జ్ఞానకర్మసంన్యాసయోగ
Bhagavad Gita Chapter 4 in Telugu
Jñāna Karm Sanyās Yog · ज्ञान और कर्म · 42 श्लोक
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अध्याय सारांश
भगवद गीता का चौथा अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग योग है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण कर्मयोग का गुणगान करते हैं अथवा अर्जुन को आत्मा एवं परम सत्य का बोध कराते हैं। वे भौतिक संसार में अपनी उपस्तिथि के पीछे कारण का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि भले ही वह अनन्त हैं, फिर भी वह इस धरती पर धर्म और शांति को पुन: स्थापित करने के लिए समय समय पर जन्म लेते रहते हैं। उनके जन्म और क्रियाकलाप शाश्वत हैं और सामूहिक दोषों से कभी भी दूषित नहीं होते हैं। वे मनुष्य जो इस सत्य को जानते और समझते हैं, वे संपूर्ण श्रद्धा के साथ उनकी भक्ति करते हैं और अंततः उन्हें प्राप्त करते हैं। उनहे इस दुनिया में फिर से जन्म लेने की जरूरत नहीं है।
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శ్రీ భగవానువాచ ఇమం వివస్వతే యోగం ప్రోక్తవానహమవ్యయమ్। వివస్వాన్ మనవే ప్రాహ మనురిక్ష్వాకవేఽబ్రవీత్॥
śhrī bhagavān uvācha imaṁ vivasvate yogaṁ proktavān aham avyayam vivasvān manave prāha manur ikṣhvākave ’bravīt
अर्थश्रीभगवान् ने कहा --- मैंने इस अविनाशी योग को विवस्वान् (सूर्य देवता) से कहा (सिखाया); विवस्वान् ने मनु से कहा; मनु ने इक्ष्वाकु से कहा।।
ఏవం పరమ్పరాప్రాప్తమిమం రాజర్షయో విదుః। స కాలేనేహ మహతా యోగో నష్టః పరన్తప॥
evaṁ paramparā-prāptam imaṁ rājarṣhayo viduḥ sa kāleneha mahatā yogo naṣhṭaḥ parantapa
अर्थइस प्रकार परम्परा से प्राप्त हुये इस योग को राजर्षियों ने जाना, (परन्तु) हे परन्तप ! वह योग बहुत काल (के अन्तराल) से यहाँ (इस लोक में) नष्टप्राय हो गया।।
స ఏవాయం మయా తేఽద్య యోగః ప్రోక్తః పురాతనః। భక్తోఽసి మే సఖా చేతి రహస్యం హ్యేతదుత్తమమ్॥
sa evāyaṁ mayā te ’dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ bhakto ’si me sakhā cheti rahasyaṁ hyetad uttamam
अर्थवह ही यह पुरातन योग आज मैंने तुम्हें कहा (सिखाया) क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो। यह उत्तम रहस्य है।।
అర్జున ఉవాచ అపరం భవతో జన్మ పరం జన్మ వివస్వతః। కథమేతద్విజానీయాం త్వమాదౌ ప్రోక్తవానితి॥
arjuna uvācha aparaṁ bhavato janma paraṁ janma vivasvataḥ katham etad vijānīyāṁ tvam ādau proktavān iti
अर्थअर्जुन ने कहा -- आपका जन्म अपर अर्थात् पश्चात का है और विवस्वान् का जन्म (आपके) पूर्व का है, इसलिये यह मैं कैसे जानूँ कि (सृष्टि के) आदि में आपने (इस योग को) कहा था?
