अध्याय 2, श्लोक 35
अध्याय 2: Sānkhya Yog — सांख्ययोगभयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः। येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥
लिप्यंतरण
bhayād raṇād uparataṁ mansyante tvāṁ mahā-rathāḥ yeṣhāṁ cha tvaṁ bahu-mato bhūtvā yāsyasi lāghavam
अर्थ
और जिनके लिए तुम बहुत माननीय हो उनके लिए अब तुम तुच्छता को प्राप्त होओगे, वे महारथी लोग तुम्हें भय के कारण युद्ध से निवृत्त हुआ मानेंगे।।
शब्दार्थ
bhayāt — out of fearraṇāt — from the battlefielduparatam — have fledmaṁsyante — will thinktvām — youmahā-rathāḥ — warriors who could single handedly match the strength of ten thousand ordinary warriorsyeṣhām — for whomcha — andtvam — youbahu-mataḥ — high esteemedbhūtvā — having beenyāsyasi — you will looselāghavam — decreased in value
व्याख्या
भावी इतिहास में तो तुम्हारी अपकीर्ति बनी रहेगी ही परन्तु वर्तमान में भी शत्रु पक्ष के ये महारथी तुम्हारा उपहास करेंगे। इस भ्रातृहन्ता युद्ध से तुम्हें जो दुख है उसे न समझकर वे तो यही मानेंगे कि तुमने भय और कायरता के कारण युद्ध से पलायन किया है। इस प्रकार का अनादरपूर्ण कायरता का आरोप कोई भी वीर पुरुष सहन नहीं कर सकता विशेषरूप से जब अपने ही तुल्य बल के शत्रुओं द्वारा वह किया गया हो। और
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद् गीता 2.35 का अर्थ क्या है?▼
और जिनके लिए तुम बहुत माननीय हो उनके लिए अब तुम तुच्छता को प्राप्त होओगे, वे महारथी लोग तुम्हें भय के कारण युद्ध से निवृत्त हुआ मानेंगे।।
यह श्लोक भगवद् गीता के किस अध्याय का है?▼
यह श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2 (Sānkhya Yog — Transcendental Knowledge) का 35वाँ श्लोक है।