Mantra.Tips
பகவத்கீதா · அத்யாய 4 / 18

ஜ்ஞாநகர்மஸம்ந்யாஸயோக

Bhagavad Gita Chapter 4 in Tamil

Jñāna Karm Sanyās Yog · ज्ञान और कर्म · 42 श्लोक

🌐 अपनी भाषा में पढ़ें

अध्याय सारांश

भगवद गीता का चौथा अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग योग है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण कर्मयोग का गुणगान करते हैं अथवा अर्जुन को आत्मा एवं परम सत्य का बोध कराते हैं। वे भौतिक संसार में अपनी उपस्तिथि के पीछे कारण का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि भले ही वह अनन्त हैं, फिर भी वह इस धरती पर धर्म और शांति को पुन: स्थापित करने के लिए समय समय पर जन्म लेते रहते हैं। उनके जन्म और क्रियाकलाप शाश्वत हैं और सामूहिक दोषों से कभी भी दूषित नहीं होते हैं। वे मनुष्य जो इस सत्य को जानते और समझते हैं, वे संपूर्ण श्रद्धा के साथ उनकी भक्ति करते हैं और अंततः उन्हें प्राप्त करते हैं। उनहे इस दुनिया में फिर से जन्म लेने की जरूरत नहीं है।

🔊 किसी भी श्लोक को सुनने के लिए ▶ दबाएँ

ஶ்ரீ பகவாநுவாச இமம் விவஸ்வதே யோகம் ப்ரோக்தவாநஹமவ்யயம்। விவஸ்வாந் மநவே ப்ராஹ மநுரிக்ஷ்வாகவேऽப்ரவீத்॥

śhrī bhagavān uvācha imaṁ vivasvate yogaṁ proktavān aham avyayam vivasvān manave prāha manur ikṣhvākave ’bravīt

अर्थश्रीभगवान् ने कहा --- मैंने इस अविनाशी योग को विवस्वान् (सूर्य देवता) से कहा (सिखाया); विवस्वान् ने मनु से कहा; मनु ने इक्ष्वाकु से कहा।।

ஏவம் பரம்பராப்ராப்தமிமம் ராஜர்ஷயோ விதுஃ। காலேநேஹ மஹதா யோகோ நஷ்டஃ பரந்தப॥

evaṁ paramparā-prāptam imaṁ rājarṣhayo viduḥ sa kāleneha mahatā yogo naṣhṭaḥ parantapa

अर्थइस प्रकार परम्परा से प्राप्त हुये इस योग को राजर्षियों ने जाना, (परन्तु) हे परन्तप ! वह योग बहुत काल (के अन्तराल) से यहाँ (इस लोक में) नष्टप्राय हो गया।।

ஏவாயம் மயா தேऽத்ய யோகஃ ப்ரோக்தஃ புராதநஃ। பக்தோऽஸி மே ஸகா சேதி ரஹஸ்யம் ஹ்யேததுத்தமம்॥

sa evāyaṁ mayā te ’dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ bhakto ’si me sakhā cheti rahasyaṁ hyetad uttamam

अर्थवह ही यह पुरातन योग आज मैंने तुम्हें कहा (सिखाया) क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो। यह उत्तम रहस्य है।।

அர்ஜுந உவாச அபரம் பவதோ ஜந்ம பரம் ஜந்ம விவஸ்வதஃ। கதமேதத்விஜாநீயாம் த்வமாதௌ ப்ரோக்தவாநிதி॥

arjuna uvācha aparaṁ bhavato janma paraṁ janma vivasvataḥ katham etad vijānīyāṁ tvam ādau proktavān iti

अर्थअर्जुन ने कहा -- आपका जन्म अपर अर्थात् पश्चात का है और विवस्वान् का जन्म (आपके) पूर्व का है, इसलिये यह मैं कैसे जानूँ कि (सृष्टि के) आदि में आपने (इस योग को) कहा था?