శ్రీ భగవానువాచ బహూని మే వ్యతీతాని జన్మాని తవ చార్జున। తాన్యహం వేద సర్వాణి న త్వం వేత్థ పరన్తప॥
śhrī bhagavān uvācha bahūni me vyatītāni janmāni tava chārjuna tānyahaṁ veda sarvāṇi na tvaṁ vettha parantapa
अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके हैं, (परन्तु) हे परन्तप ! उन सबको मैं जानता हूँ और तुम नहीं जानते।।
అజోఽపి సన్నవ్యయాత్మా భూతానామీశ్వరోఽపి సన్। ప్రకృతిం స్వామధిష్ఠాయ సంభవామ్యాత్మమాయయా॥
ajo ’pi sannavyayātmā bhūtānām īśhvaro ’pi san prakṛitiṁ svām adhiṣhṭhāya sambhavāmyātma-māyayā
अर्थयद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप हूँ और भूतमात्र का ईश्वर हूँ (तथापि) अपनी प्रकृति को अपने अधीन रखकर (अधिष्ठाय) मैं अपनी माया से जन्म लेता हूँ।।
యదా యదా హి ధర్మస్య గ్లానిర్భవతి భారత। అభ్యుత్థానమధర్మస్య తదాఽఽత్మానం సృజామ్యహమ్॥
yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛijāmyaham
अर्थहे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।।
పరిత్రాణాయ సాధూనాం వినాశాయ చ దుష్కృతామ్। ధర్మసంస్థాపనార్థాయ సంభవామి యుగే యుగే॥
paritrāṇāya sādhūnāṁ vināśhāya cha duṣhkṛitām dharma-sansthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge
अर्थसाधु पुरुषों के रक्षण, दुष्कृत्य करने वालों के नाश, तथा धर्म संस्थापना के लिये, मैं प्रत्येक युग में प्रगट होता हूँ।।
జన్మ కర్మ చ మే దివ్యమేవం యో వేత్తి తత్త్వతః। త్యక్త్వా దేహం పునర్జన్మ నైతి మామేతి సోఽర్జున॥
janma karma cha me divyam evaṁ yo vetti tattvataḥ tyaktvā dehaṁ punar janma naiti mām eti so ’rjuna
अर्थहे अर्जुन ! मेरा जन्म और कर्म दिव्य है, इस प्रकार जो पुरुष तत्त्वत: जानता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को नहीं प्राप्त होता; वह मुझे ही प्राप्त होता है।।
వీతరాగభయక్రోధా మన్మయా మాముపాశ్రితాః। బహవో జ్ఞానతపసా పూతా మద్భావమాగతాః॥
vīta-rāga-bhaya-krodhā man-mayā mām upāśhritāḥ bahavo jñāna-tapasā pūtā mad-bhāvam āgatāḥ
अर्थराग भय और क्रोध से रहित मनमय मेरे शरण हुए बहुत से पुरुष ज्ञान रुप तप से पवित्र हुए मेरे स्वरुप को प्राप्त हुए हैं।।
యే యథా మాం ప్రపద్యన్తే తాంస్తథైవ భజామ్యహమ్। మమ వర్త్మానువర్తన్తే మనుష్యాః పార్థ సర్వశః॥
ye yathā māṁ prapadyante tāns tathaiva bhajāmyaham mama vartmānuvartante manuṣhyāḥ pārtha sarvaśhaḥ
अर्थजो मुझे जैसे भजते हैं, मैं उन पर वैसे ही अनुग्रह करता हूँ; हे पार्थ सभी मनुष्य सब प्रकार से, मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते हैं।।
కాఙ్క్షన్తః కర్మణాం సిద్ధిం యజన్త ఇహ దేవతాః। క్షిప్రం హి మానుషే లోకే సిద్ధిర్భవతి కర్మజా॥
kāṅkṣhantaḥ karmaṇāṁ siddhiṁ yajanta iha devatāḥ kṣhipraṁ hi mānuṣhe loke siddhir bhavati karmajā
अर्थ(सामान्य मनुष्य) यहाँ (इस लोक में) कर्मों के फल को चाहते हुये देवताओं को पूजते हैं; क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मों के फल शीघ्र ही प्राप्त होते हैं।।
చాతుర్వర్ణ్యం మయా సృష్టం గుణకర్మవిభాగశః। తస్య కర్తారమపి మాం విద్ధ్యకర్తారమవ్యయమ్॥
