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भगवद् गीता 2.26

अध्याय 2, श्लोक 26

अध्याय 2: Sānkhya Yogसांख्ययोग

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥

लिप्यंतरण

atha chainaṁ nitya-jātaṁ nityaṁ vā manyase mṛitam tathāpi tvaṁ mahā-bāho naivaṁ śhochitum arhasi

अर्थ

और यदि तुम आत्मा को नित्य जन्मने और नित्य मरने वाला मानो तो भी, हे महाबाहो ! इस प्रकार शोक करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।।

शब्दार्थ
athaif, howeverchaandenamthis soulnitya-jātamtaking constant birthnityamalwaysormanyaseyou thinkmṛitamdeadtathā apieven thentvamyoumahā-bāhomighty-armed one, Arjunnanotevamlike thisśhochitumgrievearhasibefitting
व्याख्या

26 और 27 इन दो श्लोकों में भगवान् श्रीकृष्ण ने भौतिकवादी विचारकों का दृष्टिकोण केवल तर्क के लिए प्रस्तुत किया है। इस मत के अनुसार केवल प्रत्यक्ष प्रमाण ही ज्ञान का साधन है अर्थात् इन्द्रियों को जो ज्ञात है केवल वही सत्य है। इस प्रकार मानने पर उन्हें यह स्वीकार करना पड़ता है कि जीवन असंख्य जन्म और मृत्युओं की एक धारा या प्रवाह है। वस्तुयें निरन्तर उत्पन्न और नष्ट होती हैं और उनके मत के अनुसार यही जीवन है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि जन्ममृत्यु का यह निरन्तर प्रवाह ही जीवन हो तब भी हे शक्तिशाली अर्जुन तुमको शोक नहीं करना चाहिये। क्योंकि

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद् गीता 2.26 का अर्थ क्या है?
और यदि तुम आत्मा को नित्य जन्मने और नित्य मरने वाला मानो तो भी, हे महाबाहो ! इस प्रकार शोक करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।।
यह श्लोक भगवद् गीता के किस अध्याय का है?
यह श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2 (Sānkhya Yog — Transcendental Knowledge) का 26वाँ श्लोक है।