ஶ்ரீ பகவாநுவாச பஹூநி மே வ்யதீதாநி ஜந்மாநி தவ சார்ஜுந। தாந்யஹம் வேத ஸர்வாணி த்வம் வேத்த பரந்தப॥

śhrī bhagavān uvācha bahūni me vyatītāni janmāni tava chārjuna tānyahaṁ veda sarvāṇi na tvaṁ vettha parantapa

अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके हैं, (परन्तु) हे परन्तप ! उन सबको मैं जानता हूँ और तुम नहीं जानते।।

அஜோऽபி ஸந்நவ்யயாத்மா பூதாநாமீஶ்வரோऽபி ஸந்। ப்ரக்ரு'திம் ஸ்வாமதிஷ்டாய ஸம்பவாம்யாத்மமாயயா॥

ajo ’pi sannavyayātmā bhūtānām īśhvaro ’pi san prakṛitiṁ svām adhiṣhṭhāya sambhavāmyātma-māyayā

अर्थयद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप हूँ और भूतमात्र का ईश्वर हूँ (तथापि) अपनी प्रकृति को अपने अधीन रखकर (अधिष्ठाय) मैं अपनी माया से जन्म लेता हूँ।।

யதா யதா ஹி தர்மஸ்ய க்லாநிர்பவதி பாரத। அப்யுத்தாநமதர்மஸ்ய ததாऽऽத்மாநம் ஸ்ரு'ஜாம்யஹம்॥

yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛijāmyaham

अर्थहे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।।

பரித்ராணாய ஸாதூநாம் விநாஶாய துஷ்க்ரு'தாம்। தர்மஸம்ஸ்தாபநார்தாய ஸம்பவாமி யுகே யுகே॥

paritrāṇāya sādhūnāṁ vināśhāya cha duṣhkṛitām dharma-sansthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge

अर्थसाधु पुरुषों के रक्षण, दुष्कृत्य करने वालों के नाश, तथा धर्म संस्थापना के लिये, मैं प्रत्येक युग में प्रगट होता हूँ।।

ஜந்ம கர்ம மே திவ்யமேவம் யோ வேத்தி தத்த்வதஃ। த்யக்த்வா தேஹம் புநர்ஜந்ம நைதி மாமேதி ஸோऽர்ஜுந॥

janma karma cha me divyam evaṁ yo vetti tattvataḥ tyaktvā dehaṁ punar janma naiti mām eti so ’rjuna

अर्थहे अर्जुन ! मेरा जन्म और कर्म दिव्य है, इस प्रकार जो पुरुष तत्त्वत: जानता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को नहीं प्राप्त होता; वह मुझे ही प्राप्त होता है।।

வீதராகபயக்ரோதா மந்மயா மாமுபாஶ்ரிதாஃ। பஹவோ ஜ்ஞாநதபஸா பூதா மத்பாவமாகதாஃ॥

vīta-rāga-bhaya-krodhā man-mayā mām upāśhritāḥ bahavo jñāna-tapasā pūtā mad-bhāvam āgatāḥ

अर्थराग भय और क्रोध से रहित मनमय मेरे शरण हुए बहुत से पुरुष ज्ञान रुप तप से पवित्र‌ हुए मेरे स्वरुप को प्राप्त हुए हैं।।

யே யதா மாம் ப்ரபத்யந்தே தாம்ஸ்ததைவ பஜாம்யஹம்। மம வர்த்மாநுவர்தந்தே மநுஷ்யாஃ பார்த ஸர்வஶஃ॥

ye yathā māṁ prapadyante tāns tathaiva bhajāmyaham mama vartmānuvartante manuṣhyāḥ pārtha sarvaśhaḥ

अर्थजो मुझे जैसे भजते हैं, मैं उन पर वैसे ही अनुग्रह करता हूँ; हे पार्थ सभी मनुष्य सब प्रकार से, मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते हैं।।

காங்க்ஷந்தஃ கர்மணாம் ஸித்திம் யஜந்த இஹ தேவதாஃ। க்ஷிப்ரம் ஹி மாநுஷே லோகே ஸித்திர்பவதி கர்மஜா॥

kāṅkṣhantaḥ karmaṇāṁ siddhiṁ yajanta iha devatāḥ kṣhipraṁ hi mānuṣhe loke siddhir bhavati karmajā