chātur-varṇyaṁ mayā sṛiṣhṭaṁ guṇa-karma-vibhāgaśhaḥ tasya kartāram api māṁ viddhyakartāram avyayam
अर्थगुण और कर्मों के विभाग से चातुर्वण्य मेरे द्वारा रचा गया है। यद्यपि मैं उसका कर्ता हूँ, तथापि तुम मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।।
న మాం కర్మాణి లిమ్పన్తి న మే కర్మఫలే స్పృహా। ఇతి మాం యోఽభిజానాతి కర్మభిర్న స బధ్యతే॥
na māṁ karmāṇi limpanti na me karma-phale spṛihā iti māṁ yo ’bhijānāti karmabhir na sa badhyate
अर्थकर्म मुझे लिप्त नहीं करते; न मुझे कर्मफल में स्पृहा है। इस प्रकार मुझे जो जानता है, वह भी कर्मों से नहीं बन्धता है।।
ఏవం జ్ఞాత్వా కృతం కర్మ పూర్వైరపి ముముక్షుభిః। కురు కర్మైవ తస్మాత్త్వం పూర్వైః పూర్వతరం కృతమ్॥
evaṁ jñātvā kṛitaṁ karma pūrvair api mumukṣhubhiḥ kuru karmaiva tasmāttvaṁ pūrvaiḥ pūrvataraṁ kṛitam
अर्थपूर्व के मुमुक्ष पुरुषों द्वारा भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किया गया है; इसलिये तुम भी पूर्वजों द्वारा सदा से किये हुए कर्मों को ही करो।।
కిం కర్మ కిమకర్మేతి కవయోఽప్యత్ర మోహితాః। తత్తే కర్మ ప్రవక్ష్యామి యజ్జ్ఞాత్వా మోక్ష్యసేఽశుభాత్॥
kiṁ karma kim akarmeti kavayo ’pyatra mohitāḥ tat te karma pravakṣhyāmi yaj jñātvā mokṣhyase ’śhubhāt
अर्थकर्म क्या है और अकर्म क्या है? इस विषय में बुद्धिमान पुरुष भी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिये मैं तुम्हें कर्म कहूँगा, (अर्थात् कर्म और अकर्म का स्वरूप समझाऊँगा) जिसको जानकर तुम अशुभ (संसार बन्धन) से मुक्त हो जाओगे।।
కర్మణో హ్యపి బోద్ధవ్యం బోద్ధవ్యం చ వికర్మణః। అకర్మణశ్చ బోద్ధవ్యం గహనా కర్మణో గతిః॥
karmaṇo hyapi boddhavyaṁ boddhavyaṁ cha vikarmaṇaḥ akarmaṇaśh cha boddhavyaṁ gahanā karmaṇo gatiḥ
अर्थकर्म का (स्वरूप) जानना चाहिये और विकर्म का (स्वरूप) भी जानना चाहिये ; (बोद्धव्यम्) तथा अकर्म का भी (स्वरूप) जानना चाहिये (क्योंकि) कर्म की गति गहन है।।
కర్మణ్యకర్మ యః పశ్యేదకర్మణి చ కర్మ యః। స బుద్ధిమాన్ మనుష్యేషు స యుక్తః కృత్స్నకర్మకృత్॥
karmaṇyakarma yaḥ paśhyed akarmaṇi cha karma yaḥ sa buddhimān manuṣhyeṣhu sa yuktaḥ kṛitsna-karma-kṛit
अर्थजो पुरुष कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है, वह योगी सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।।
యస్య సర్వే సమారమ్భాః కామసఙ్కల్పవర్జితాః। జ్ఞానాగ్నిదగ్ధకర్మాణం తమాహుః పణ్డితం బుధాః॥
yasya sarve samārambhāḥ kāma-saṅkalpa-varjitāḥ jñānāgni-dagdha-karmāṇaṁ tam āhuḥ paṇḍitaṁ budhāḥ
अर्थजिसके समस्त कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं, ऐसे उस ज्ञानरूप अग्नि के द्वारा भस्म हुये कर्मों वाले पुरुष को ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं।।
త్యక్త్వా కర్మఫలాసఙ్గం నిత్యతృప్తో నిరాశ్రయః। కర్మణ్యభిప్రవృత్తోఽపి నైవ కిఞ్చిత్కరోతి సః॥
tyaktvā karma-phalāsaṅgaṁ nitya-tṛipto nirāśhrayaḥ karmaṇyabhipravṛitto ’pi naiva kiñchit karoti saḥ
