣhṭhottiṣhṭha bhārata

अर्थइसलिये अपने हृदय में स्थित अज्ञान से उत्पन्न आत्मविषयक संशय को ज्ञान खड्ग से काटकर, हे भारत ! योग का आश्रय लेकर खड़े हो जाओ।।