अर्थ(सामान्य मनुष्य) यहाँ (इस लोक में) कर्मों के फल को चाहते हुये देवताओं को पूजते हैं; क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मों के फल शीघ्र ही प्राप्त होते हैं।।

சாதுர்வர்ண்யம் மயா ஸ்ரு'ஷ்டம் குணகர்மவிபாகஶஃ। தஸ்ய கர்தாரமபி மாம் வித்த்யகர்தாரமவ்யயம்॥

chātur-varṇyaṁ mayā sṛiṣhṭaṁ guṇa-karma-vibhāgaśhaḥ tasya kartāram api māṁ viddhyakartāram avyayam

अर्थगुण और कर्मों के विभाग से चातुर्वण्य मेरे द्वारा रचा गया है। यद्यपि मैं उसका कर्ता हूँ, तथापि तुम मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।।

மாம் கர்மாணி லிம்பந்தி மே கர்மபலே ஸ்ப்ரு'ஹா। இதி மாம் யோऽபிஜாநாதி கர்மபிர்ந பத்யதே॥

na māṁ karmāṇi limpanti na me karma-phale spṛihā iti māṁ yo ’bhijānāti karmabhir na sa badhyate

अर्थकर्म मुझे लिप्त नहीं करते; न मुझे कर्मफल में स्पृहा है। इस प्रकार मुझे जो जानता है, वह भी कर्मों से नहीं बन्धता है।।

ஏவம் ஜ்ஞாத்வா க்ரு'தம் கர்ம பூர்வைரபி முமுக்ஷுபிஃ। குரு கர்மைவ தஸ்மாத்த்வம் பூர்வைஃ பூர்வதரம் க்ரு'தம்॥

evaṁ jñātvā kṛitaṁ karma pūrvair api mumukṣhubhiḥ kuru karmaiva tasmāttvaṁ pūrvaiḥ pūrvataraṁ kṛitam

अर्थपूर्व के मुमुक्ष पुरुषों द्वारा भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किया गया है; इसलिये तुम भी पूर्वजों द्वारा सदा से किये हुए कर्मों को ही करो।।

கிம் கர்ம கிமகர்மேதி கவயோऽப்யத்ர மோஹிதாஃ। தத்தே கர்ம ப்ரவக்ஷ்யாமி யஜ்ஜ்ஞாத்வா மோக்ஷ்யஸேऽஶுபாத்॥

kiṁ karma kim akarmeti kavayo ’pyatra mohitāḥ tat te karma pravakṣhyāmi yaj jñātvā mokṣhyase ’śhubhāt

अर्थकर्म क्या है और अकर्म क्या है? इस विषय में बुद्धिमान पुरुष भी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिये मैं तुम्हें कर्म कहूँगा, (अर्थात् कर्म और अकर्म का स्वरूप समझाऊँगा) जिसको जानकर तुम अशुभ (संसार बन्धन) से मुक्त हो जाओगे।।

கர்மணோ ஹ்யபி போத்தவ்யம் போத்தவ்யம் விகர்மணஃ। அகர்மணஶ்ச போத்தவ்யம் கஹநா கர்மணோ கதிஃ॥

karmaṇo hyapi boddhavyaṁ boddhavyaṁ cha vikarmaṇaḥ akarmaṇaśh cha boddhavyaṁ gahanā karmaṇo gatiḥ

अर्थकर्म का (स्वरूप) जानना चाहिये और विकर्म का (स्वरूप) भी जानना चाहिये ; (बोद्धव्यम्) तथा अकर्म का भी (स्वरूप) जानना चाहिये (क्योंकि) कर्म की गति गहन है।।

கர்மண்யகர்ம யஃ பஶ்யேதகர்மணி கர்ம யஃ। புத்திமாந் மநுஷ்யேஷு யுக்தஃ க்ரு'த்ஸ்நகர்மக்ரு'த்॥

karmaṇyakarma yaḥ paśhyed akarmaṇi cha karma yaḥ sa buddhimān manuṣhyeṣhu sa yuktaḥ kṛitsna-karma-kṛit