अर्थजो पुरुष, कर्मफलासक्ति को त्यागकर, नित्यतृप्त और सब आश्रयों से रहित है वह कर्म में प्रवृत्त होते हुए भी (वास्तव में) कुछ भी नहीं करता है।।
నిరాశీర్యతచిత్తాత్మా త్యక్తసర్వపరిగ్రహః। శారీరం కేవలం కర్మ కుర్వన్నాప్నోతి కిల్బిషమ్॥
nirāśhīr yata-chittātmā tyakta-sarva-parigrahaḥ śhārīraṁ kevalaṁ karma kurvan nāpnoti kilbiṣham
अर्थजो आशा रहित है तथा जिसने चित्त और आत्मा (शरीर) को संयमित किया है, जिसने सब परिग्रहों का त्याग किया है, ऐसा पुरुष शारीरिक कर्म करते हुए भी पाप को नहीं प्राप्त होता है।।
యదృచ్ఛాలాభసన్తుష్టో ద్వన్ద్వాతీతో విమత్సరః। సమః సిద్ధావసిద్ధౌ చ కృత్వాపి న నిబధ్యతే॥
yadṛichchhā-lābha-santuṣhṭo dvandvātīto vimatsaraḥ samaḥ siddhāvasiddhau cha kṛitvāpi na nibadhyate
अर्थयदृच्छया (अपने आप) जो कुछ प्राप्त हो उसमें ही सन्तुष्ट रहने वाला, द्वन्द्वों से अतीत तथा मत्सर से रहित, सिद्धि व असिद्धि में समभाव वाला पुरुष कर्म करके भी नहीं बन्धता है।।
గతసఙ్గస్య ముక్తస్య జ్ఞానావస్థితచేతసః। యజ్ఞాయాచరతః కర్మ సమగ్రం ప్రవిలీయతే॥
gata-saṅgasya muktasya jñānāvasthita-chetasaḥ yajñāyācharataḥ karma samagraṁ pravilīyate
अर्थजो आसक्तिरहित और मुक्त है, जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है, यज्ञ के लिये आचरण करने वाले ऐसे पुरुष के समस्त कर्म लीन हो जाते हैं।।
బ్రహ్మార్పణం బ్రహ్మహవిర్బ్రహ్మాగ్నౌ బ్రహ్మణా హుతమ్। బ్రహ్మైవ తేన గన్తవ్యం బ్రహ్మకర్మసమాధినా॥
brahmārpaṇaṁ brahma havir brahmāgnau brahmaṇā hutam brahmaiva tena gantavyaṁ brahma-karma-samādhinā
अर्थअर्पण (अर्थात् अर्पण करने का साधन श्रुवा) ब्रह्म है और हवि (शाकल्य अथवा हवन करने योग्य द्रव्य) भी ब्रह्म है; ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा जो हवन किया गया है, वह भी ब्रह्म ही है। इस प्रकार ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष का गन्तव्य भी ब्रह्म ही है।।
దైవమేవాపరే యజ్ఞం యోగినః పర్యుపాసతే। బ్రహ్మాగ్నావపరే యజ్ఞం యజ్ఞేనైవోపజుహ్వతి॥
daivam evāpare yajñaṁ yoginaḥ paryupāsate brahmāgnāvapare yajñaṁ yajñenaivopajuhvati
अर्थकोई योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ को ही करते हैं ; और दूसरे (ज्ञानीजन) ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा यज्ञ को हवन करते हैं।।
శ్రోత్రాదీనీన్ద్రియాణ్యన్యే సంయమాగ్నిషు జుహ్వతి। శబ్దాదీన్విషయానన్య ఇన్ద్రియాగ్నిషు జుహ్వతి॥
śhrotrādīnīndriyāṇyanye sanyamāgniṣhu juhvati śhabdādīn viṣhayānanya indriyāgniṣhu juhvati
अर्थअन्य (योगीजन) श्रोत्रादिक सब इन्द्रियों को संयमरूप अग्नि में हवन करते हैं, और अन्य (लोग) शब्दादिक विषयों को इन्द्रियरूप अग्नि में हवन करते हैं।।
సర్వాణీన్ద్రియకర్మాణి ప్రాణకర్మాణి చాపరే। ఆత్మసంయమయోగాగ్నౌ జుహ్వతి జ్ఞానదీపితే॥
sarvāṇīndriya-karmāṇi prāṇa-karmāṇi chāpare ātma-sanyama-yogāgnau juhvati jñāna-dīpite
अर्थदूसरे (योगीजन) सम्पूर्ण इन्द्रियों के तथा प्राणों के कर्मों को ज्ञान से प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्नि में हवन करते हैं।।
