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भगवद् गीता 2.41

अध्याय 2, श्लोक 41

अध्याय 2: Sānkhya Yogसांख्ययोग

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥

लिप्यंतरण

vyavasāyātmikā buddhir ekeha kuru-nandana bahu-śhākhā hyanantāśh cha buddhayo ’vyavasāyinām

अर्थ

हे कुरुनन्दन ! इस (विषय) में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही है, अज्ञानी पुरुषों की बुद्धियां (संकल्प) बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं।।

शब्दार्थ
vyavasāya-ātmikāresolutebuddhiḥintellectekāsingleihaon this pathkuru-nandanadescendent of the Kurusbahu-śhākhāḥmany-branchedhiindeedanantāḥendlesschaalsobuddhayaḥintellectavyavasāyināmof the irresolute
व्याख्या

कर्मयोग के साधन से आत्मसाक्षात्कार की सर्वोच्च उपलब्धि केवल इसलिये सम्भव है कि साधक दृढ़ निश्चय और एकाग्र चित्त से इसका अभ्यास करता है। जो लोग फल प्राप्ति की असंख्य इच्छाओं से प्रेरित हुये कर्म करते हैं उनका व्यक्तित्व विखरा हुआ रहता है और इस कारण एकाग्र चित्त होकर वे किसी भी क्षेत्र में सतत् कार्य नहीं कर सकते जिसका एक मात्र परिणाम उन्हें मिलता है विनाशकारी असफलता।इस श्लोक में संक्षेप में सफलता का रहस्य बताया गया है। निश्चयात्मक बुद्धि से कार्य करने पर किसी भी क्षेत्र में निश्चय ही सफलता मिलती है। परन्तु सामान्यत लोग असंख्य इच्छायें करते हैं जो अनेक बार परस्पर विरोधी होती हैं और स्वाभाविक ही उन्हें पूर्ण करने में मन की शक्ति को खोकर थक जाते हैं। इसे ही संकल्प विकल्प का खेल कहते हैं जो मनुष्य की सफलता के समस्त अवसरों को लूट ले जाता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद् गीता 2.41 का अर्थ क्या है?
हे कुरुनन्दन ! इस (विषय) में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही है, अज्ञानी पुरुषों की बुद्धियां (संकल्प) बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं।।
यह श्लोक भगवद् गीता के किस अध्याय का है?
यह श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2 (Sānkhya Yog — Transcendental Knowledge) का 41वाँ श्लोक है।