अर्थजो पुरुष कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है, वह योगी सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।।

யஸ்ய ஸர்வே ஸமாரம்பாஃ காமஸங்கல்பவர்ஜிதாஃ। ஜ்ஞாநாக்நிதக்தகர்மாணம் தமாஹுஃ பண்டிதம் புதாஃ॥

yasya sarve samārambhāḥ kāma-saṅkalpa-varjitāḥ jñānāgni-dagdha-karmāṇaṁ tam āhuḥ paṇḍitaṁ budhāḥ

अर्थजिसके समस्त कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं, ऐसे उस ज्ञानरूप अग्नि के द्वारा भस्म हुये कर्मों वाले पुरुष को ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं।।

த்யக்த்வா கர்மபலாஸங்கம் நித்யத்ரு'ப்தோ நிராஶ்ரயஃ। கர்மண்யபிப்ரவ்ரு'த்தோऽபி நைவ கிஞ்சித்கரோதி ஸஃ॥

tyaktvā karma-phalāsaṅgaṁ nitya-tṛipto nirāśhrayaḥ karmaṇyabhipravṛitto ’pi naiva kiñchit karoti saḥ

अर्थजो पुरुष, कर्मफलासक्ति को त्यागकर, नित्यतृप्त और सब आश्रयों से रहित है वह कर्म में प्रवृत्त होते हुए भी (वास्तव में) कुछ भी नहीं करता है।।

நிராஶீர்யதசித்தாத்மா த்யக்தஸர்வபரிக்ரஹஃ। ஶாரீரம் கேவலம் கர்ம குர்வந்நாப்நோதி கில்பிஷம்॥

nirāśhīr yata-chittātmā tyakta-sarva-parigrahaḥ śhārīraṁ kevalaṁ karma kurvan nāpnoti kilbiṣham

अर्थजो आशा रहित है तथा जिसने चित्त और आत्मा (शरीर) को संयमित किया है, जिसने सब परिग्रहों का त्याग किया है, ऐसा पुरुष शारीरिक कर्म करते हुए भी पाप को नहीं प्राप्त होता है।।

யத்ரு'ச்சாலாபஸந்துஷ்டோ த்வந்த்வாதீதோ விமத்ஸரஃ। ஸமஃ ஸித்தாவஸித்தௌ க்ரு'த்வாபி நிபத்யதே॥

yadṛichchhā-lābha-santuṣhṭo dvandvātīto vimatsaraḥ samaḥ siddhāvasiddhau cha kṛitvāpi na nibadhyate

अर्थयदृच्छया (अपने आप) जो कुछ प्राप्त हो उसमें ही सन्तुष्ट रहने वाला, द्वन्द्वों से अतीत तथा मत्सर से रहित, सिद्धि व असिद्धि में समभाव वाला पुरुष कर्म करके भी नहीं बन्धता है।।

கதஸங்கஸ்ய முக்தஸ்ய ஜ்ஞாநாவஸ்திதசேதஸஃ। யஜ்ஞாயாசரதஃ கர்ம ஸமக்ரம் ப்ரவிலீயதே॥

gata-saṅgasya muktasya jñānāvasthita-chetasaḥ yajñāyācharataḥ karma samagraṁ pravilīyate

अर्थजो आसक्तिरहित और मुक्त है, जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है, यज्ञ के लिये आचरण करने वाले ऐसे पुरुष के समस्त कर्म लीन हो जाते हैं।।

ப்ரஹ்மார்பணம் ப்ரஹ்மஹவிர்ப்ரஹ்மாக்நௌ ப்ரஹ்மணா ஹுதம்। ப்ரஹ்மைவ தேந கந்தவ்யம் ப்ரஹ்மகர்மஸமாதிநா॥

brahmārpaṇaṁ brahma havir brahmāgnau brahmaṇā hutam brahmaiva tena gantavyaṁ brahma-karma-samādhinā