ద్రవ్యయజ్ఞాస్తపోయజ్ఞా యోగయజ్ఞాస్తథాపరే। స్వాధ్యాయజ్ఞానయజ్ఞాశ్చ యతయః సంశితవ్రతాః॥
dravya-yajñās tapo-yajñā yoga-yajñās tathāpare swādhyāya-jñāna-yajñāśh cha yatayaḥ sanśhita-vratāḥ
अर्थकुछ (साधक) द्रव्ययज्ञ, तपयज्ञ और योगयज्ञ करने वाले होते हैं; और दूसरे कठिन व्रत करने वाले स्वाध्याय और ज्ञानयज्ञ करने वाले योगीजन होते हैं।।
అపానే జుహ్వతి ప్రాణ ప్రాణేఽపానం తథాఽపరే। ప్రాణాపానగతీ రుద్ధ్వా ప్రాణాయామపరాయణాః॥
apāne juhvati prāṇaṁ prāṇe ’pānaṁ tathāpare prāṇāpāna-gatī ruddhvā prāṇāyāma-parāyaṇāḥ apare niyatāhārāḥ prāṇān prāṇeṣhu juhvati sarve ’pyete yajña-vido yajña-kṣhapita-kalmaṣhāḥ
अर्थअन्य (योगीजन) अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, तथा प्राण में अपान की आहुति देते हैं, प्राण और अपान की गति को रोककर, वे प्राणायाम के ही समलक्ष्य समझने वाले होते हैं।।
అపరే నియతాహారాః ప్రాణాన్ప్రాణేషు జుహ్వతి। సర్వేఽప్యేతే యజ్ఞవిదో యజ్ఞక్షపితకల్మషాః॥
apare niyatāhārāḥ prāṇān prāṇeṣu juhvati sarve py 'ete yajña-vido yajña-kṣapita-kalmaṣāḥ
अर्थदूसरे नियमित आहार करने वाले (साधक जन) प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं। ये सभी यज्ञ को जानने वाले हैं, जिनके पाप यज्ञ के द्वारा नष्ट हो चुके हैं।।
యజ్ఞశిష్టామృతభుజో యాన్తి బ్రహ్మ సనాతనమ్। నాయం లోకోఽస్త్యయజ్ఞస్య కుతో़ఽన్యః కురుసత్తమ॥
yajña-śhiṣhṭāmṛita-bhujo yānti brahma sanātanam nāyaṁ loko ’styayajñasya kuto ’nyaḥ kuru-sattama
अर्थहे कुरुश्रेष्ठ ! यज्ञ के अवशिष्ट अमृत को भोगने वाले पुरुष सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ रहित पुरुष को यह लोक भी नहीं मिलता, फिर परलोक कैसे मिलेगा?
ఏవం బహువిధా యజ్ఞా వితతా బ్రహ్మణో ముఖే। కర్మజాన్విద్ధి తాన్సర్వానేవం జ్ఞాత్వా విమోక్ష్యసే॥
evaṁ bahu-vidhā yajñā vitatā brahmaṇo mukhe karma-jān viddhi tān sarvān evaṁ jñātvā vimokṣhyase
अर्थऐसे अनेक प्रकार के यज्ञों का ब्रह्मा के मुख अर्थात् वेदों में प्रसार है अर्थात् वर्णित हैं। उन सब को कर्मों से उत्पन्न हुए जानो; इस प्रकार जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।।
శ్రేయాన్ద్రవ్యమయాద్యజ్ఞాజ్జ్ఞానయజ్ఞః పరన్తప। సర్వం కర్మాఖిలం పార్థ జ్ఞానే పరిసమాప్యతే॥
śhreyān dravya-mayād yajñāj jñāna-yajñaḥ parantapa sarvaṁ karmākhilaṁ pārtha jñāne parisamāpyate
अर्थहे परन्तप ! द्रव्यों से सम्पन्न होने वाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ ! सम्पूर्ण अखिल कर्म ज्ञान में समाप्त होते हैं, अर्थात् ज्ञान उनकी पराकाष्ठा है।।
తద్విద్ధి ప్రణిపాతేన పరిప్రశ్నేన సేవయా। ఉపదేక్ష్యన్తి తే జ్ఞానం జ్ఞానినస్తత్త్వదర్శినః॥
tad viddhi praṇipātena paripraśhnena sevayā upadekṣhyanti te jñānaṁ jñāninas tattva-darśhinaḥ
अर्थउस (ज्ञान) को (गुरु के समीप जाकर) साष्टांग प्रणिपात, प्रश्न तथा सेवा करके जानो; ये तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुष तुम्हें ज्ञान का उपदेश करेंगे।।