अर्थअर्पण (अर्थात् अर्पण करने का साधन श्रुवा) ब्रह्म है और हवि (शाकल्य अथवा हवन करने योग्य द्रव्य) भी ब्रह्म है; ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा जो हवन किया गया है, वह भी ब्रह्म ही है। इस प्रकार ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष का गन्तव्य भी ब्रह्म ही है।।

தைவமேவாபரே யஜ்ஞம் யோகிநஃ பர்யுபாஸதே। ப்ரஹ்மாக்நாவபரே யஜ்ஞம் யஜ்ஞேநைவோபஜுஹ்வதி॥

daivam evāpare yajñaṁ yoginaḥ paryupāsate brahmāgnāvapare yajñaṁ yajñenaivopajuhvati

अर्थकोई योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ को ही करते हैं ; और दूसरे (ज्ञानीजन) ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा यज्ञ को हवन करते हैं।।

ஶ்ரோத்ராதீநீந்த்ரியாண்யந்யே ஸம்யமாக்நிஷு ஜுஹ்வதி। ஶப்தாதீந்விஷயாநந்ய இந்த்ரியாக்நிஷு ஜுஹ்வதி॥

śhrotrādīnīndriyāṇyanye sanyamāgniṣhu juhvati śhabdādīn viṣhayānanya indriyāgniṣhu juhvati

अर्थअन्य (योगीजन) श्रोत्रादिक सब इन्द्रियों को संयमरूप अग्नि में हवन करते हैं, और अन्य (लोग) शब्दादिक विषयों को इन्द्रियरूप अग्नि में हवन करते हैं।।

ஸர்வாணீந்த்ரியகர்மாணி ப்ராணகர்மாணி சாபரே। ஆத்மஸம்யமயோகாக்நௌ ஜுஹ்வதி ஜ்ஞாநதீபிதே॥

sarvāṇīndriya-karmāṇi prāṇa-karmāṇi chāpare ātma-sanyama-yogāgnau juhvati jñāna-dīpite

अर्थदूसरे (योगीजन) सम्पूर्ण इन्द्रियों के तथा प्राणों के कर्मों को ज्ञान से प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्नि में हवन करते हैं।।

த்ரவ்யயஜ்ஞாஸ்தபோயஜ்ஞா யோகயஜ்ஞாஸ்ததாபரே। ஸ்வாத்யாயஜ்ஞாநயஜ்ஞாஶ்ச யதயஃ ஸம்ஶிதவ்ரதாஃ॥

dravya-yajñās tapo-yajñā yoga-yajñās tathāpare swādhyāya-jñāna-yajñāśh cha yatayaḥ sanśhita-vratāḥ

अर्थकुछ (साधक) द्रव्ययज्ञ, तपयज्ञ और योगयज्ञ करने वाले होते हैं; और दूसरे कठिन व्रत करने वाले स्वाध्याय और ज्ञानयज्ञ करने वाले योगीजन होते हैं।।

அபாநே ஜுஹ்வதி ப்ராண ப்ராணேऽபாநம் ததாऽபரே। ப்ராணாபாநகதீ ருத்த்வா ப்ராணாயாமபராயணாஃ॥

apāne juhvati prāṇaṁ prāṇe ’pānaṁ tathāpare prāṇāpāna-gatī ruddhvā prāṇāyāma-parāyaṇāḥ apare niyatāhārāḥ prāṇān prāṇeṣhu juhvati sarve ’pyete yajña-vido yajña-kṣhapita-kalmaṣhāḥ

अर्थअन्य (योगीजन) अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, तथा प्राण में अपान की आहुति देते हैं, प्राण और अपान की गति को रोककर, वे प्राणायाम के ही समलक्ष्य समझने वाले होते हैं।।

அபரே நியதாஹாராஃ ப்ராணாந்ப்ராணேஷு ஜுஹ்வதி। ஸர்வேऽப்யேதே யஜ்ஞவிதோ யஜ்ஞக்ஷபிதகல்மஷாஃ॥

apare niyatāhārāḥ prāṇān prāṇeṣu juhvati sarve py 'ete yajña-vido yajña-kṣapita-kalmaṣāḥ

अर्थदूसरे नियमित आहार करने वाले (साधक जन) प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं। ये सभी यज्ञ को जानने वाले हैं, जिनके पाप यज्ञ के द्वारा नष्ट हो चुके हैं।।

யஜ்ஞஶிஷ்டாம்ரு'தபுஜோ யாந்தி ப்ரஹ்ம ஸநாதநம்। நாயம் லோகோऽஸ்த்யயஜ்ஞஸ்ய குதோ़ऽந்யஃ குருஸத்தம॥

yajña-śhiṣhṭāmṛita-bhujo yānti brahma sanātanam nāyaṁ loko ’styayajñasya kuto ’nyaḥ kuru-sattama

अर्थहे कुरुश्रेष्ठ ! यज्ञ के अवशिष्ट अमृत को भोगने वाले पुरुष सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ रहित पुरुष को यह लोक भी नहीं मिलता, फिर परलोक कैसे मिलेगा?

ஏவம் பஹுவிதா யஜ்ஞா விததா ப்ரஹ்மணோ முகே। கர்மஜாந்வித்தி தாந்ஸர்வாநேவம் ஜ்ஞாத்வா விமோக்ஷ்யஸே॥

evaṁ bahu-vidhā yajñā vitatā brahmaṇo mukhe karma-jān viddhi tān sarvān evaṁ jñātvā vimokṣhyase

अर्थऐसे अनेक प्रकार के यज्ञों का ब्रह्मा के मुख अर्थात् वेदों में प्रसार है अर्थात् वर्णित हैं। उन सब को कर्मों से उत्पन्न हुए जानो; इस प्रकार जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।।

ஶ்ரேயாந்த்ரவ்யமயாத்யஜ்ஞாஜ்ஜ்ஞாநயஜ்ஞஃ பரந்தப। ஸர்வம் கர்மாகிலம் பார்த ஜ்ஞாநே பரிஸமாப்யதே॥

śhreyān dravya-mayād yajñāj jñāna-yajñaḥ parantapa sarvaṁ karmākhilaṁ pārtha jñāne parisamāpyate

अर्थहे परन्तप ! द्रव्यों से सम्पन्न होने वाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ ! सम्पूर्ण अखिल कर्म ज्ञान में समाप्त होते हैं, अर्थात् ज्ञान उनकी पराकाष्ठा है।।

தத்வித்தி ப்ரணிபாதேந பரிப்ரஶ்நேந ஸேவயா। உபதேக்ஷ்யந்தி தே ஜ்ஞாநம் ஜ்ஞாநிநஸ்தத்த்வதர்ஶிநஃ॥

tad viddhi praṇipātena paripraśhnena sevayā upadekṣhyanti te jñānaṁ jñāninas tattva-darśhinaḥ

अर्थउस (ज्ञान) को (गुरु के समीप जाकर) साष्टांग प्रणिपात, प्रश्न तथा सेवा करके जानो; ये तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुष तुम्हें ज्ञान का उपदेश करेंगे।।

யஜ்ஜ்ஞாத்வா புநர்மோஹமேவம் யாஸ்யஸி பாண்டவ। யேந பூதாந்யஶேஷேண த்ரக்ஷ்யஸ்யாத்மந்யதோ மயி॥

yaj jñātvā na punar moham evaṁ yāsyasi pāṇḍava yena bhūtānyaśheṣheṇa drakṣhyasyātmanyatho mayi

अर्थजिसको जानकर तुम पुन इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगे, और हे पाण्डव ! जिसके द्वारा तुम भूतमात्र को अपने आत्मस्वरूप में तथा मुझमें भी देखोगे।।

அபி சேதஸி பாபேப்யஃ ஸர்வேப்யஃ பாபக்ரு'த்தமஃ। ஸர்வம் ஜ்ஞாநப்லவேநைவ வ்ரு'ஜிநம் ஸந்தரிஷ்யஸி॥

api ched asi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpa-kṛit-tamaḥ sarvaṁ jñāna-plavenaiva vṛijinaṁ santariṣhyasi