యజ్జ్ఞాత్వా న పునర్మోహమేవం యాస్యసి పాణ్డవ। యేన భూతాన్యశేషేణ ద్రక్ష్యస్యాత్మన్యథో మయి॥
yaj jñātvā na punar moham evaṁ yāsyasi pāṇḍava yena bhūtānyaśheṣheṇa drakṣhyasyātmanyatho mayi
अर्थजिसको जानकर तुम पुन इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगे, और हे पाण्डव ! जिसके द्वारा तुम भूतमात्र को अपने आत्मस्वरूप में तथा मुझमें भी देखोगे।।
అపి చేదసి పాపేభ్యః సర్వేభ్యః పాపకృత్తమః। సర్వం జ్ఞానప్లవేనైవ వృజినం సన్తరిష్యసి॥
api ched asi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpa-kṛit-tamaḥ sarvaṁ jñāna-plavenaiva vṛijinaṁ santariṣhyasi
अर्थयदि तुम सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो, तो भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा, निश्चय ही सम्पूर्ण पापों का तुम संतरण कर जाओगे।।
యథైధాంసి సమిద్ధోఽగ్నిర్భస్మసాత్కురుతేఽర్జున। జ్ఞానాగ్నిః సర్వకర్మాణి భస్మసాత్కురుతే తథా॥
yathaidhānsi samiddho ’gnir bhasma-sāt kurute ’rjuna jñānāgniḥ sarva-karmāṇi bhasma-sāt kurute tathā
अर्थजैसे प्रज्जवलित अग्नि ईन्धन को भस्मसात् कर देती है, वैसे ही, हे अर्जुन ! ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्मसात् कर देती है।।
న హి జ్ఞానేన సదృశం పవిత్రమిహ విద్యతే। తత్స్వయం యోగసంసిద్ధః కాలేనాత్మని విన్దతి॥
na hi jñānena sadṛiśhaṁ pavitramiha vidyate tatsvayaṁ yogasansiddhaḥ kālenātmani vindati
अर्थइस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला, निसंदेह, कुछ भी नहीं है। योग में संसिद्ध पुरुष स्वयं ही उसे (उचित) काल में आत्मा में प्राप्त करता है।।
శ్రద్ధావాంల్లభతే జ్ఞానం తత్పరః సంయతేన్ద్రియః। జ్ఞానం లబ్ధ్వా పరాం శాన్తిమచిరేణాధిగచ్ఛతి॥
śhraddhāvān labhate jñānaṁ tat-paraḥ sanyatendriyaḥ jñānaṁ labdhvā parāṁ śhāntim achireṇādhigachchhati
अर्थश्रद्धावान्, तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है।।
అజ్ఞశ్చాశ్రద్దధానశ్చ సంశయాత్మా వినశ్యతి। నాయం లోకోఽస్తి న పరో న సుఖం సంశయాత్మనః॥
ajñaśh chāśhraddadhānaśh cha sanśhayātmā vinaśhyati nāyaṁ loko ’sti na paro na sukhaṁ sanśhayātmanaḥ
अर्थअज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष नष्ट हो जाता है, (उनमें भी) संशयी पुरुष के लिये न यह लोक है, न परलोक और न सुख।।
యోగసంన్యస్తకర్మాణం జ్ఞానసంఛిన్నసంశయమ్। ఆత్మవన్తం న కర్మాణి నిబధ్నన్తి ధనఞ్జయ॥
yoga-sannyasta-karmāṇaṁ jñāna-sañchhinna-sanśhayam ātmavantaṁ na karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya
अर्थजिसने योगद्वारा कर्मों का संन्यास किया है, ज्ञानद्वारा जिसके संशय नष्ट हो गये हैं, ऐसे आत्मवान् पुरुष को, हे धनंजय ! कर्म नहीं बांधते हैं।।
తస్మాదజ్ఞానసంభూతం హృత్స్థం జ్ఞానాసినాఽఽత్మనః। ఛిత్త్వైనం సంశయం యోగమాతిష్ఠోత్తిష్ఠ భారత॥
tasmād ajñāna-sambhūtaṁ hṛit-sthaṁ jñānāsinātmanaḥ chhittvainaṁ sanśhayaṁ yogam ātiṣhṭhottiṣhṭha bhārata
अर्थइसलिये अपने हृदय में स्थित अज्ञान से उत्पन्न आत्मविषयक संशय को ज्ञान खड्ग से काटकर, हे भारत ! योग का आश्रय लेकर खड़े हो जाओ।।