अर्थयदि तुम सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो, तो भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा, निश्चय ही सम्पूर्ण पापों का तुम संतरण कर जाओगे।।

யதைதாம்ஸி ஸமித்தோऽக்நிர்பஸ்மஸாத்குருதேऽர்ஜுந। ஜ்ஞாநாக்நிஃ ஸர்வகர்மாணி பஸ்மஸாத்குருதே ததா॥

yathaidhānsi samiddho ’gnir bhasma-sāt kurute ’rjuna jñānāgniḥ sarva-karmāṇi bhasma-sāt kurute tathā

अर्थजैसे प्रज्जवलित अग्नि ईन्धन को भस्मसात् कर देती है, वैसे ही, हे अर्जुन ! ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्मसात् कर देती है।।

ஹி ஜ்ஞாநேந ஸத்ரு'ஶம் பவித்ரமிஹ வித்யதே। தத்ஸ்வயம் யோகஸம்ஸித்தஃ காலேநாத்மநி விந்ததி॥

na hi jñānena sadṛiśhaṁ pavitramiha vidyate tatsvayaṁ yogasansiddhaḥ kālenātmani vindati

अर्थइस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला, निसंदेह, कुछ भी नहीं है। योग में संसिद्ध पुरुष स्वयं ही उसे (उचित) काल में आत्मा में प्राप्त करता है।।

ஶ்ரத்தாவாம்ல்லபதே ஜ்ஞாநம் தத்பரஃ ஸம்யதேந்த்ரியஃ। ஜ்ஞாநம் லப்த்வா பராம் ஶாந்திமசிரேணாதிகச்சதி॥

śhraddhāvān labhate jñānaṁ tat-paraḥ sanyatendriyaḥ jñānaṁ labdhvā parāṁ śhāntim achireṇādhigachchhati

अर्थश्रद्धावान्, तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है।।

அஜ்ஞஶ்சாஶ்ரத்ததாநஶ்ச ஸம்ஶயாத்மா விநஶ்யதி। நாயம் லோகோऽஸ்தி பரோ ஸுகம் ஸம்ஶயாத்மநஃ॥

ajñaśh chāśhraddadhānaśh cha sanśhayātmā vinaśhyati nāyaṁ loko ’sti na paro na sukhaṁ sanśhayātmanaḥ

अर्थअज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष नष्ट हो जाता है, (उनमें भी) संशयी पुरुष के लिये न यह लोक है, न परलोक और न सुख।।

யோகஸம்ந்யஸ்தகர்மாணம் ஜ்ஞாநஸம்சிந்நஸம்ஶயம்। ஆத்மவந்தம் கர்மாணி நிபத்நந்தி தநஞ்ஜய॥

yoga-sannyasta-karmāṇaṁ jñāna-sañchhinna-sanśhayam ātmavantaṁ na karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya

अर्थजिसने योगद्वारा कर्मों का संन्यास किया है, ज्ञानद्वारा जिसके संशय नष्ट हो गये हैं, ऐसे आत्मवान् पुरुष को, हे धनंजय ! कर्म नहीं बांधते हैं।।

தஸ்மாதஜ்ஞாநஸம்பூதம் ஹ்ரு'த்ஸ்தம் ஜ்ஞாநாஸிநாऽऽத்மநஃ। சித்த்வைநம் ஸம்ஶயம் யோகமாதிஷ்டோத்திஷ்ட பாரத॥

tasmād ajñāna-sambhūtaṁ hṛit-sthaṁ jñānāsinātmanaḥ chhittvainaṁ sanśhayaṁ yogam ātiṣhṭhottiṣhṭha bhārata

अर्थइसलिये अपने हृदय में स्थित अज्ञान से उत्पन्न आत्मविषयक संशय को ज्ञान खड्ग से काटकर, हे भारत ! योग का आश्रय लेकर खड़े हो जाओ।।